बृहस्पतिजी बोले-देवेन्द्र !पूर्वकालमें संसारके लिये कंटक बना हुआ हिर्बु नामका एक दानव था। वह निकुम्भकी वंशपरम्परामें उत्पन्न हुआ था और इन्द्र के समान पराक्रमी था। जब हजार वर्षतक तपस्या करके उसने देवताओंको पराजित किया, तब लोकरक्षाके लिये उद्यत लोकपति ब्राने उससे वर माँगनेको कहा। उसने उन्हें प्रणाम कर विश्वके सभी प्राणिपदार्थोंसे 'मैं मारा न जा सकूँ' यह वर माँगा। ऐसा ही होगा' यह कहकर बहा ब्रहालोक चले गये। वर प्रासकर उस भयंकर दैत्यने देवताओंको जीतकर स्वर्गसे भगा दिया
और दैत्योंको वहाँ बसाया। इस प्रकार देवताओंने भीषण यन्त्रणा भोगी। उनकी दुर्दशा देखकर नारदजीने कहा-'देवगणो! आपलोग शंकरकी उपासना करें। भगवान् शंकर ब्रह्माण्डके स्वामी हैं तथा वित्तियोंके नाशक है।' यह सुनकर देवताओंने देवदेव भगवान् उमापतिकी पार्थिवपूजा प्रारम्भ कर दी। पूजा करते हुए ग्यारह वर्ष व्यतीत होनेपर लोककल्याणकारी भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और ज्योतिर्लिङ्गमय होकर देवभक्तोंको छोड़ शेष सभी असुरोंको दग्ध करने लगे। इससे प्रसन्न होकर ब्रह्माने विष्णुके साथ आनन्दपूर्वक सामसूतोंसे महारुद्रको प्रसन्न किया। सूर्यके मिथुन राशिमें स्थित होनेपर हिर्नु दैत्यका विनाश करनेवाले महारुद्रको देवताओंके कल्याणके लिये शशिमण्डलका राजा बनाया। यह महारुद्र देवकार्यके लिये तत्पर हो गया। अनन्तर यही महारुद्र रमणीय हिमालयपर्वतपर साधकर्माके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और बादमें कलाओंका ज्ञाता भारतीश नामसे प्रसिद्ध हुआ। विद्वत्समुदायको जीतकर फिर वह काशी नगरीमें चला आया और शंकराचार्यका शिष्य हो गया। बृहस्पतिजीने पुनः कहा-देवेन्द्र! मयका एक पुत्र था मायी, वह एक पैरपर खड़ा होकर एक हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करता रहा। उसने अपनी तपस्याके द्वारा संसारके सभी प्राणियोंको संतप्त कर दिया। अनन्तर भगवान् परमेष्ठी पितामहने प्रसन्न होकर तीन गाँवों (तीन पुरों-त्रिपुर)-को उसके भोगके लिये निर्मित किया। सोलह योजनवाले विस्तृत स्वर्गके समान सुवर्णमय, उसके नीचे भुवोकके समान एक योजन विस्तृत रजतमय तथा उसके नीचे भूर्लोकके समान एक योजन विस्तृत लौहमय तीन पुर बनवाये। इस प्रकार उस त्रिपुरमें सौ करोड़ दैत्य तथा दैत्यपत्रियाँ निवास करने लगीं। वे देवताओंके यज्ञभागको ग्रहणकर देवताओं के समान हो गये। यज्ञभाग न मिलने के कारण निर्बल देवगण भूखसे पीड़ित हो भगवान् विष्णुके पास गये और उनकी स्तुति कर कहने लगे-'भगवन् ! प्रभो ! मयपुत्र मायीके द्वारा प्राप्त दुःखोंको भोगते हुए हमें बहुत ही दोध समय हो गया है, हम सभी अधिकारविहीन होकर रह रहे हैं। स्व गायी दैत्यका ही राज्य है। देवताओंको बात सुनकर भगवान् मधुसूदन संस्कृतवार्ता करनेवाले त्रिपुरस्थित धर्मपरायचा देत्यो को देखकर भयानक कलियुग बौद्धरूपमे आजन द्विजके पुत्र होकर उत्पान हए उस बौद्धने वेदधर्मपरायण विप्रोंको मोहित कर दिया। तामस मन्वन्तरमें तीनों वर्ण वेदविहीन, कर्मरहित तथा वैराग्यसम्पत्र हो गये। सोलहवें कलिकी प्राप्ति होनेपर वे सभी यज्ञरहित हो गये। इस कारण त्रिपुरनिवासियोंको यज्ञभाग मिलना बंद हो गया, अतः सभी त्रिपुरनिवासी दैत्यगण क्रोधाविष्ट हो वेदरहित तथा यज्ञशून्य उन मनुष्योंको पीड़ित करने लगे। कल्पान्तमें दैत्योंसे भक्षित हो सभी मनुष्य विनष्ट हो गये।
