शौनकने पूछा-त्रिकालज्ञ महामुने! उस प्रद्योतने कैसे म्लेच्छ -यज्ञ किया? मुझे यह सब बतलायें। श्रीसूतजीने कहा -महामुने! किसी समय क्षेमकके पुत्र प्रद्योत हस्तिनापुरमें विराजमान थे। उस समय नारदजी वहाँ आये। उनको देखकर प्रसन्न हो राजा प्रद्योतने विधिवत् उनको पूजा की। सुखपूर्वक बैठे हुए मुनिने राजा प्रद्योतसे कहा 'लेच्छोंके द्वारा मारे गये तुम्हारे पिता यमलोकको चले गये है। प्लेच्छ यज्ञके प्रभावसे उनकी नरकसे मुक्तिोगी और उन्हें स्वर्गीय गति प्राप्त होगी। अतः तुम म्लेच्छ यज्ञ करो।' यह सुनकर राजा प्रद्योतकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयौं। तब उन्होंने वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुलाकर कुरुक्षेत्रमें म्लेच्छ-यज्ञको तत्काल आरम्भ करा दिया। सोलह योजनमें चतुष्कोण यज्ञ कुण्डका निर्माण कर देवताओंका आवाहन कर उस राजाने म्लेच्छोंका हनन किया। ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर अभिषेक कराया। इस यज्ञके प्रभावसे उनके पिता क्षेमक स्वर्गलोक चले गये। तभीसे राजा प्रद्योत सर्वत्र पृथ्वीपर म्लेच्छहन्ता (म्लेच्छोंको मारनेवाले) नामसे प्रसिद्ध हो गये। उनका पुत्र वेदवान् नामसे प्रसिद्ध हुआ।
विभिन्न पुराणों में भगवान श्रीकृष्णको स्थिति कालका रल्लेख कुछ अनारसे प्राप्त होता है, विशेषकर महाभारत, भागवत, हरिवंश विष्णुपुराण तथा ब्रह्मवैवर्तपुरान और गर्गसंहितायें भी उनका विस्तृत चरित्र प्राप्त होता है। अधिकांश स्थलोपर उनका स्थितिकाला एक साँ पचीस वर्ष ही निर्दिक है।
२-इनके शासनकाला ही गङ्गा हस्तिनापुरके अधिकांश भागको बहा ले गयीं। अतः इन्होंने कौशाम्बीको राजधानी बनाया, जो प्रत्याराने चार योजन अशिम यौ। (विष्णधुराण अंश ८ अ० २१)
म्लेच्छरूपमें स्वयं कलिने ही राज्य किया था। अनन्तर कलिने अपनी पत्नीके साथ नारायणकी पूजाकर दिव्य स्तुति की; स्तुतिसे प्रसन्न होकर नारायण प्रकट हो गये। कलिने उनसे कहा-'हे नाथ] राजा वेदवान्के पिता प्रद्योतने मेरे स्थानका विनाश कर दिया है और मेरे प्रिय म्लेच्छोंको नष्ट कर दिया है।'
भगवान्ने कहा-कले! कई कारणोंसे अन्य युगोंको अपेक्षा तुम श्रेष्ठ हो। अनेक रूपोंको धारणकर मैं तुम्हारी इच्छाको पूर्ण करूँगा। आदम नामका पुरुष और हव्यवती (हाँवा) नामकी पत्नीसे म्लेच्छवंशोंकी वृद्धि करनेवाले उत्पन्न होंगे। यह कहकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये और कलियुगको इससे बहुत आनन्द हुआ। उसने नौलाचल पर्वतपर आकर कुछ दिनोंतक निवास किया।
राजा वेदवान्को सुनन्द नामका पुत्र हुआ और बिना संततिके ही वह मृत्युको प्राप्त हुआ। इसके बाद आर्यावर्त देश सभी प्रकार क्षीण हो गया और धीरे-धीरे म्लेच्छोंका बल बढ़ने लगा। तब नैमिषारण्यनिवासी अठासी हजार ऋषि-मुनि हिमालयपर चले गये और वे बदरी-क्षेत्रमें आकर भगवान् विष्णुकी कथा-वार्ता में संलग्न हो गये।
