भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज ! अब मैं भगवान् विष्णुके विभूतिद्वादशी नामक सर्वोत्तम व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो सम्पूर्ण देवगणोंद्वारा अभिवन्दित है। बुद्धिमान् मनुष्य कार्तिक, वैशाख, मार्गशीर्ष, फाल्गुन अथवा आषाढ़ मासमें शुक्ल पक्षकी दशमी तिथिको स्वल्पाहार कर सायंकालिक संध्योपासनासे निवृत्त हो इस प्रकारका नियम ग्रहण करे-'प्रभो! मैं एकादशीको निराहार रहकर भगवान् जनार्दनकी भलीभाँति अर्चना करूंगा और द्वादशीके दिन ब्राह्मणके साथ बैठकर भोजन करूंगा। केशव मेरा यह नियम निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण हो जाय और फलदायक हो।' फिर रातमें ॐ नमो नारायणाय' मन्त्रका जप करते हुए सो जाय। प्रात:काल उठकर स्नान-जप आदि करके पवित्र हो श्वेत पुष्यों की माला एवं चन्दन आदिसे भगवान् पुण्डरीकाक्षका पूजन करे। एक वर्षतक प्रतिमास क्रमशः भगवान्के दस अवतारों तथा दत्तात्रेय और व्यासकी स्वर्णमयी प्रतिमाका स्वर्णनिर्मित कमलके साथ दान करना चाहिये । उस समय छल, कपट, पाखण्ड आदिसे दूर रहना चाहिये। राजन्! इस प्रकार यथाशक्ति बारहों द्वादशी व्रतोको
*इस व्रतका वर्णन मत्स्यपु पशुप0 विष्णुधर्मो व्रतराज व्रतकल्पदुम आदि भी यों ही प्राप्त होता है। पादीय कथामें तीर्थगुरु पुष्कक्षेत्रका भी सम्बन्ध प्रदृष्ट हैं।
समास कर वर्षके अन्त में गुरुको लवणपर्वतके साथ-साथ गौसहित शय्या-दान करना चाहिये।व्रती यदि सम्पत्तिशाली हो तो उसे वस्त्र, शृङ्गार-सामग्री और आभूषण आदिसे गुरुकी विधिपूर्वक पूजा कर ग्राम अथवा गृहके साथ-साथ भूमिका दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार अन्यान्य ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर उन्हें वस्त्र, गोदान, रत्नसमूह और धनराशियोंद्वारा संतुष्ट करना चाहिये। स्वल्प धनवाला व्रती अपनी सामर्थ्यके अनुसार दान करे तथा जो व्रती परम निर्धन हो, किंतु भगवान् माधवके प्रति उसकी प्रगाढ़ निष्ठा हो तो उसे तीन वर्षतक पुष्पार्चनकी विधिसे इस व्रतका पालन करना चाहिये । जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह स्वयं पापसे मुक्त होकर अपने सौ पीढ़ियोंतकके पितरोंको तार देता है। उसे एक लाख जन्मोतक न तो शोकरूप फल्नका भागी होना पड़ता है, न व्याधि और दरिद्रता ही घेरती है तथा न बन्धन में ही पड़ना पड़ता है । वह प्रत्येक जन्ममें विष्णु अथवा शिवका भक्त होता है । राजन् ! जबतक एक सौ आठ सहरू युग नहीं बीत जाते, तबतक वह स्वर्गलोकमें निवास करता है और पुण्य क्षीण होनेपर पुनः भूतलपर राजा होता है।
भगवान् श्रीकृष्णने पुन: कहा-महाराज! बहुत पहले रथन्तरकल्पमें पुष्पवाहन नामका एक राजा हुआ था, जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात तथा तेजमें सूर्यके समान था। उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर ब्रह्माने उसे एक सोनेका कमल ( रूप विमान) प्रदान किया था, जिससे वह इच्छानुसार जहाँ कहीं भी आ-जा सकता था। उसे पाकर उस समय राजा पुष्पवाहन अपने नगर एवं जनपदवासियों के साथ उसपर आरूढ़ होकर स्वेच्छानुसार देवलोकमें तथा सातों द्वीपोंमें विचरण किया करता था, कल्पके आदिमें