पुन: सत्यलोकके आनेपर देवताओंने कैलासमें सभी लोगोंका कल्याण चाहनेवाले भगवान् शम्भुकी आराधना की। भगवान् शंकर ज्योतिर्लिङ्गरूप धारण कर वहाँ अवस्थित हो गये। इस कारण देवता प्रसन्न हो गये। उन्होंने भूमिके सारको ग्रहणकर विधिपूर्वक एक रथका निर्माण किया। चन्द्र और सूर्यके सारसे रथके दो चक्र बनाये। इसी प्रकार सुमेरुके सारसे रथका ध्वज बनाकर वह स्यन्दनरूपी यान भगवान् शिवको प्रदान किया। भगवान् ब्रह्मा स्वयं यहाँ आकर रथके सारथि बने। उन देवाधिदेवके रथके घोड़े चारों वेद हुए। उनका धनुष लोकालोक पर्वतका सार-तत्त्व ही आजगव नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह घोर शब्द करनेवाला था। भगवान् शंकर जब प्रत्यञ्चा बनाकर धनुषपर चढ़ाने लगे तब देवाधिदेवके क्रोधके कारण वह चाप टूट गया। यह देखकर भगवान् विष्णु आश्चर्यचकित हो गये। तदनन्तर उन्होंने स्वर्गके सारको ग्रहण कर पिनाक नामक एक दिव्य धनुषका निर्माण किया। रुद्रने पुनः उस धनुषको प्रत्यञ्चा चढ़ायी। वह धनुष दृढ़ था,, अतः भनीभूत नहीं हुआ। इस कारण ब्रह्मादि देवताओंने प्रसन्नचित्तसे उनकी स्तुति की और तबसे भगवान् महेश्वर 'पिनाकी' नामसे प्रसिद्ध हुए। शेषनाग उस चापकी डोरी थे और इन्द्र बाणरूप बने। बाणके पक्षपर वह्नि और वायु तथा शल्यपर सनातन विष्णु स्थित हुए। उस धनुष-बाणसे करोड़ों दैत्य आकाशमें मारे गये। भगवान् शिवने मायीसे पालित उस त्रिपुरको जला दिया।
उस भयंकर त्रिपुरके भस्मीभूत होनेपर लोकपति ब्रह्माने मीन राशिमें रविके स्थित होनेपर पिनाकी महारुद्रको चन्द्रमण्डलका राजा बनाया और तामस मन्वन्तरमें देवताओंने अपने-अपने अधिकारको पुनः प्राप्त कर लिया।
सूतजीने कहा-मुने! अनन्तर पिनाकीने अपने मुखसे अपने उत्तम अंशको उत्पन्न कर हरिद्वारमें अवस्थित मच्छन्द* नामक योगीके मुखमें अपने तेजको प्रविष्ट कराया। यह मच्छन्द भगवान् शम्भुकी पूजा करनेवाला तथा गोरखका गुरु था। उस तेजसे नाथशर्मा नामक एक बड़ा विद्वान्, श्रेष्ठ एवं सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पृथ्वीके सभी विद्वानोंको जीतकर काशीपुरीमें चला आया और शंकराचार्यका शिष्य हो गया।
