ब्रह्माजी बोले-विष्णो! फाल्गुन मासमें शुक्ल पक्षकी सप्तमीको उपवास करके भगवान् सूर्यनारायणकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् दूसरे दिन अष्टमीको प्रात: उठकर स्नानादिसे निवृत्त हो भक्तिपूर्वक सूर्यदेवका सम्यक् पूजन करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा देनी चाहिये। श्रद्धापूर्वक भगवान् सूर्यके निमित्त आहुतियाँ प्रदान कर भगवान् भास्करको प्रणाम कर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-
यमाराध्य पुरा देवी सावित्री कामनाय वै।
स मे ददातु देवेश: सर्वान् कामान् विभावसुः ।।
यमाराध्यादितिः प्राप्ता सर्वान्कामान् यथेप्सितान्।
सददात्वखिलान्कामान् प्रसन्नो मे दिवस्पतिः॥
भ्रष्टराज्यश्च देवेन्द्रो यमभ्यर्च्य दिवस्पतिः।
कामान् सम्प्राप्तवान् राज्यं स मे कामं प्रयच्छतु ।।
(ब्राह्मपर्व १०५।५-७)
'प्राचीन समयमें देवी सावित्रीने अपनी अभीष्ट- सिद्धिके लिये जिन आराध्यदेवकी आराधना की प्र थी, वही मेरे आराध्य भगवान् सूर्य मेरी सभी कामनाओंको प्रदान करें। देवी अदितिने जिनकी आराधना करके अपने सभी अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त कर लिया था, वही दिवस्पति भगवान् भास्कर प्रसन्न होकर मेरी सभी अभिलाषाओंको पूर्ण करें। (दुर्वासा मुनिके शापके कारण) राजपदसे च्युत देवराज इन्द्रने जिनकी अर्चना करके अपनी सभी कामनाओंको प्राप्त लिया था, वही दिवस्पति मेरी कामना पूर्ण करें।
हे गरुडध्वज! इस प्रकार भगवान सूर्य की प्रार्थना कर पूजा सम्पन्न करे। अनन्तर संयत होकर हविष्यान्नका भोजन करे। फाल्गुन, चैत्र, वैशाख और ज्येष्ठ-इन चार मासोंमें इस प्रकारसे व्रतकी पारणा करनेका विधान है। भक्तिपूर्वक करवीरके पुष्पोंसे चारों महीने सूर्यको पूजा करनी चाहिये। कृष्ण अगरुको धूप जलानी चाहिये और गो-शृङ्गका जल प्राशन करना चाहिये तथा खाँड-मिश्रित पक्कानका नैवेद्य देकर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये।
आषाढ़ आदि चातुर्मासमें पारणकी क्रिया इस प्रकार है -इन महीनोंमें चमेलीके पुष्प, गुग्गुलका धूप, कुएँका जल और पायसके नैवेद्यका विधान है। स्वयं भी उसी पायसके नैवेद्यको ग्रहण करना चाहिये।
कार्तिक आदि चातुर्मासमें गोमूत्रसे शरीर-शोधन करना चाहिये। दशाङ्ग-धूप, रक्त कमल तथा कसारका नैवेद्य भगवान् सूर्यको निवेदित करना चाहिये। प्रत्येक महीने में ब्राह्मणोंको दक्षिणा देनी चाहिये। प्रत्येक पारणामें भक्तिपूर्वक सूर्यनारायणको प्रसन्न करनेका प्रयास करना चाहिये और यथाशक्ति संचित धनका दान करना चाहिये। वित्तशाठ्यता (कंजूसी) न करे। क्योंकि सद्भावसे पूजा करनेपर तथा दान आदिसे सात घोड़ोंसे युक्त रथपर आरूढ़ होनेवाले भगवान् सूर्य प्रसन्न होते हैं। पारणाके अन्तमें यथाशक्ति जल आदिसे स्नान कराकर पूजा करनेपर भगवान् सूर्य प्रसन्न हो निर्बाधरूपसे मनोवाञ्छित फल प्रदान करते हैं। यह सप्तमी पुण्यदायिनी, पापविनाशिनी तथा सभी फलोंको देनेवाली है। मनुष्यकी जैसी अभिलाषाएँ होती हैं, वैसे ही फल प्राप्त होते हैं। इस व्रतको करनेवाला व्यक्ति सूर्यके समान ही तेजस्वी बनकर स्वर्णमय विमानपर आरूढ़ हो सूर्यलोकको प्राप्त करता है
कर्पूरं चन्दनं मुस्तामगरुं तगरं तथा। ऊषणं शर्करा कृष्ण सुगन्ध सिंह तथा॥
दशाङ्गोऽयं स्मृतो धूपः प्रियो देवस्थ सर्वदा ॥
(ब्राह्मपर्व १०५।१५-१६)
कपूर, चन्छन्, नागरमोथा, अगरु, तगर, ऊषण, शर्करा, दालचीनी, कस्तूरी तथा सुगन्ध-इन्हें समभागामें मिलाकर दशाङ्ग नामक धूप बनाया जाता है। यह धूप भगवान् सूर्यदेवको सर्वदा प्रिय है।
तथा वहाँ शाश्वती शान्तिको प्राप्त करता है। वहाँसे पुनः पृथ्वीपर जन्म लेकर उन गोपति सूर्यभगवान्की ही कृपासे प्रतापी राजा होता है।
इसी प्रकार उत्तरायणके सूर्यमें शुक्ल पक्षमें भग, अर्यमा, सूर्य आदिके नक्षत्रोंके पड़नेपर दान-मानसे भगवान् सूर्यको पूजा कर उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। इससे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। इसे पापनाशिनी सप्तमी कहा जाता है। (अध्याय १०५-१०६)
Summary of chapter 67 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
The Kalpavṛkṣa dāna is the gift of a golden tree fashioned with five great branches, each branch hosting one of the five supreme deities — Brahma, Viṣṇu, Śiva, Sūrya, and Devī — with corresponding images, jewels, and accessories. The donor, having installed the divine tree with full ritual, gives it to a brāhmaṇa at a sacred tīrtha. The variant Kalpabatā dāna — ten golden creepers given to ten brāhmaṇas — is described in Chapter 179 as an accessible form of the same gift.