भविष्य महा पुराण

मुनिश्रेष्ठ कण्वके उपाध्याय, दीक्षित तथा पाठक आदि दस पुत्रोंकी उत्पत्ति, चैतन्यमहाप्रभु आदि आचार्योद्वारा शुद्धिपूर्वक वैष्णवधर्मका विस्तार

सूतजीने कहा- देवेन्द्र !भगवान् जगनाथके इन वचनोंको सुनकर कृष्णचैतन्यने भी प्रसन्नतापूर्वक कहा-'भगवन्। प्राणियों के कल्याणके लिये आप इस कथाको कुछ और विस्तारके साथ कहें।'

जगन्नाथजी बोले-महात्मन् ! प्राचीन काल में महर्षि कश्यपके पुत्र कण्वकी आर्यावती नामकी देवकन्या पनी हुई। इन्दकी आरसे दोनों कुरुक्षेत्रवाहिनी सरस्वती नदी के तटपर गये और कण्व चतुर्वेदमय सूक्तोंसे सरस्वतीदेबीकी स्तुति करने लगे। एक वर्ष बीत जानेपर वह देवी प्रसन्न न हो वहाँ आयीं और आर्योकी समृद्धिके लिये उन्हें वरदान दिया। वरके प्रभावसे कंपवके आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए-उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ल, मिश्र, अग्रिहोत्री, द्विवेदी, त्रिवेदी, पाण्ड्य और चतुर्वेदी। इन लोगोंका जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगोंने नतमस्तक हो सरस्वतीदेवीको

प्रसन्न किया। बारह वर्षकी अवस्थावाले उन लोगोंको भक्तवत्सला शारदादेवीने अपनी कन्याएँ प्रदान की। वे क्रमश: उपाध्यायी, दीक्षिता, पाठकी, शुक्लिका, मिश्राणी, अग्निहोत्रिणी, द्विवेदिनी, त्रिवेदिनी, पाण्ड्यायनी और चतुर्वेदिनी कहलायीं। फिर उन कन्याओंके भी अपने-अपने पतिसे सोलह-सोलह पुत्र हुए। वे सब गोत्रकार हुए। जिनका नाम इस प्रकार है-कश्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, गोतम, जमदग्नि, वसिष्ठ, वत्स, गौतम, पराशर, गर्ग, अत्रि, भृग, अंगिरा, शृंगी, कात्यायन और याज्ञवल्क्य  इन नामोंसे सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं। सरस्वतीकी आज्ञासे महर्षि कण्व मिस्रदेश आ गये और वहाँ दस हजार म्लेच्छोंको संस्कृत पढ़ाकर अपने वशमें कर लिया तथा स्वयं श्रेष्ठ ब्रह्मावर्तमें आ गये। उन लोगोंने सरस्वतीदेवीको तपस्यासे संतुष्ट किया । पाँच वर्षके बाद सरस्वतीदेवी प्रकट हुई और सपत्नीक उन म्लेच्छोंको शूद्रवर्णका बना दिया। वे सब कारुवृत्ति करनेवाले (शिल्पी) अनेक पुत्रोंसे समन्वित हुए। उनके मध्यमें दो हजार वैश्य हुए। उनके मध्यमें आचार्य पृथु नामका कश्यपसेवक था। उसने बारह वर्षतक तपस्याद्वारा महामुनिको संतुष्ट किया। महर्षि कण्वने प्रसन्न हो देवताओंके वरसे उन्हें क्षत्रिय राजा बनाया और उन्हें राजपुत्रपुर प्रदान किया। राजन्या नामको उनकी पत्नीने मागंध नामक पुत्रको जन्म दिया। उनको कण्वने पूर्व दिशामें मागध देश दिया। तदनन्तर कश्यपपुत्र काश्यप स्वर्गलोक चले गये। उनके स्वर्ग चले जानेपर शूद्रवर्णवाले उन म्लेच्छोंने यज्ञोंद्वारा देवाधिदेव शचीपति इन्द्रकी अर्चना की। इससे दुःखी होकर इन्द्र अपने बधुके साथ अपने अंशसे पुनः ब्रहायोनिमें पृथ्वीय उत्पन हुए।

