भगवान् श्रीकृष्णने कहा-महामुने ! कृपाकर आप भोजकोंके सभी ज्ञानोंकी उपलब्धिका वर्णन करें।
व्यासजीने कहा-यह शरीर अस्थियोंपर ही खड़ा है, स्नायुओंसे बँधा, चपड़ेसे ढका एवं रक्त- मांससे उपलिप्त है।मल मूत्र आदि दुर्ग-भयुक्त पदार्थोसे भरा है। यह समस्त रोगोंका घर है और इसमें (भीतर) वृद्धावस्था और शोक छिपे हैं, जो अपने-अपने समयपर प्रकट होते रहते हैं। यह शरीर रजोगुण आदि गुणोंसे भरा है, अनित्य है और इसमें भूतसंघोंका आवास बना है। अत: इसमें आसक्तिका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये*।
*अस्थिस्थूलं स्रापुपुरां मांसरोणिलेपनम्। चर्माबनद्वं दुर्गन्धिपूर्ण मूत्रपुरीपपोः।।
जराशोकसमविष्टं रोगायतनमातुरम्। रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत्।।
(ग्रामपर्व १४५ ॥ २-३)
वृक्षोंके नीचे निवास करना, भोजनके लिये मिट्टीका भिक्षापात्र रखना, साधारण वस्त्र पहनना और किसीसे सहायता न लेना तथा सभी प्राणियोंमें समभाव रखना-यही जीवन्मुक्त पुरुषके लक्षण हैं।
जैसे तिलमें तैल, गायमें दूध, काष्ठमें अग्नि स्थित है, वैसे ही परमात्मा समस्त प्राणियोंमें स्थित हैं। ऐसा समझकर उनकी प्राप्तिका उपाय करना चाहिये। प्रथम प्रमथन स्वभाववाले तथा चञ्चल मनको प्रयत्नपूर्वक वशमें कर बुद्धि और इन्द्रियोंको वैसे ही रोकना चाहिये, जैसे पिंजरेमें पक्षियों को रोका जाता है। इन संयत इन्द्रियोंके द्वारा इस शरीरको अमृतकी धाराके समान तृप्ति होती है। प्राणायामसे शारीरिक दोष, धारणासे पूर्वजन्मार्जित तथा वर्तमानतकके सभी पाप, प्रत्याहारको संसर्गजनित दोष एवं ध्यानसे जैविक दोषोंका त्यागकर ईश्वरीय गुणोंको प्राप्त करना चाहिये। जैसे आगके तापमें रखनेसे धातुओंके दोष दग्ध हो जाते हैं, वैसे ही प्राणायामके द्वारा साधकके इन्द्रियजनित दोष दग्ध हो जाते हैं। जैसे एक हाथसे दूसरे माथको दबाया जाता है, वैसे ही अपनी शुद्ध बुद्धिके द्वारा मनको एवं चित्तको शुद्ध कर पवित्र भावनाओंके द्वारा दुर्व्यसनोंको शान्तकर मन बुद्धिको अत्यन्त पवित्र कर लेना चाहिये। अत: चित्तकी शुद्धिके लिये प्रयास करना चाहिये। चित्तकी शुद्धि होनेसे शुभ और अशुभ कर्मोंका ज्ञान होता है। शुभ और अशुभ कर्मोंसे छुटकारा प्रास कर साधक निर्द्वन्द्व, निर्मम, निष्परिग्रह और निरहंकार होकर मोक्षको प्रास कर लेता है।
सूर्यका पूर्वाह्य में रक्तवर्ण, ऋग्वेदस्वरूप तथा राजसरूप होता है। मध्याह्नमें शुक्लवर्ण, यजुर्वेद- स्वरूप एवं सात्त्विक रूप होता है। सायंकालमें कृष्णवर्ण, सामवेदस्वरूप तथा तामसरूप होता है। इन तीनोंसे भिन्न ज्योतिःस्वरूप, सूक्ष्म और निरञ्जनस्वरूप चतुर्थ स्वरूप है। पद्मासनमें बैठकर सुषुम्ना नाडी-मार्गमें चित्तको स्थिर कर प्रणवसे पूरक, कुम्भक और रेचकरूप प्राणायाम कर पैर के अँगूठेके अग्रभागसे लेकर मस्तकपर्यन्त न्यास करे। नाभिमें अग्निका, हृदयमें चन्द्रमाका और मस्तकमें अग्निशिखाका न्यास करना चाहिये। इन सबसे ऊपर सूर्यमण्डलका न्यास करे-यह चतुर्थ स्थान है, इस स्थानको मोक्षकी इच्छा करनेवाले पुरुषको अवश्य जानना चाहिये। ऋषिगण-सूर्य भगवान्के इसी तुरीय स्थान में मनको लीनकर मुक्त हो जाते हैं। मंग भी इसी स्थानका ध्यान कर मोक्षके भागी होते हैं। इस ज्ञानको सुनाकर भगवान् वेदव्यास बदरिकाश्रमकी ओर चले गये। (अध्याय १४५)
१-तिले तैल गयि क्षीरं काले पाचकसंततिः।
उपाय चिन्तयेदस्य धिया भीरः समाहितः ।।
प्रमाथि च प्रयतेन मनः संयम्य चशलम् ।
बुद्धीन्द्रियाणि संयम्य शकुनानिव पंजरे ॥
(ब्राह्यपर्व १४५ । ५-६)
२-इन्द्रियैनयतर्देही धाराभिरिव तृप्यते।
सततममृस्यैव जनार्दन महामते।।
"प्राणायामैदहदोषान् धारणाभि किल्वियम् ।
प्रत्याहारेण संसगीन् ध्यानेनानीश्वरान् गुणन्।।
ध्यायमानस्य दयन्ते चान्ते दोया यथाग्रिना।
तथेन्द्रियकृता दोषा दह्रान्ते प्राणनिग्रहात्।।
चितं चितेन संशोध्य भाव भावेन शोधयेत् ।
मनस्तु मनसा शोध्य बुद्धिं बुद्ध्या तु शोधयेत्।।
चित्तस्यातिप्रसादेन भाति कर्मं शुभाशुभम्।
शुभाशुभविनिर्मुलो निईन्द्वो निष्परिग्रहः।
निर्ममो निरहंकारस्ततो याति परां गतिम्
(ब्राह्मपई १४५ 14-११)