देवेन्द्र! चाक्षुष मन्वन्तरके बारहवें द्वापरमें तालजंघवंशमें उत्पन्न क्षत्रियोंके द्वारा भृगुवंशमें उत्पन्न ब्राह्मणोंका कुरक्षेत्रमें विनाश हुआ और उनके प्रचुर धनको लेकर चे क्षत्रिय दैत्योंके पक्षपाती हो गये। उसी समय किसी ब्राह्मणको गर्भवती स्त्री डरकर तपस्याके प्रभावसे सौ वर्षोतक अपने गर्भको धारण किये रह गयी। इसे सहन न कर गर्भस्थ शिशु माताके ऊरुप्रदेशको विदीर्णकर पृथ्वीपर आ गया। उसके तेजसे सम्पूर्ण जगत् भस्मीभूत होने लगा। तब सभी देवगण प्रजापतिको आगे कर भयसे आतुर हो उसके पास आये। उस बालकने पितरों और देवताओंकी आज्ञासे उस लोकनाशकारी रोजको जलके बीच में फेंक दिया। जलदेवीने बडवा स्वरूप धारणकर उस उत्तम तेजका पान कर लिया, किंतु रौद, तेजसे पीड़ित हो उसने उस तेजका वमन कर दिया। ब्रह्माजीने त्रिकुटगिरिपर आकर उसके नीचे घोर सागरमें लोककी रक्षाकी दृष्टिसे उस तेजको स्थापित कर दिया। पुनः परमेष्ठी पितामहने मेष राशिमें सूर्यके आनेपर उस रौद्र तेजको रुद्ररूपमें शशिमण्डलके स्वामीके रूपमें स्थापित किया। वह ऊरुसे उत्पन्न होनेके कारण वोर्व, संसारका दहन करनेके कारण दहन और वडवाके मुखसे उत्पन्न होनेके कारण वाइव नामसे प्रसिद्ध हुआ।
सूतजी बोले-मुने ! उस दहनने अपने मुखसे तेज उत्पन्न किया और वही कुरुक्षेत्रनिवासी सारस्वत ब्राह्मणके घरमें क्षेत्रशर्माके नामसे विख्यात हुआ। वह विद्वानोंमें श्रेष्ठ हुआ। शंकराचार्यसे पराजित हो उनका शिष्य हुआ और ब्रह्मचर्यव्रत धारणकर भगवान् शंकरको उपासना करता हुआ काशीमें स्थित हो गया।
बृहस्पतिने पुन: कहा- देवेन्द्र ! पूर्वकालमें सारे संसारके एकार्णव हो जाने तथा स्थावर और जंगम सभीके नए हो जाने पर एवं अव्यक्तजन्म ब्रह्माके सौ वर्ष बीतनेपर मायारूपी प्रकृतिने आनन्दपूर्वक उस जलका पान कर लिया। फिर तमोमयी महाकाली उस दारुण प्राकृत जगत्में एकाकी उत्पन्न हुई। अनन्तर नित्य शुद्ध सनातन प्रकृति स्वेच्छासे महागौरीक रूप में परिणत हो गयीं। उनके पाँच मुख, दस भुजाएँ तथा तीन नेत्र थे। वह शिवा नामवाली हुई। ललाटस्थ नेत्रद्वारा उस माताने सूक्ष्म तेजका दर्शन किया। वह तेज नित्य, अविकारी, निरञ्जन तथा सर्वत्र दिशाओंमें परिव्यास था। उस ब्रहाको प्रकृतिने ग्रहण करनेकी इच्छा की, परंतु समर्थन हो सकी। आचर्यचकित हो उस प्रकृतिने अपने पाँचों मुखोंसे भक्तिपूर्वक प्रार्थनाकर परात्पर पूर्ण बहाको प्रसन्न किया। वह
*इस कथानकमें नाथसम्प्रदायका इतिहास अन्तर्निहित दीखता है।
सर्वज्ञ अह्म प्रकृतिके पाँचों मुखोंमें प्रविष्ट हो गया। वह ब्रह्म पुरुषत्वको प्राप्तकर स्वयम्भू नामसे प्रसिद्ध हुआ और अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न होनेके कारण वे अव्यक्तजन्मा कहे गये। उनके निमित्त वरदा, लोकरूपिणी अष्टादश भुजाओंसे युक्त देवी महालक्ष्मी उत्पन्न हुई। वे संसारकी रक्षा करने लगीं। उनके अद्भुत रूपको देखकर स्वयम्भू आश्चर्यचकित हो गये। अनेक रूपों में प्रवेश करके भी स्वयम्भू उनके अन्तको प्राप्त नहीं कर सके। बृहत् बहुरूप होनेके कारण वे ब्रह्मा नामसे विख्यात हुए। थककर भगवान् ब्रह्मा सत्यलोकमें चले आये। उन्होंने मुखसे आविर्भूत वेदोंसे शंकरकी दीर्घकालतक स्तुति को। उनके अङ्गसे नदी-नद उत्पन्न हुए। पुन: जलपय समुद्र हो जानेसे वहाँ स्वयं प्रभुने शयन किया। अव्यक्त स्वयम्भूने सहसयुगपर्यन्त वहाँ निवासकर