महाराज युधिष्ठिरने पूछा- भगवन् ! वह कौन-सा व्रत, तप, नियम अथवा दान है, जिसके करनेसे इस लोकमें अत्यन्त तेजोमय शरीरको प्राप्ति होती है। इसे आप बतायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! किसी समय पिंगल नामके एक तपस्वी मथुरा में आकर प्रवास कर रहे थे। उन तपस्वीसे देवी जाम्बवतीने भी यही प्रश्न किया था, उस विषयको आप सुनें-पिंगलमुनिने कहा था-'देवि! संक्रान्ति सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, वैधृति, व्यतिपातयोग, उत्तरायण दक्षिणायन, विषुव, एकादशी, शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी, तिथिक्षय, सप्तमो तथा आमी-इन पुण्य दिनों में स्नान कर, व्रतपरायण स्त्री अथवा पुरुषको अपने आँगनके मध्य धृत-कुम्भ और जलता हुआ दीपक भूमिदेवको दान देना चाहिये। इससे प्रदोस एवं ओजस्वी शरीर प्राप्त होती है।'
राजा युधिष्ठिरने पूछा- मधुसूदन ! भूमिके देवता कौन हैं? मेरे इस संशयको दूर करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाराज ! पूर्वकालमें सत्ययुगके आदिमें त्रिशंकु नामका एक ( सूर्यवंशी) राजा था, जो सशरीर स्वर्गको जाना चाहता था। पर महर्षि वसिष्ठने उसे चाण्डाल बना दिया इससे त्रिशंकु बहुत दुःखी हुआ और उसने विश्वामित्रजीसे समस्त वृत्तान्त कहा। इससे क्रुद्ध होकर विश्वामितने दूसरी सृटिकी रचना प्रारम्भ कर दी। उस सृष्टिमें सभी देवताकि साथ-साथ त्रिशंकुके लिये दूसरा स्वर्ग बनाना प्रारमा कर दिया और शृङ्गाटव (सिंघाड़ा), नारियल, कोद्रच, कूष्माण्ड, ऊँट, भेड़ आदिका निर्माण किया एवं नये समर्षि तथा देवताओं की प्रतिमाका भी निर्माण कर दिया। उस समय इन्द्रने आकर इनको प्रार्थना की और विश्वामित्रजीसे मुधि रोकनेका अनुरोध किया तथा
*अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश तिन्तिडीकन्। कपित्थबिल्वामलकीत्रयं च पञ्चाम्ररोपी नरकं न पश्येत्।।
दीपदान करनेकी सम्मति दी। जो प्रतिमाएँ इन्होंने बनायी थीं, उनमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि सभी देवताओंका वास हुआ और वे ही इस संसारके प्राणियोंका कल्याण करनेके लिये मर्त्यलोकमें प्रतिमाओंमें मूर्तिमान् रूपमें स्थित हुए एवं नैवेद्यादिको ग्रहण करते हैं तथा अपने भक्तोंपर प्रसन्न होकर वरदान देते हैं, वे ही भूमिदेव कहलाते हैं। राजन् ! इसीलिये उनके सम्मुख दीपदान करना चाहिये। भगवान् सूर्यके लिये प्रदत्त दीपकी रक्त वस्त्रसे निर्मित वर्तिका 'पूर्णवर्ति' कहलाती है। इसी प्रकार शिवके लिये निर्मित श्वेत वस्त्रकी वर्तिका 'ईश्वरवर्ति', विष्णुके लिये निर्मित पीत वस्वकी वर्तिका 'भोगवर्ति', गौरीके लिये निर्मित कुसुम रंगके वस्त्रको वर्तिका 'सौभाग्यवर्ति', दुर्गाके लिये लाखके रंगके समान रंगवाले वस्त्रकी वर्तिका 'पूर्णवर्तिका' कहलाती है। ऐसे ही ब्रह्माके लिये प्रदत्त वर्तिका 'परवति', नागोंके लिये प्रदत्त वर्तिका 'नागवर्ति' तथा ग्रहों के लिये प्रदत्त वर्तिका 'ग्रहवर्ति' कहलाती है। इन देवताओंके लिये ऐसे ही वर्तिकायुक्त दीपकका दान करना चाहिये। पहले देवताका पूजन करनेके बाद बड़े पात्र में घी भरकर दीपदौन करना चाहिये। इस विधिसे जो दीपदान करता है, वह सुन्दर तेजस्वी विमानमें बैठकर स्वर्गमें जाता है और वहाँ प्रलयपर्यन्त निवास करता है। जिस प्रकार दीप प्रकाशित होता है, उसी प्रकार दीपदान करनेवाला व्यक्ति भी प्रकाशित होता है। दोपके शिखाको भाँति उसकी भी ऊर्ध्वगति होती है। दीपक घृत या तेलके जलाने चाहिये, वसा, मज्जा आदि तरलद्रव्ययुक्त के नहीं। जलते हुए दोपको बुझाना नहीं चाहिये नही उस स्थानसे हटाना चाहिये। दीप बुक्षा देनेवाला काना होता है और दीपको चुरानेवाला अंधा होता है। दीपका बुझाना निन्दनीय कर्म हैं।