सूतजीने पुन: कहा-मुने! द्वापरयुगके सोलह हजार वर्ष शेष कालमें आर्य-देशको भूमि अनेक कीर्तियोंसे समन्वित रही; पर इतने समयमें कहीं शूद्र और कहीं वर्णसंकर राजा भी हुए। आठ हजार दो सौ दो वर्ष द्वापरयुगके शेष रह जानेपर यह भूमि म्लेच्छ देशके राजाओंके प्रभाव में आने लग गयी। म्लेच्छोंका आदि पुरुष आदम, उसको स्त्री हव्यवती (हौवा) दोनों इन्द्रियोंका दमनकर ध्यानपरायण रहते थे। ईथरले प्रदान नगरके पूर्वभागमें चार कोसवाला एक रमणीय महावनका निर्माण किया। पापवृक्षके नीचे जाकर कलियुग सर्परूप धारणकर हौवाके पास आया। उस धूर्त कलिने हौवाको धोखा देकर गूलरके पत्तोंमें लपेटकर दूषित वायुयुक्त फल उसे खिला दिया, जिससे विष्णुकी आज्ञा भंग हो गयी। इससे अनेक पुत्र हुए, जो सभी म्लेच्छ कहलाये। आदम पत्नीके साथ स्वर्ग चला गया। उसका श्वेत नामसे विख्यात श्रेष्ठ पुत्र हुआ, जिसकी एक सौ बारह वर्षकी आयु कही गयी है। उसका पुत्र अनुह हुआ, जिसने अपने पितासे कुछ कम ही वर्ष शासन किया। उसका पुत्र कीनाश था, जिसने पितामहके समान राज्य किया। महल्लल नामका उसका पुत्र हुआ, उसका पुत्र मानगर हुआ। उसको विरद नामका पुत्र हुआ और अपने नामसे नगर बसाया। उसका पुत्र विष्णुभक्तिपरायण हनूक हुआ। फलोंका हवन कर उसने अध्यात्मतत्त्वका ज्ञान प्रास किया। म्लेच्छधर्मपरायण वह सशरीर स्वर्ग चला गया। इसने द्विजोंके आचार-विचारका पालन किया और देवपूजा भी की, फिर भी वह विद्वानोंके द्वारा म्लेच्छ ही कहा गया। मुनियोंके द्वारा विष्णुभक्ति, अग्निपूजा, अहिंसा, तपस्या और इन्द्रियदमन-ये म्लेच्छोंके धर्म कहे गये हैं। हनूकका पुत्र मतोच्छिल हुआ। उसका पुत्र लोमक हुआ, अन्तमें उसने स्वर्ग प्राप्त किया। तदनन्तर उसका न्यूह नामका पुत्र हुआ, न्यूहके सीम, शम और भाव-ये तीन पुत्र हुए। न्यूह आत्मध्यानपरायण तथा विष्णुभक्त था। किसी समय उसने स्वप्रमें विष्णुका दर्शन प्राप्त किया और उन्होंने न्यूहसे कहा-'वत्स! सुनो, आजसे सातवें दिन प्रलय होगा। हे भक्त श्रेष्ठ | तुम सभी लोगोंके साथ नावपर चढ़कर अपने जीवनकी रक्षा करना। फिर तुम बहुत विख्यात व्यक्ति बन जाओगे। भगवान्की बात मानकर उसने एक सुदृढ़ नौकाका निर्माण कराया, जो तीन सौ हाथ लम्बी, पचास हाथ चौड़ी और तीस हाथ ऊँची थी और सभी जीवोंसे समन्वित थी। विष्णुके ध्यानमें तत्पर होता हुआ वह अपने वंशजोंके साथ उस नावपर चढ़ गया। इसी बीच इन्द्रदेवने चालीस दिनोंतक लगातार मेघोंसे मूसलधार वृष्टि करायी। सम्पूर्ण भारत सागरोंके जलसे प्लावित हो गया। चारों सागर मिल गये, पृथ्वी डूब गयी, पर हिमालय पर्वतका बदरी-क्षेत्र -पानीसे ऊपर ही रहा, वह नहीं डूब पाया। अट्ठासी हजार ब्रह्मवादी मुनिगण, अपने शिष्योंके साथ वहीं स्थिर और सुरक्षित रहे। न्यूह भी अपनी नौकाके साथ वहीं आकर बच गये। संसारके शेष सभी प्राणी विनष्ट हो गये। उस समय मुनियोंने विष्णुमायाकी स्तुति की।