सत्यलोकमें आकर पुनः सृष्टि आरम्भ कर दी। गणरूया अनन्त सृष्टियाँ पृथक्-पृथक् उत्पन्न हुई। उससे महालक्ष्मीमय व्यक्त जगत् हुआ। महासनातनी महालक्ष्मीदेवी सृष्टिके अनेकत्वको देखकर आश्चर्यचकित हो गयीं और सर्वेश्वर भगवान् के पास आयी तथा अव्यक्त मङ्गलरूप विष्णुको नमस्कारकर कहने लगौं- 'भगवन् । आप नित्य और शुद्धात्मा हैं, संसारमें बहुत-से प्राणी हो गये हैं, मैं इन लोगोंको गणना कैसे कर सकती हूँ।' महालक्ष्मीके इस वचनको सुनकर वे बहा दो रूपों में विभक्त हो गये। पूर्वार्थसे रक्ताङ्ग और परार्धरो गौराङ्ग। रक्ताङ्ग और गौराङ्ग दोनों चतुर्भुज हुए। सम्पूर्ण स्टिाणोंका स्वामी रक्ताङ्ग गणेश हुजा, वही ईश्वर कहलाता है। परासे उत्पन्न गौरवर्ण जो चतुर्भुजो है उसका ध्यान योगीलोग करते हैं, वह निरजन है।
एक बार पार्वतीवल्लप भगवान् शिवने एक हजार वर्षक प्रयत्नपूर्वक गणेशको पूजा की। तब
शर्वपूजक भगवान् गणेशने प्रसन्न होकर पार्वतीसहित हरको वर माँगनेके लिये कहा। इसपर भगवान् शंकरने उनकी भक्तिपूर्वक इस प्रकार स्तुति की-
नमो विष्णुस्वरूपाय गणेशाय परात्मने।
चतुर्भुजाय रक्ताय यज्ञपूर्णकराय च।
विमहन्त्रे जगद्धः सर्वानन्दप्रदायिने।
सिद्धीनां पतये तुभ्यं निधीनां पतये नमः ।।
प्रसन्नो भव देवेश पुत्रो भव मम प्रियः ।
(प्रतिसर्गपर्व ४ । १२ । ९०-९२)
'विष्णुस्वरूप परात्मा गणेशको नमस्कार है। चतुर्भुजधारी, रक्तवर्ण, यज्ञमूर्ति, विघ्नहन्ता, जगत्का धारण-पोषण करनेवाले, सभीके आनन्ददाता, निधिपति तथा सिद्धिपति भगवान् गणेश! आपको नमस्कार है। देवेश! आप प्रसन्न हों, मेरे प्रिय पुत्रके रूपमें उत्पन्न हों।' इसपर गणेशजी पार्वतीजीके तेजोमय शरीरसे उत्पन्न हुए। इन्द्रके साथ सभी देवगण कैलासशिखरपर उनका मङ्गलमय दर्शन करनेके लिये आये। वहाँ सर्वसुखद महोत्सव हो रहा था। इसी समय क्रूरदृष्टि कालात्मा, सूर्यपुत्र शनिदेव मण्डपमें आये। उनके दर्शनमात्रसे वह बालक मस्तकविहीन हो गया। तब गुह्यकोंके निवासस्थान उस कैलासमें महान् हाहाकार मच गया। वह कटा हुआ सिर सूर्यके तुला राशिस्थ होनेपर चन्द्रलोकमें स्थित हो सत्ताईस दिनतक पृथ्वीपर प्रकाशित होता है। सभी देवताओंसे विनिन्दित भयंकर शनिदेवने एक दौत्वाले गजके हुए गस्तकाको काटकर उस बालकके स्कन्धपर जोड़ दिया और ब्रह्माने उसको माताके द्वारा स्तुति किये जानेपर कर्कटके सिरको मजके ऊपर स्थितकर गजयोनिवाला बना दिया और कर्कटको बिना सिरका कर दिया। इस प्रकार साक्षात् इधरस्वरूप गजानन गणेश उत्पन्न हुए।
सूतजी ने कहा- बृहस्पतिसे ऐसा सुनकर भगवान् गणेशने अपने मुखसे स्कन्ध उत्पन्न किया और वही ईश्वररूप स्कन्ध काशीमें एक दैवज्ञ द्विजके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ और महीतलमें कुंडिराजके नामसे प्रसिद्ध हुआ। फलितज्योतिषके 'जातकाभरण' नामक ग्रन्थका निर्माण कर वह वेदकी रक्षाके लिये शंकराचार्यके पास आया। वह प्रसन्नात्मा उनका शिष्य होकर गुरुसेवामें तत्पर हो गया। (अध्याय १२)