जिन नामका कोई विप्र था और उसको पन्नीका नाम था जयनी। वे दोनों कश्यपद्वारा अदितिसे कोकटदेशमें उत्पन्न हुए थे। उनके द्वारा लोककल्याणके लिये आदित्य उत्पन्न हुए। कर्मनाशा* नदीके तटपर बोधगया नामक एक नगरी है। वहाँपर उन्होंने बौद्धशास्त्रसे समन्वित हो शास्त्रार्थ किया और शूद्रोंसे वेदको ग्रहणकर विशाला (बदरीक्षेत्र) नगरी चले गये और वहाँ समाधिस्थ मुनियोंको जगाकर उन्हें वेद प्रदान किया। तभीसे सभी देवगण भूतलको छोड़कर स्वर्ग चले गये। म्लेच्छगण बौद्ध हो गये और शेष सभी वेदपरायण हो गये। सरस्वतीको कृपासे उन आर्योकी संख्या बहुत बढ़ गयी। उन लोगोंने देवताओं और पितरोंको हव्य तथा कव्य समर्पित किया। इस प्रकार सभी लोग देवोपासनाद्वारा देवताओंको तृप्त करने लगे। सत्ताईस सौ वर्ष कलियुगके बीतनेपर बलिके द्वारा प्रेषित मय नामका महान् असुर भूमिपर आया । वह अनेक मायाओंका प्रवर्तक शाक्यसिंह गुरुके नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा गौतमाचार्य नामसे दैत्यपक्षको बढ़ानेवाला हुआ। उसने सभी तीथोपर मायामय यन्त्रोंको स्थापित किया। उसके नीचे जो ज्ञाता वह बौद्ध हो जाता। फलतः चारों और बौद्ध परिव्यास हो गये। प्रायः दस करोड़के लगभग आर्य बौद्धधाविलम्बी हो गये। शेष पाँच लाख पर्वतशिखरपर चले गये। अग्निवंशमें उत्पन्न राजाओंने चतुर्वेदके प्रभावसे बौद्धोंको पराजित किया और आर्योको सुसंस्कृतकर विन्ध्यपर्वतके दक्षिण में स्थापित किया तथा विन्ध्के उत्तरकी पुण्यभूमि आर्यावर्तम पाँच लाख लोग अवस्थित हुए।

सूतजीने पुन: कहा- शौनक ! चैतन्यमहाप्रभु भगवान जगन्नाथकी वाणीको सुनकर उनके शिष्य हो गये और वेदमार्गपरायण हो गये। पुत्र स्वामी नित्यानन्दको पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए वे भी जानाथपदको नमस्कार कर उनके शिष्य

*बोधगया फल्गु नदीके तटपर स्थित है। कर्मनाशा आजकल रोहतास, गाजीपुर भोजपुर और बनारस जिलेकी सीमा निर्धारित करती है।

हो गये। उषापति भगवान् अनिरुद्धने प्रसन्न हो उन दोनोंका अभिषेक कर महत्तत्त्वमें प्रतिष्ठित किया। उस दिनसे उन लोगोंकी भूतलमें 'महत्त्व' पदवी हो गयी। दोनों गुरुभाइयों (महाप्रभु और नित्यानन्द)- ने प्रसन्न होकर अपने शिष्योंसे कहा-'जो यहाँ-जगन्नाथजीमें पद्मनाभि उषापति भगवान् जगत्राथजीका दर्शन करेगा, वह स्वर्ग प्राप्त करेगा। जो यहकि प्रसादको सादर ग्रहण करेगा, वह करोड़ जन्मतक वेदज्ञ एवं धनाढ्य द्विज होगा। मार्कण्डेयवटके पास कृष्णका दर्शन कर जो महान् इन्द्रद्युम्रसरमें नान करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। श्रद्धा- भक्तिके साथ जो इस कथाको सुनेगा वह भी जगन्नाथपुरीमें जानेका फल प्राप्त कर लेगा।'