मुनियोंने कहा-'महाकालीको नमस्कार है, माता देवकीको नमस्कार है, विष्णुपत्नी महालक्ष्मीको, राधादेवीको और रेवती, पुष्पवती तथा स्वर्णवतीको नमस्कार है। कामाक्षी, माया और माताको नमस्कार है। महावायुके प्रभावसे, मेघोंके भयंकर शब्दसे एवं उग्र जलकी धाराओंसे दारुण भय उत्पन्न हो गया है। भैरवि। तुम इस भयसे हम किंकरोंकी रक्षा करो।' देवीने प्रसन्न होकर जलकी वृद्धिको तुरंत शान्त कर दिया हिमालयको प्रान्तवर्ती शिषिणा नामकी भूमि एक वर्ष में जलके हट जानेपर स्थलके रूपमें दीखने लगी। न्यूह अपने वंशजोंके साथ उस भूमिपर आकर निवास करने लगा।
शौनकने कहा-मुलीबर ! प्रलसके बाद इस समय जो कुछ वर्तमान है, उसे अपनी दिव्य टिके प्रभावसे बानकर बतलायें।
सूतजी बोले-शौनक! न्यूह नामका पूनिर्दिष्ट म्लेच्छ राजा भगवान् विष्णुकी भक्तिमें लीन रहने लगा, इससे भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर उसके वंशकी वृद्धि की। उसने वेद-वाक्य और संस्कृतसे बहिर्भूत म्लेच्छ-भाषाका विस्तार किया और कलिकी वृद्धिके लिये ब्राह्मी भाषाको अपशब्दवाली भाषा बनाया और उसने अपने तीन पुत्रों-सीम, शम तथा भावके नाम क्रमशः सिम, हाम तथा याकूत रख दिये। याकूतके सात पुत्र हुए-जुम्र, माजूज, मादी, यूनान, तुवलोम, सक तथा तीरास। इन्हींके नामपर अलग-अलग देश प्रसिद्ध हुए। जुम्रके दस पुत्र हुए। उनके नामोंसे भी देश प्रसिद्ध हुए। यूनानकी अलग-अलग संतानें इलीश, तरलीश, कित्ती और हूदा-इन चार नामोंसे प्रसिद्ध हुई तथा उनके नामसे भी अलग-अलग देश बसे । न्यूहके द्वितीय पुत्र हाम (शम)-से चार पुत्र कहे गये हैं-कुश, मिश्र, कूज तथा कनआँ। इनके नामपर भी देश प्रसिद्ध हैं। कुशके छः पुत्र हुए- सवा, हबील, सर्वत, उरगम, सवतिका और महाबली निमरूह। इनकी भी कलन, सिना, रोरक, अवद, बावुन और रसनादेशक आदि संतानें हुई। इतनी बातें ऋषियोंको सुनाकर सूतजी समाधिस्थ हो गये।
बहुत वर्षीक बाद उनकी समाधि खुली और वे कहने लगे-'ऋषियो! अब मैं न्यूहके ज्येष्ठ पुत्र राजा सिमके वंशका वर्णन करता हूँ, म्लेच्छ राजा सिमने पांच सौ वर्षांतक भलीभाँति राज्य किया। अर्कन्सद उसका पुत्र था, जिसने चार सौ चौंतीस वर्षांतक राज्य किया। उसका पुत्र सिंहल हुआ, उसने भी चार सौ साठ वर्षातक राज्य
*ब्राह्मी को लिपियोंका मूल माना गया है। राजा न्यूह के ह्रदय में स्वयं प्रविष्ट होकर भगवान् विष्णुने उसकी बुद्धिको प्रेरित किया,इसलिये उसने अपनी लिपिको उलटी गतिसे दाहिने से बायीं ओर प्रकाशित किया जो उर्दू, अरबी, फारसी और हिब्रू की लेखन-प्रक्रियामें देखी जाती है।
किया। उसका पुत्र इन्न हुआ, उसने पिताके समान ही राज्य किया। उसका पुत्र फलज हुआ, जिसने दो सौ चालीस वर्षांतक राज्य किया। उसका पुत्र रक हुआ, उसने दो सौ सैंतीस वर्षांतक राज्य किया। उसके जूज नामक पुत्र हुआ, पिताके समान ही उसने राज्य किया। उसका पुत्र नहूर हुआ, उसने एक सौ साठ वर्षोंतक राज्य किया। हे राजन् ! अनेक शत्रुओंका भी उसने विनाश किया। नहरका पुत्र ताहर हुआ, पिताके समान उसने राज्य किया। उसके अविराम, नहूर और5 हारन-ये तीन पुत्र हुए।