पुष्करनिवासी उस पुष्पवाहनका सातवे द्वीपफ्र अधिकार था, इसीलिये लोकमें ठसकी प्रतिष्ठा थी और मागे चलकर वह द्वीप पुष्करद्वीपके नामसे कहा जाने लगा। चूंकि देवेश्वर ब्रह्माने इसे कमलरूप विमान प्रदान किया था, इसलिये देवता एवं दानव उसे पुष्पवाहन कहा करते थे। तपस्याके प्रभावसे ब्रह्माद्वारा प्रदत्त कमलरूप विमानपर आरूढ़ होनेपर उसके लिये त्रिलोकीमें कोई भी स्थान अगम्य न था। नरेन्द्र ! उसकी पत्नीका नाम लावण्यवती था। वह अनुपम सुन्दरी धी तथा हजारों नारियोंद्वारा चारों ओरसे समादृत होती रहती थी। वह राजाको उसी प्रकार अत्यन्त प्यारी थी, जैसे शंकरजीको पार्वतीजी परम प्रिय हैं। उसके दस हजार पुत्र थे, जो परम धार्मिक और धनुर्धारियोंमें अग्रगण्य थे। अपनी इन सारी विभूतियोंपर बारम्बार विचारकर राजा पुष्पवाहन विस्मय-विमुग्ध हो जाला था। एक बार (प्रचेताके पुत्र) मुनिवर वाल्मीकि राजाके यहाँ पधारे। उन्हें आया देखकर राजाने उनसे इस प्रकार प्रश्न किया-
राजा पुष्पवाहनने पूछा-मुनीन्द्र ! किस कारणसे मुझे यह देवों तथा मानबोंद्वारा पूजनीय निर्मल विभूति तथा अपने सौन्दर्यसे समस्त देवाङ्गनाओंको पराजित कर देनेवाली सुन्दरी भार्या प्राप्त हुई है। मेरे थोड़े- से तपसे संतुष्ट होकर ब्रह्माने मुझे ऐसा कमल-गृह क्यों प्रदान किया, जिसमें अमात्य, हाथी, रथसमूह और जनपदवासियोसहित यदि सौ करोड़ राजा बैठ जायँ तो भी वे जान नहीं पडते कि कहाँ चले गये। वह विमान तारागणों, लोकपालों तथा देवताओंके लिये भी अलक्षित सा रहता है। प्रचेत: ! मैंने, मेरी पुत्रीने अथवा मेरी भार्याने पूर्वजन्मों में कौन-सा ऐसा कर्म किया है, जिसका प्रभाव आज दिखलायी पड़ रहा है, इसे आप बतलायें।
तदनन्तर महर्षि वाल्मीकि राजाके इस आकस्मिक
"बाल्मीकीय रामायण, उत्तरकाण्ड ९३ । १७, २६।१०, १११। ११ तथा अध्यात्मरामायण ७।७।३१. बालरामायण, उत्तररामचरित आदिके अनुसार 'प्राचेतस' शब्द महर्षि वाल्मीकिका ही वाचक है।
एवं अद्भुत प्रभावपूर्ण वृत्तान्तको जन्मान्तरसे सम्बन्धित जानकर इस प्रकार कहने लगे-'राजन्! तुम्हारा पूर्वजन्म अत्यन्त भीषण व्याधके कुलमें हुआ था। एक तो तुम उस कुलमें पैदा हुए, फिर दिन-रात पापकर्ममें भी निरत रहते थे। तुम्हारा शरीर भी कठोर अङ्ग संधियुक्त तथा बेडौल था। तुम्हारी त्वचा दुर्गन्धयुक्त थी और नख बहुत बढ़े हुए थे। उससे दुर्गन्ध निकलती थी और तुम बड़े कुरूप थे। उस जन्ममें न तो तुम्हारा कोई हितैषी मित्र था, न पुत्र और न भाई-बन्धु ही थे, न पिता-माता और बहिन ही थी। भूपाल ! केवल तुम्हारी यह परम प्रियतमा पनी ही तुम्हारी अभीष्ट परमानुकूल संगिनी थी। एक बार कभी भयंकर अनावृष्टि हुई, जिसके कारण अकाल पड़ गया। उस समय भूखसे पीड़ित होकर तुम आहारकी खोजमें निकले, परंतु तुम्हें कुछ भी जंगली (कन्द-मूल ) फल आदि कोई खाद्य वस्तु प्राप्त न हुई। इतने में ही तुम्हारी दृष्टि एक सरोवरपर पड़ी, जो कमलसमूहसे मण्डित था। उसमें बड़े बड़े कमल खिले हुए थे। तब तुम उसमें प्रविष्ट होकर बहुसंख्यक कमल-पुष्पोंको लेकर वैदिश नामक नगर (विदिशा नगरी) में चले गये। वहाँ तुमने उन कमल पुष्पोंको बेचकर मूल्य-प्रासिके हेतु पूरे नगरमें चक्कर लगाया। सारा दिन बीत गया, पर उन कमल-पुष्योका कोई खरीददार न मिला। उस समय तुम भूखसे अत्यन्त व्याकुल और थकावटसे अतिशय क्लान्त होकर पत्नीसहित एक महलके प्राङ्गणमें बैठ गये। वहाँ रात्रि में तुम्हें महान् मङ्गल शब्द सुनायो पड़ा। सुनकर तुम पत्नीसहित उस स्थानपर गये, जहाँ वह मङ्गल शब्द हो रहा था। वहाँमण्डपके मध्यभागमें भगवान् विष्णुको पूजा हो रहो धो। तुमने उसका अवलोकन किया। वहाँ अनलवती नामकी वेश्या माघ मासको वितिद्वादशी व्रतको समाप्ति कर अपने गुरुको भगवान् हषीकेशका विधिवत् भतार कर स्वर्णगय कल्पवृक्ष, श्रेष्ठलवणाचल और समस्त उपकरणोंसहित शय्याका दान कर रही थी। इस प्रकार पूजा करती हुई अनङ्गवतीको देखकर तुम दोनोंकेमनमें यह विचार जाग्रत् हुआ कि इन कमलपुष्पोंसे क्या लेना है।अच्छा तो यह होता कि इनसे भगवान् विष्णुका शृङ्गार किया जाता।नरेश्वर! उस समय तुम दोनों पति-पत्नीके मनमें ऐसी भक्ति उत्पन्न हुई और इसी अचकि प्रसङ्गमें तुम्हारे उन पुष्पोंसे भगवान् केशव और लवणाचलकी अर्चना सम्पन्न हुई तथा शेष पुष्प-समूहोंसे तुम दोनोंने शय्याको भी सब ओरसे सुसज्जित किया।