महाप्रभु चैतन्यने इस प्रकार भगवान् जगत्राथकी महिमा बतलायी। भगवान जगन्नाथने भी 'यज्ञांश-महाप्रभुकी बातें ठीक है ' ऐसा कहा और वे वहीं अन्तर्धान हो गये।

इसी बीचमें कलिने बलिसे प्रार्थना की। तब दुःखित हो बलिने मय दैत्यको बुलाकर कहा- 'दैत्येन्द्र! सुकन्दर नामक म्लेच्छपति हमलोगोंकी उन्नतिके लिये सदा तत्पर है। मेरी आज्ञाके अनुसार तुम उसकी सहायता करो।' बलिकी बात सुनकर ज्योतिर्विद्याविशारद वह दानव मय एक सौ दैत्योंके साथ कर्मभूमिमें आया और उसने दुश्म्लेच्छजातिको ज्योतिर्गणितसहित इक्कीस अध्यायवाले रेखागणितकी शिक्षा दी। तब ज्योतिर्विद्यामें पारङ्गत होकर उन म्लेच्छोंने सातों पुरियोंमें यन्त्रोंका निर्माण कराया। उन यन्त्रों के प्रभावसे वहाँ जो लोग थे. वे सब म्लेच्छाचको प्राल हो गये।

यह आदर्श देखकर सभी आर्य बहुत दुःखी हुए, सर्वत्र महान् कोलाहल और हाहाकार मच गया। वह करुणकन्दन सुनकर कृष्णचैतन्यके सेवक सभी वैष्णव गुरुके दिव्य मन्त्रको ग्रहणकर म्लेच्छोंको निष्प्रभावी करनेके लिये अलग-अलग पुरियों आदि स्थानोंकी ओर चले गये। रामानन्द शिष्यों के साथ अयोध्या आ गये और उन्होंने म्लेच्छयन्त्रको उलटाकर वहौंपर सभीको वैष्णव बना दिया। ललाटपर त्रिशूलके समान श्रीचिह बन गया, जो श्वेत-रक्तमय हुआ। कण्ठमें तुलसीकी माला और जिह्वा राममय हो गयी। इस प्रकार वे सभी म्लेच्छ रामानन्दके प्रभावसे वैष्णव हो गये । वे संयोगी वैष्णव कहलाये। शेष आर्य मुख्य वैष्णवरूपमें अयोध्यामें स्थित हुए। बुद्धिमान् निम्बादित्य अपने शिष्यों के साथ काशिकापुरी चले गये। वहाँ उन्होंने राजमार्गमें स्थित म्लेच्छयन्त्रको देखा। अपने गुरुके मन्त्रको विलोम करके वे वहाँ रहने लगे, जिससे म्लेच्छयन्त्र प्रभावशून्य हो गया। वे ललाटपर वंशपत्रके समान ऊध्वरेखा, कण्ठमें माला और मुखमें गोपीवल्लभके मन्त्रसे सुशोभित हुए। उनके पास उपस्थित सभी म्लेच्छ वैध्याव हो गये और वे संयोगी वैष्णव कहलाये, शेष सभी आर्य वैष्णवमार्गके अनुयायी हो गये। अपने गणों के साथ विष्णुस्वामी हरिद्वार गये। वहाँ स्थित म्लेच्छोंके महायन्त्रको उन्होंने विलोम कर दिया और जो लोग सेवामें आये वे सब-के-सब वैष्णव हो गये। ललाटमें दो रेखाओंसे समन्वित ऊर्ध्वपुण्ड और मध्य में बिन्दु, कण्ठमें तुलसीगोलक और मुख में कल्याणकारक माधवके मन्दसे सुशोभित होकर रहने लगे।

विष्णुभक्त मध्वाचार्य मधुराम आये और उन्होंने राजमार्ग स्थित म्लेच्छयचोंको देखकर विलोम

