राजा युधिष्ठिरने पूछा-भगवन्! यदि मनुष्य नक्षत्रपुरुष-व्रतको ग्रहण कर उसे न कर सके तो किस कर्मके द्वारा वह चीर्ण (कृत) माना जाता है, इसे बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्णा बोले-राजन् ! यह अत्यन्त रहस्यपूर्ण बात है। आपके आग्रहसे मैं इसे बतला रहा हूँ। अनेक प्रकारके उपद्रव, मद, मोह या असावधानी आदिसे यदि व्रत-भग्न हो जाये तो उनकी पूर्णताके लिये यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतके करनेसे खण्डित-व्रत पूर्ण फल देनेवाले हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। जिस देवी-देवताका व्रत भग्न हो जाय, उसकी सुवर्ण अथवा चाँदीकी प्रतिमा बनाकर उस व्रतके दिन ब्राह्मणको बुलाकर प्रतिमाको पञ्चामृतसे स्नान कराये, बादमें जलपूर्ण कलशके ऊपर प्रतिमाको प्रतिष्ठितकर गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप, वस्त्र, आभूषण तथा नैवेद्य आदिसे उनका पूजन करे। अनन्तर देवताके उद्देश्यसे नाणमन्त्र ( ॐ अमुक देवाय नमः ) द्वारा अर्घ्य 'प्रदान करे तथा फिर व्रतको पूर्णता एवं व्रत-भङ्गदोधकी निवृत्तिके लिये इस प्रकार क्षमा -प्रार्थना करे और भगवान् को शरण ग्रहण करे-
उपसत्रस्य दीनस्य प्रायश्चित्तक्त्ताञ्जलेः ।
शरणं च प्रपन्नस्य कुरुष्वाध दयां प्रभो॥
परत्र भयभीतस्य भगखण्डनतस्य च।
कुरु प्रसादं सम्पूर्ण व्रतं सम्पूर्णमस्तु मे ॥
तपश्छिद्रं वच्छिन्द्रं यच्छिद्रं भग्नके व्रते।
तब प्रसादाद्देवेश सर्वमच्छिन्नमस्तु नः॥
(उत्तरपर्व ११०।१३-१५)
तात्पर्य यह है कि 'प्रभो। मैं आपको शरण है, मुझपर आप दया करें। किसी भी प्रकारसे मेरे द्वारा किये गये व्रत, तप इत्यादि कमोंमें जो कोई भी टि, अपराध एवं युति हो गयी हो, हे देवदेवेश! आपके अनुग्नहसे वे सब दोष दूर हो जाये और मेरा व्रत पूर्ण हो जाय। आपको नमस्कार है।'
तदनन्तर दिक्पालोंको अर्घ्य प्रदान कर मुख्य देवताकी अङ्ग-पूजा करे और अन्तमें फिर प्रार्थना करे। ब्राह्मणका पूजन करे और ब्राह्मण भी व्रतकी पूर्णताके लिये इस प्रकार आशीर्वाद प्रदान करे-
वाक्सम्पूर्ण मनः पूर्ण पूर्ण कायव्रतेन ते।
सम्पूर्णस्य प्रसादेन भव पूर्णमनोरथः ॥
ब्राह्मणा यत्प्रभाषन्ते हनुमोदन्ति देवताः।
सर्वदेवमया विप्रा नैतद्वचनमन्यथा ।।
जलधिः क्षारतां नीतः पावकः सर्वभक्षताम्।
सहस्रनेत्रः शक्रोऽपि कृतो विप्रैर्महात्मभिः ।।
ब्राह्मणानां तु वचनाद् ब्राहत्या प्रणश्यति ।
अश्वमेधफलं साग्रं प्राप्यते नात्र संशयः ।।
व्यासवान्मीकिवचनाद् ब्राह्मणवचनाच्च गर्गगौतम-
पराशरधौम्याङ्गिरसबसिष्ठनारदादिमुनिवचनात् सम्पूर्ण भवतु ते व्रतम्।।
(उत्तरपर्व ११० ॥ २३-२७)
यजमान भी ब्राह्मणको बिदा कर सब सामग्री उसके घर भेज दे। पीछे पञ्चयज्ञ कर भोजन करे। इस सम्पूर्ण ब्रतको जो एक बार भी भक्तिसे करता है, वह खण्डित-व्रतका सम्पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है और व्रत- भनके पापसे मुक्त हो जाता है। इस व्रतको जो करता है, वह धन, रूप, आरोग्य, कीर्ति आदि प्राप्त कर सौ वर्षपर्यन्त भूमिपर सुख भोगकर स्वर्ग प्राप्त करता है और अन्तमें मोक्षको प्राप्त होता है। महाराज ! प्रायश्चित्तरूप इस सम्पूर्ण व्रतको प्रसन्न हो महर्षि गर्गजीने मुझे बताया था और बाल्यावस्थामें मैंने भी इसे किया था। इसलिये राजन् ! आप भी इस व्रतको करें, जिससे जन्मान्तरोंमें भी किये खण्डित व्रत पूर्ण हो जायें।
राजन् ! इसी प्रकार एक अन्य पण्यस्त्री-व्रत है, जो रविवारको हस्त, पुष्य अथवा पुनर्वसु नक्षत्र आनेपर प्रारम्भ किया जाता है तथा उसमें विधिपूर्वक विष्णुस्वरूप कामदेवका पूजन किया जाता है, अन्समें सभी उपकरणोंसे युक्त शय्या तथा विष्णुप्रतिमा ब्राह्मणको दान कर दी जाती है। व्रती स्त्रीको चाहिये कि वह सदाचारके नियमोंका पालन करती रहे। इस व्रतके करनेसे पण्यस्त्रियों-जैसी अधम स्त्रियोंका भी उद्धार हो जाता है। (अध्याय ११०-१९९)