महर्षि शौनकने पूछा-सूतजी महाराज ! पृथ्वीराजके बाद कौन-कौन राजा उत्पन्न हुए? इसे आप बतायें।
सूतजीने कहा- मुने! पैशाच (पठान) राजा कुतुकोद्दीन (कुतुबुद्दीन) दिल्लीका शासक था और अति सुरम्य वलीगढ़ यादवोंसे रक्षित था। कुतुकोद्दीन दस हजार सैनिकोंको साथ लेकर युद्धके लिये वहाँ गया और वीरसेनके पौत्र श्रेष्ठ भूपसेनको जीतकर दिल्ली नगरमें राज्य करने लगा। इसी समय अनेक देशोंके राजागण वहाँ आये। उन लोगों ने कुतुकोद्दीनको जीतकर देशसे बाहर कर दिया। इस समाचारको सुनकर सहोद्दीन (शहाबुद्दीन) पुनः (गौरसे) दिल्ली पहुँच गया। उस दैत्यरांजने राजाओंको जीतकर अनेक मूर्तियों और देवरन्दिरोंको खण्डित कर दिया। इसके बाद बहुत-से म्लेच्छ वहाँ आकर रहने लगे। पाँच-छ: अथवा सात वर्षांतक राज्यकर चे दिवंगत हो गये।
मुनिगणो ! इन सभी म्लेच्छ राजाओंने अनेक मन्दिरोंको तोड़ा है, सभी तीर्थों और आश्रमोंको दृषित कर दिया है, अत: आपलोग मेरे साथ हिमालयके ऊपर बदरीवनकी ओर प्रस्थान कीजिये यह सुनकर नैमिषारण्यवासी सभी ऋषिगण दुखो होकर सूतजीके साथ नैमिषको छोड़कर बदरोक्षेत्र चले गये। वहाँ सभी लोग समाधिस्थ होकर सर्वमय श्रीहरिके यारो स्थित, हो गये। सूतजी महाराजसे पुनः कल्पके इतिहासके विषयमें जिज्ञासा प्रकट की।
सूतजीने पुन: कहा- श्रेष्ठ मुनिगण ! मैंने योगनिद्रामें जो देखा है, उस कल्पके वृत्तान्तको कह रहा हूँ। उसे आपलोग सुनिये । अनन्तर मुकुल ( मुगलवंशी.) म्लेच्छ राजा हुआ। वह म्लेच्छराज तिमिरलिङ्ग (तैमूरलंग) मध्यदेशमें आया । उस कालस्वरूप म्लेच्छ राजाने सभी आर्यो तथा म्लेच्छ राजाओंको जीतकर देहली नगरी में बहुत उपद्रव किया और उसने आर्योको बुलाकर कहा-'तुम सभी मूर्तिपूजक हो । शालग्राम तो पत्थर है, उसका पूजन कैसे उचित है ? तुम सब उसे विष्णु मानते हो, वह विष्णु तो है नहीं, अत: तुम सभीके जितने वेद-शास्त्र हैं, उन्हें मुनियोंने संसारको ठगने के लिये बनाया है। ऐसा कहकर तैमूरलंगने शालग्रामकी मूर्तिको जबरदस्ती छीन लिया और जलती हुई आगमें फेंक दिया तथा पूजित सभी शालग्रामशिलाओं को ऊँटोंपर लादकर वह अपने देश चला गया। उसने तैचिर (तातार) देशमें आकर अपला एक सुदृढ़ किला बनवाया अपने सिंहासनपर आरोहण करनेके लिये शालग्रामशिलाका पादपीठ बनवाया।
यह देखकर सभी देवता दुखी होकर देवराज इन्द्र के पास गये और विलाप करते हुए इन्द्रसे बाले 'भगवन हमलोगोको स्थिति तो शालग्राम-शिलामे है, परंतु म्लेच्छराज तैमूरलंगने शालग्रामको पादपीठ बनवा लिया है। देवताओंकी बात सुनकर
क्रुद्ध हो देवराज इन्द्रने हाथमें वज्र उठा लिया और बड़े वेगसे तैत्तिर देशकी ओर फेंका। उस वनके घोर शब्दसे उसका सारा देश टुकड़े-टुकड़े होकर खण्डित हो गया और वह म्लेच्छ अपने सभी सभासदोंके साथ मृत्युको प्राप्त हो गया। अनन्तर प्रसन्न हो देवताओंने उन सभी शालग्रामशिलाओंको ग्रहणकर गण्डकी नदीमें छोड़ दिया। पुनः वे सभी स्वर्गलोक चले आये। इन्द्रने देवताओंके साथ देवपूज्य बृहस्पतिसे कहा-'भगवन्! कलियुगके आनेपर बहुत दैत्य उत्पन्न हो गये हैं। वे वेदधर्मका उल्लंघन करके हमलोगोंके विनाशके लिये तैयार हो गये है, अतः आप हमारी रक्षा करें।' बृहस्पति बोले-महेन्द्र ! तुम्हारी जो श्रेष्ठ शची नामकी पत्नी है, उसे भगवान् विष्णुने वर दिया है कि 'कलियुगमें मैं तुम्हारे पुत्ररूपमें अवतरित होऊँगा। तुम्हारे आदेशसे वह देवी शची गौड़देशमें गङ्गाके किनारे शान्तिपुरमें ब्राह्मणीके रूपमें तथा तुम स्वयं ब्राह्मणरूपमें अवतरित होकर देवकार्यको सिद्ध करो।' यह सुनकर देवराज इन्द्र एकादश रुद्रों, अष्ट वसुओं तथा अश्विनीकुमारोंके साथ सूर्यके अत्यन्त प्रिय तीर्थराज प्रयागमें आये और उन्होंने माघमें मकरमें सूर्य होनेपर भगवान् सूर्यकी आराधना की। बृहस्पतिने आकर उन्हें भगवान् सूर्यका माहात्म्य बतलाया। (अध्याय ६)