हे मुने! इस प्रकार मैंने नाममात्रसे म्लेच्छ राजाऔंके वंशोंका वर्णन किया। सरस्वतीके शापसे ये राजा म्लेच्छ-भाषा-भाषी हो गये और आचारमें अधम सिद्ध हुए। कलियुगमें इनकी संख्याकी विशेष वृद्धि हुई, किंतु मैंने संक्षेपमें ही इन वंशोंका वर्णन किया। संस्कृत-पाषा भारतवर्ष में ही किसी तरह बची रही। अन्य भागोंमें म्लेच्छ-भाषा ही आनन्द देनेवाली हुई।
सूतजी पुनः बोले-भार्गवतनय महामुने शौनक ! तीन सहरन वर्ष कलियुगके बीत जानेपर अवन्ती नगरी में शक नामका एक राजा हुआ और म्लेच्छ देशमें शकोंका राजा राज्य करता था। इनकी अभिवृद्धिका कारण सुनो। दो हजार वर्ष कलियुगके बी। पानेपर म्लो वंशकी अधिक वृद्धि हुई और विश्वके अधिकांश भागकी भूमि म्लेच्छमयी हो गयी तथा भौति-भौतिके मत चल पड़े। सरस्वतीका तट ब्रह्मावर्त-क्षेत्र ही शुद्ध बचा था। मूशा नामका व्यक्ति म्लेच्छोंका आचार्य और पूर्व-पुरुष था। उसने अपने मतको सारे संसारमें फैलाया। कलियुगके आनेसे भारतमें देवपूजा और वेदभाषा प्राय: नष्ट हो गयी। भारतमें भी धीरे-धीरे प्राकृत और म्लेच्छ-भाषाका प्रचार प्रारम्भ हुआ। व्रजभाषा और महाराष्ट्री-ये प्राकृतके मुख्य भेद हैं । यावनी और गुरुण्डिका (अंग्रेजी) ग्लेच्छ-भाषाके मुख्य भेद हैं। इन भाषाओंके और भी चार लाख सूक्ष्म भेद हैं। प्राकृतमें पानीयको पानी और बुभुक्षाको भूख कहा जाता है। इसी तरहसे म्लेच्छ भाषामें पितृको पैतर-फादर और भ्रातृको बादर-ब्रदर कहते हैं। इसी प्रकार आहुतिको अजु, जानुको जैनु, रविवारको संडे, फाल्गुनको फरवरी और पष्टिको सिक्सटी कहते हैं। भारतमें अयोध्या, मथुरा, काशी आदि पवित्र सात पुरियाँ हैं, उनमें भी अब हिंसा होने लग गयी है। डाकू, शबर, भिल्ल तथा मूर्ख व्यक्ति भी आर्यदेश-भारतवर्ष में भर गये हैं। म्लेच्छदेशमें म्लेच्छ-धर्मको माननेवाले सुखसे रहते हैं। यही कलियुगकी विशेषता है। भारत और इसके द्वीपोंमें म्लेच्छोंका राज्य रहेगा, ऐसा समझकर हे मुनिश्रेष्ठ। आपलोग हरिका भजन करें। (अध्याय-५)
* पहले संस्करका सम्पूर्ण विश्वमें प्रचार या। वालीद्वीपमें अब भी इसका पूरा प्रचार है तच्या सुमात्रा, जावा, जापान आदि कुछ अंशामें इसका प्रचार है। बोर्नियों, इंडोनेशिया, कम्बोडिया और बोनमें भी इसका बहुत पहले प्रचार या। बीदमें संस्कटको बहुत उपेक्षा हुई. यह शर्मन, रूस और ब्रिटेनके निवासियोंके सत्प्रयास से अब पुन: इसका सभी विश्वविद्यालयों में अध्यापन होने लगा है। यों कहना चाहिये कि भारत में ही इसकी उपेक्षा हो रही है। पाशात्यों की चैज्ञानिक उन्नतिमें संस्कृतका ही मुख्य योगदान रहा है। यूरोपको गोय-भाषा संस्कृत बहुत मिलती थी। सभी सभ्य भाषाओं के व्याकरणोपर संस्कृत के व्याकरणका बहुत प्रभाव है । मोनियरविलियम तथा राउटर्नरने अपने-अपने कोशों में इसके अनेक अद्भुत उदाहरण उपस्थित किये हैं।