देवगुरु बृहस्पति बोले-देवेन्द्र! प्राचीन कालमें नैमिषारण्यमें अजगर नामका एक ब्राह्मण था। वह वेदान्तशास्त्र में विशारद, ज्ञानवान् और भगवान् शंकरका उपासक था। उसने बारह वर्षमें पार्थिव-पूजाके द्वारा भगवान् रुद्रको संतुष्ट किया। भगवान् शिवने उसे ज्ञान प्रदानकर जीवन-मुक्ति प्रदान की। पुनः उस द्विजोत्तमने संकर्षणकी आराधना कर अनेक स्तुतियोंद्वारा उन्हें प्रसन्न किया। भगवान् संकर्षणने उसे सायुज्य प्रदान किया और अन्तमें वह भगवान्का आभूषण सर्प बन गया। वह हजार फणोंसे युक्त गौराङ्ग-गौरविग्रह था। उसका स्थान क्षीरसागरमें था। ब्रह्माजीने स्वयं आकर सूर्यके कर्कराशिस्थ होनेपर चन्द्रमाके नक्षत्रमण्डलमें उस रुद्रको स्थापित किया और वह चन्द्रमाके रूपमें हो गया।
इस प्रकार गुरुके द्वारा कहे गये बचनोंको सुनकर शेषनाग रुदने प्रसन्नचित्त हो अपने मुखसे तेज उत्पन्न कर विन्ध्याद्रि देवदत्त बाहाशके घरपर स्थापित किया और वही गिरिशमा विपके रूपम पम आवह विद्वानों को जीतकर काशीपुरोमे आया और शकरका शिष्य हो गया।
सूतजी बोले-मुने! अब आप देवगुरु बृहस्पतिद्वारा देवताओंसे कही गयौ एक अन्य कथा सुनें। बृहस्पतिजीने कहा था-'देवेन्द्र ! पूर्वकालमें प्रयागमें नैर्ऋत नामका एक प्रसिद्ध ब्राह्मण था, वह दरिद्रतासे दु:खी तथा मन्दभाग्य था। बहुत कष्टसे दिनभर माँगनेके बाद उसे भिक्षा प्राप्त होती थी। पुत्र-पत्नीके बाद वह नैत नित्य दरिद्रतासे पीड़ित रहता था। एक समय वैष्णवप्रिय देवर्षि नारद उसके पास आये और कहने लगे--विन श्रेष्ठ! यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देवमय है और सभीके स्वामी 'भव (शंकर) हैं। इसलिये तुम भी शीघ्र ही भवका भजन करो। वे तुम्हारे कार्यको सिद्ध कर देंगे। देवर्षि नारदसे यह उपदेश पाकर नैतने परम भक्तिसे वर्षपर्यन्त पार्थिवार्चनद्वारा भगवान् शिवको संतुष्ट किया। भगवान् महेश्वरने प्रसन्न होकर कुवेरके समान उसे दिव्य विपुल धन प्रदान किया। उसने उस धनरी धर्म-कार्य सम्पन्न किया। इस कारण वह पुण्यात्माओंमें प्रसिद्ध हुआ। शिवभक्तिके प्रभावसे वह अकंटक दव्य प्राराकर हजार वर्षतक जीवित रहकर अन्त प्राण परित्यागकर स्वर्गम चला गया और वृषराशि सूर्यक स्थित रहनेपर चन्द्र के समान सुशोभित होकर सर्वजनप्रिय नैत रुद्र के नामसे विख्यात हुआ।'
सूतजीने कहा-शौनक! वही नैर्ऋत अपने अंशसे पृथ्वीपर आकर गिरिनालगिरिके वनमें वनवासी सिद्ध सांख्ययोगीके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और वेदशास्त्रपरायण वनशमकि नामसे विख्यात हुआ। उसने बारह वर्षकी अवस्था अनेक विद्वानोंको जीत लिया। पुनः तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिकी अभिलाषासे काशीमें आकर श्रेष्ठ शंकराचार्यको प्रणाम कर उनका शिष्य हो गया।
बृहस्पतिजीने पुनः कहा-देवेन्द्र माहिष्मतीमें एक शिवभक्त वसुशर्मा नामक ब्राह्मण रहता था। वह पुत्रकी कामनासे पार्थिवार्चनमें विशेषरूपसे तत्पर रहता था। अनेक प्रयत्न करनेके बाद भगवान् शंकरने प्रकट होकर वर माँगनेको कहा। तब उस विप्रने कहा—'शरणागतवत्सल ! आप मुझे पुत्र प्रदान करें।' इसपर शंकरने कहा-'वत्स! तुम्हारे में पुत्र नहीं लिखा है, फिर भी मैं तुम्हें अपने अंशसे एक तेजस्वी पुत्र दे रहा हूँ।' ऐसा कहकर उन्होंने एक तेज प्रकट किया और उसी तेजसे उसे एक सुन्दर पुत्र उत्पन हुआ। उस पुत्रका एक पैर मनुष्यके समान और दूसरा पैर अजके समान था। अतः पृथ्वीपर वह अजैकपाद नामसे विख्यात हुआ। चार सौर वर्ष बीतनेपर मृत्युदेवता अपने गणों के साथ वहाँ आये। अजैकपादके साथ उनका भयंकर युद्ध हुआ। अन्तमें अजैकपाद युखमें विजयी होकर मृत्युञ्जय नामसे पृथ्वीपर प्रसिद्ध हुए। उससे पराजित एवं दुःखी होकर मृत्युदेवताने अपना कष्ट ब्रह्माजीसे कहा, तब भगवान् ब्रह्माने सभी देवोंके साथ सूर्यक कुम्भस्थ होनेपर उस ब्राह्मणको भयहारी रुद्रके रूपमें चन्द्रमण्डलका अधिपति बनाया।
सूतजी बोले-मुने! अनन्तर वही अजैकपाद माहिष्मतीपुरीमें आकर कलिको शुद्धि प्रदान करनेवाले प्रभुके रूपमें पुरीशर्माक नामसे विख्यात हुआ और यतिदत्तके पुत्रके रूपमें पुनः अवतीर्ण हुआ। उसने सोलह वर्षमें वेदपारङ्गत विद्वानोंको जीतकर शंकराचार्यके पास आकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। (अध्याय ११)