तुम्हारी इस क्रियासे अनङ्गवती बहुत प्रसन्न हुई। उस समय उसने तुम दोनोंको इसके बदले तीन सौ अशर्फियाँ देनेका आदेश दिया, पर तुम दोनोंने बड़ी दृढ़तासे उस धन-राशिको अस्वीकार कर दिया। भूपते ! तब अनङ्गवतीने तुम्हें (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) चार प्रकारका अन्न लाकर दिया और कहा-'भोजन कीजिये', किंतु तुम दोनोंने उसका भी परित्याग कर दिया और कहा- 'वरानने ! हमलोग कल भोजन कर लेंगे । दृढव्रते ! हम दोनों जन्मसे ही पापयरायण और कुकर्म करनेवाले हैं, पर इस समय तुम्हारे उपवासके प्रसङ्गसे हमें विशेष आनन्द प्राप्त हो रहा है।' उसो प्रसङ्गमें हुम दोनों को धर्मका लेशांश प्राप्त हुआ और तुम दोनोंने रातभर जागरण भी किया था। (दूसरे दिन) प्रात:काल अनङ्गवतीने भक्तिपूर्वक अपने गुरुको लवणाचलसहित शय्या और अनेकों गाँव प्रदान कियें। उसी प्रकार उसने अन्य बारह ब्राह्मणों को भी सुवर्ण, वस्त्र, अलंकारादिसहित बारह गौएँ प्रदान की। तदनन्तर सुहद, मित्र, दीन, अंधे और दरिद्रोंके साथ तुम लुब्धक दाम्पतिको भोजन कराया और विशेष आदर-सत्कारके साथ तुम्हें विदा किया।
राजेन्द्र ! वह सपत्नीक लुब्धक तुम्ही थे, जो
*यह इतिहास-पुराणादिमें अति प्रसिद्ध विदिश नामकी नदीके तटपर वसा मध्यप्रदेश के मध्यकालीन इतिहास बेसनगर, आजकलका भेलसा नगर है। इसपर कनिंघमका भेलसा दौप्स ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं।
इस समय राजराजेश्वरके रूपमें उत्पन्न हुए हो। उस कमल-समूहसे भगवान् केशवका पूजन होनेके कारण तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो गये तथा दृढ़ त्याग, तप एवं निर्लोभिताके कारण तुम्हें इस कमलमन्दिरकी भी प्राप्ति हुई है। राजन् ! तुम्हारी उसी सात्त्विक भावनाके माहात्म्यसे, तुम्हारे थोड़े- से ही तपसे ब्रह्मरूपी भगवान् जनार्दन तथा लोकेश्वर ब्रह्मा भी संतुष्ट हुए हैं। इसीसे तुम्हारा पुष्कर- मन्दिर स्वेच्छानुसार जहाँ-कहीं भी जानेकी शक्तिसे युक्त है। वह अनङ्गवती वेश्या भी इस समय कामदेवकी पत्नी रतिके * सौतरूपमें उत्पन्न हुई है यह इस समय प्रीति नामसे विख्यात है और समस्त लोकोंमें सबको आनन्द प्रदान करती तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा सत्कृत है। इसलिये राजराजेश्वर! तुम उस पुष्कर-गृहको भूतलपर छोड़ दो और गट्टातटका आश्रय लेकर विभूतिद्वादशी-बतका अनुष्ठान करो। उससे तुम्हें निश्चय ही मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी।
श्रीकृष्णने कहा-महाराज! ऐसा कहकर प्रचेतामुनि वहाँ अन्तर्हित हो गये। तब राजा पुष्पवाहनने मुनिके कथनानुसार सारा कार्य सम्पन्न किया। राजन्! इस विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करते समय अखण्ड-वलका पालन करना आवश्यक है। जिस किसी भी प्रकारसे हो सके, बारहों द्वादशियोंका व्रत कमल-पुष्पोंद्वारा सम्पन्न करना चाहिये। अनघ ! अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को दक्षिणा भी देनेका विधान है। इसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि भक्तिसे ही भगवान् केशव प्रसन्न होते हैं। जो मनुष्य पायोको विदीर्ण करनेवाले इस व्रतको पढ़ता या श्रवण करता है अथवा इसे करने के लिये सम्मति प्रदान करता है, वह भी सौ करोड़ वर्षांतक देवलोक में निवास करता है।