भविष्य महा पुराण

निक्षुभार्क-सप्तमी तथा निक्षुभार्क-चतुष्टय-व्रत-माहात्म्य-वर्णन

सुमन्तु मुनि बोले-राजन् ! जो स्त्री उत्तम पुत्रको आकाङ्क्षा रखती है, उसे निक्षुभार्क नामका व्रत करना चाहिये। यह व्रत स्त्री एवं पुरुषमें परस्पर प्रीतिवर्धक, अवियोगकारक और धर्म, अर्थ तथा कामका साधक है। इस व्रतको षष्ठी, सप्तमी, संक्रान्ति या रविवारके दिन करना चाहिये। भगवान् सूर्यके सहित उनकी पत्नी महादेवी निक्षुभाकी धौ- रूपमें कांस्य, रजत तथा सुवर्णकी सुन्दर प्रतिमा बनवाये। उसे घृतादिसे स्नान कराकर गन्ध-माल्यादि तथा वस्त्रोंसे अलंकृत करे। अनन्तर प्रतिमा स्थापित किये उस वितान और छत्रसे शोभित पात्रको सिरपर रखकर भगवान् सूर्यके मन्दिरमें ले जाय। उस प्रतिमाको एक वेदीपर स्थापित करे और प्रदक्षिणापूर्वक उसे नमस्कार कर क्षमा याचना करे एवं उपवास रहकर हविके द्वारा हवन करे। फिर सूर्य भक्त ब्राहाणोंको शुक्ल वस्त्र पहनाकर भोजन कराये। इस व्रतको करनेवाला व्यक्ति देदीप्यमान महायानसे सूर्यलोकमें सूर्यभक्तों के साथ आनन्द प्राप्त करता है, फिर वह अनन्त वर्षातक विष्णुलोकमें आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है।

सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! जो स्त्री सौभाग्यको आकाङ्क्षासें संयतेन्द्रिय होकर षष्ठी अथवा सप्तमीको एक वर्षतक भोजन नहीं करती और वर्षकै अन्तमें निभा तथा सूर्यको प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक स्नानादि पूर्वोक्त क्रियाएँ करती है, वह पूर्वोक्त फलोको प्राप्त करती है तथा चारों द्वारोंसे सुशोभित स्वर्णगय यानके द्वारा रमणीय  सूर्यलोकमें जाकर सभी फलोंको प्राप्तकर सौर आदि सभी लोकों में अभीप्सित फलका उपभोग कर इस लोकमें जन्म ग्रहण करती है तथा राजाको पतिरूपमें प्राप्त करती है।

इसी प्रकार जो नारी कृष्ण पक्षकी सप्तमीको उपवास कर वर्षके अन्तमें शालिके चूर्णसे सुन्दर निक्षुभार्कको प्रतिमाका निर्माण करके पीत रंगकी मालासे और पीत वस्त्रोंसे उनकी पूजा करती है तथा ये सभी कर्म सूर्यको निवेदित करती है, वह हाथी-दाँतके समान कान्तिवाले महायानसे सातों लोकों में गमनकर, सौ करोड़ वर्षतक सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होती है। नर श्रेष्ठ ! सौर आदि लोकोंमें भोगोंका उपभोगकर क्रमश: इस लोकमें जन्म ग्रहण करती तथा अभीप्सित धन धान्य-समन्वित मनोऽनुकूल पतिको प्राप्त करती है '

जो दृढवत्ती नारी माघ मासके कृष्ण पक्षकी ससमीको सभी भोगोंका परित्याग कर एक वर्षतक प्रत्येक सप्तमीको उपवास करती और वर्षके अन्त में गन्धादि पदार्थ निक्षुभार्कको निवेदित करती है तथा मगकी स्त्रियों को भोजन कराती है, वह गन्धर्वसे सुशोभित विचित्र दिव्य महायानद्वारा सूर्यलोकमें जाकर अनेक सहस्र वर्षातक निवास करती है। वहाँ यथेष्ट सभी भोगोंका उपभोग कर इस लोकमें आनेपर राजाको पतिरूपों वरण करती है।

राजन् ! जो स्वी पाप और भयका नाश करनेवाले इस नितुभार्क-व्रतको करती है, वह परमपदको प्राप्त करती है। एक वर्षतक परम श्रद्धाके साथ

*चतुर्बाचिन्तामणि (हेमादि) के व्रत-खण्डमें भविष्यपुराणके नामसे नि भाक-चतुष्टय नानक इस व्रतका संग्रह हुआ है। उपलम भविष्यपुराणमें पाठका कुछ अंश कम है, जिसे हेमा के आधारपर यहाँ दिया जा रहा है-

जो नारी एक वर्षतक संयतेन्द्रिय होकर सामोको निराहार व्रत रखती है और जिसकी कणिकाएँ सुवर्णकी हों ऐसे चाँदीक कमलको, पिष्टमय गजका निर्माण कर उसकी पीठपर स्थापित कर बातमें उसका दान करती है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। शेष पूजन पूर्वोक्त विधिसे ही करना चाहिये। इससे वा पुरषा परी सभी सौरादि लोकोंमें भ्रमण करते हुए पृथ्वीलोकमें आकर कुलीन तथा रूपसम्पन्न महाबली राजाको पतिरूयमें प्राक्ष करती है।

इस व्रतको सम्पन्न कर वर्षान्त में भोजक-दम्पतिको भोजन कराये और गन्ध-माल्य, सुन्दर वस्त्र आदिसे उनकी पूजा करे। ताम्रमय पात्रमें हरिसे अलंकृत निशुभार्ककी सुवर्णमयी प्रतिमा भोजक-दम्पतिको निवेदित करे। देवी निक्षुभा भोजकी हैं और अर्क भोजक हैं। अत: उन दोनोंकी विधिवत् श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिये। (अध्याय १६६-१६७)