*इसका आशय सिकन्दर लोदोके हार। बलात् धर्मपरिवर्तित भारतीयों को आचार्य रामानन्द तथा चैतन्यमहाप्रभुद्वारा पुनः सद्धिपूर्वक सनातन हिन्दू बनाने में है। जैसा कि इन लोगोंके ग्रन्दों में सनातन गोस्वामी आदिकी जीवनियोंसे स्पष्ट है। पीठे स्वामी दयानन्द श्री इसीका अनुसरण किया।

कर दिया। उनके समीप जो लोग आये, वे उनके। पक्षगामी वैष्णव हो गये। उनके ललाटमें नासाके आधे भागतक करवीरपत्रके समान शुभ तिलक, कण्ठमें तुलसीकी माला और मुखमें राधाकृष्णका शुभ नाम विराजमान था। शैवमार्गपरायण शंकराचार्य* भी रामानुजकी आज्ञासे अपने गणों के साथ काशीपुरी आ गये। म्लेच्छयन्त्रको विलोम करके उनके अन्तर्गत आये सभी शैव हुए। इनके भालपर त्रिपुण्ड्र और कण्ठमें रुद्राक्षकी माला तथा मुखमें गोविन्दमन्त्र विराजमान था। रामानुज तोतादरी-तोताद्रिमें जाकर सुखी हो गये। उस समय उनके ललाटमें दो ऊध्वरेखाओंके बीचमें पीतिकावर्णकी सूक्ष्म रेखा और कण्ठमें तुलसीमाला विराजमान थी। गुणवान् वराहमिहिर उज्जयिनी आये और उन्होंने वहाँपर म्लेच्छयन्त्रोंको निकलकर सभी लोगोंको शैव बना लिया। उनके ललाटमें चिताभस्म, कण्ठमें रुद्राक्षकी माला और 'शिव' यह मङ्गलनाम मुख में विराजमान हुआ। वाणीभूषण कन्याकुब्ज-कान्यकुब्जमें आये। अर्धचन्द्राकार पुण्ड, रक्त चन्दनकी माला और देवीका निर्मल नाम उनके मुख में विराजमान था। धन्वन्तरिने प्रयागमें आंकर म्लेच्छयन्त्रको विलोम कर दिया। जो उनके संनिकट आये, वे उनके अनुयायी होकर ललाटपर अर्धपुण्ड्र और रक्तबिन्दुको धारण करनेवाले हुए। उनके कण्ठमें रक्त चन्दनकी मालाएँ शोभायमान हुई। धीमान् भट्टोजि श्रेष्ठ उत्पलारण्य गये। इन्होंने मस्तकपर लाल त्रिपुण्ड और कण्ठमें रुद्राक्षको माला धारण की एवं विश्वनाथ नामका सदा जप करने लगे। रोपण भी इष्टिका (एटा) आये। वहाँ उन्होंने म्लेच्छयन्त्रको निष्फलकर जन- जनमें ब्रह्ममार्गका प्रदर्शन किया। इसी प्रकार विष्णुभक्त जयदेव द्वारकामें आये, इससे वहाँपर उन म्लेच्छोंका यन्त्र निष्फल हो गया। उनके जो अनुयायी हुए उनके मस्तकपर एक लाल रेखा, कण्ठमें पद्माक्ष- कमलगट्टेकी माला और जिह्वापर 'गोविन्द' नाम विराजमान हुआ।

इस प्रकार वैष्णव, शैव और शाक्त अनेक संख्या में हो गये। शाक्त निर्गुण थे और वैष्णव सगुण। जो निर्गुण और सगुण थे, वे शैव कहलाये। नित्यानन्द शान्तिपुरमें, नदीहापत्तन नदिया हरि, मागध (मगहर देश) में कबीर, कलिंजरमें रैदास और सधन (सदन) नैमिषारण्यमें समाधिस्थ हो गये। आज भी यहाँ वैष्णवोंका महान् समुदाय वर्तमान है। इस प्रकार मय आदि दैत्य भी निष्फल होकर बलिके पास चले गये। (अध्याय २१)