भविष्य महा पुराण

श्रीवृक्षनवमी-व्रत-कथा

भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महाराज! देवता और दैत्योंने जब समुद्र-मन्थन किया था, तब उस समय समुद्रसे निकली हुई लक्ष्मीको देखकर सभीको यह इच्छा हुई कि मैं ही लक्ष्मीको प्राप्त कर लूँ। लक्ष्मीको प्राप्तिको लेकर देवता और दैत्योंमें परस्पर युद्ध होने लगा। उस समय लक्ष्मीने कुछ देरके लिय बिल्ववृक्षका आश्रय ग्रहण कर लिया। भगवान् विष्णुने सभीको जीतकर लक्ष्मीका वरण किया। लक्ष्मीने बिल्ववृक्षका आश्रय ग्रहण किया था, इसलिये उसे श्रीवृक्ष भी कहते हैं। अतः भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी नवमी तिथिको श्रीवृक्ष-नवमी-व्रत करना चाहिये। सूर्योदयके समय भक्तिपूर्वक अनेक पुष्पों, गन्ध, वस्त्र, फल, तिलपिष्ट, अन्न, गोधूम, धूप तथा माला आदिसे निम्नलिखित मन्त्रसे बिल्ववृक्षकी पूजा करे-

श्रीनिवास नमस्तेऽस्तु श्रीवृक्ष शिववल्लभ।

ममाभिलषितं कृत्वा सर्वविघ्रहरो भव ॥

इस विधिसे पूजा कर श्रीवृक्षकी सात प्रदक्षिणा कर उसे प्रणाम करे। अनन्तर ब्राह्मणभोजन कराकर श्रीदेवी प्रीयताम्' ऐसा कहकर प्रार्थना करे। तदनन्तर स्वयं भी तेल और नमकसे रहित बिना अग्निके संयोगसे तैयार किया गया भोजन, दही, पुष्प, फल आदिको मिट्टीके पात्र में रखकर मौन हो ग्रहण करे। इस प्रकार भक्तिपूर्वक जो पुरुष या स्त्री श्रीवृक्षका पूजन करते हैं, वे अवश्य ही सभी सम्पत्तियोंको प्राप्त करते हैं। (अध्याय ६०)