राजन्! आप दीपदानके माहात्म्यमें एक आख्यान सुनें-विदर्भ देशमें चित्ररथ नामका एक राजा रहता था। उस राजाके अनेक पुत्र थे और एक कन्या थी, जिसका नाम था ललिता। वह सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न अत्यन्त सुन्दर थी। राजा चित्ररधने धर्मका अनुसरण करनेवाले महाराज काशिराज चारुधर्माके साथ ललिताका विवाह किया। चारुधर्माकी यह प्रधान रानी हुई। वह विष्णु-मन्दिरमें सहस्रों प्रज्वलित दीपक प्रतिदिन जलाया करती थी। विशेषरूपसे आश्विन-कार्तिकमें बड़े समारोहपूर्वक दीपदान करती थी। वह चौराहों, गलियों, मन्दिरों, पीपलके वृक्षके पास, गोशाला, पर्वतशिखर, नदीतटों तथा कुओंपर प्रतिदिन दीप-दान करती थी। एक बार उसकी सपत्रियों ने उससे पूछा-'ललिते ! तुम दीपदानका फल हमें भी बतलाओ। तुम्हारी भक्ति देवताओंके पूजन आदिमें न होकर दीपदानमें इतनी अधिक क्यों है?' यह सुनकर ललिताने कहा 'सखियो! तुमलोगोंसे मुझे कोई शिकायत नहीं है, न ही ईर्ष्या, इसलिये मैं तुमलोगोंसे दोपदानका फल कह रही हूँ। ब्रह्माजीने मनुष्योंके उद्धारके लिये साक्षात् पार्वतीजीको मद्रदेशमें श्रेष्ठ देविका नदीके रूपमें पृथ्वी पर अवतरित किया, वह पापोंका नाश करनेवाली है, उसमें एक बार भी स्नान करनेसे मनुष्य शिवजीका गण हो जाता है । उस नदीमें जहाँ भगवान् विष्णुने नृसिंहरूपसे स्वयं स्रान किया था, उस स्थानको नृसिंहतीर्थ कहते हैं। नृसिंहतीर्थ में स्नान करनेगात्रसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।'
सौवीर नामके एक राजा थे, जिसके पुरोहित थे मैत्रेय। राजाने देविकाके तटपर एक विद्यामन्दिर बनवाया। उस मन्दिरमें मैत्रेयजी प्रतिदिन पुण, धूप, दीप, नैवेद्य आदिये पूजन और दीपदान किया
करते थे। वे एक दिन कार्तिककी पूर्णिमाको वहाँ दीपदानका बहुत बड़ा उत्सव मना रहे थे। रात्रिके समय सभी लोगोंको नींद आ गयी। उस मन्दिरमें अपने पूर्वजन्ममें मूषिकारूपमें रहनेवाली मुझे दीपककी घृतवर्तिको खानेकी इच्छा हुई। उसी क्षण मुझे बिल्लीकी आवाज सुनायी दी। मैंने भयभीत होकर दीपककी बत्ती छोड़ दी और छिप गयी, वह दीपक बुझने नहीं पाया। मन्दिरमें पूर्ववत् प्रकाश हो गया। कुछ काल बाद मेरी मृत्यु हो गयी, पुनः मैं विदर्भदेशमें चित्ररथ राजाकी राजकन्या हुई और काशिराज चारुधर्माकी मैं पटरानी हुई। सखियो! कार्तिक मासमें विष्णुमन्दिरमें दीपदानका ऐसा सुन्दर फल होता है। चूंकि मैं मूषिका थी, मेरा दीपदानका कोई संकल्प नहीं था, फिर भी मुझसे अनायास जो मन्दिरमें भयवश दीप प्रज्वलित हुआ अथवा मैं दीपको नष्ट न कर सकी, उस समय बिना परिज्ञानके मुझसे जो दीपदानका पुण्यकर्म हुआ था, उसी पुण्य-कर्मके फलस्वरूप आज मैं श्रेष्ठ महारानीके पदपर स्थित हूँ और मुझे अपने पूर्वजन्मका ज्ञान है। इसी कारण मैं आज भी निरन्तर दीपदान करती रहती हूँ। मैं दीपदानके फलको भलीभाँति जानती हूँ, इसलिये नित्य देवालयमें दीप जलाती हूँ।' ललिताका यह कथन सुनकर सभी सहेलियाँ भी दीपदान करने लगी और बहुत समयत्तक राज्य सुख भोगकर सभी अपने पतिके साथ विष्णुलोकको चली गयौं । इस प्रकार जो भी पुरुष अथवा स्त्री दीपदान करते हैं, वे उत्तम तेज प्राप्तकर विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं। (अध्याय १३०)