भविष्य महा पुराण

दशविध पर्वतदानोंमें धान्यशैलदानकी विधि और महिमा

महाराज युधिष्ठिरने कहा-भगवन् ! अब मैं विविध दानोंके उत्तम माहात्म्यको सुनना चाहता हैं, जो देवगणों एवं ऋषिसमूहोंद्वारा पूजित और परलोकमें अक्षय फल देनेवाला है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! प्राचीन कालमें इस विषयको भगवान् रुगने देवर्षि नारदसे और मत्स्यभगवान्ने स्वायम्भुव मनुसे कहा था। उस मेरु (पर्वत)-दानके दस भेदोंको मैं बतला रहा हूँ जिनका दान करनेसे मनुष्य देवपूजित लोकोंको प्रास करता है। उसे इस लोकमें जिस फलकी प्राप्ति होती है, वह वेदों और पुराणोंके अध्ययनसे, यज्ञानुष्ठानसे और देव मन्दिर आदिके निर्माणसे भी नहीं प्राप्त होता। इसलिये अब मैं पर्वतोंके क्रमसे उनके विधानका वर्णन कर रहा हूँ। उनके नाम इस प्रकार हैं-पहला धान्यशैलं, दूसरा लवणाचल, तीसरा गुडाचल, चौथा हेमपर्वत, पाँचौं तिलशैल, छठा कार्यासपर्वत, सातवाँ पतशैल, आठवाँ रत्नशैल, नवाँ रजतशैल और दसवाँ शर्कराचल। इनका विधान यथार्थरूपसे क्रमशः बतला रहा हूँ। सूर्यके उत्तरायण और दक्षिणायनके समय, पुण्यमय, विषुवयोगमें, व्यतीपातयोगमें, ग्रहण के समय, सूर्य अथवा चन्द्रमाके अदृश्य हो जानेपर, शुक्लपक्षकी तृतीया, द्वादशी या पूर्णिमा तिथिके दिन, विवाह, उत्सव और यज्ञके अवसरोंपर तथा पुण्यप्रद शुभ नक्षत्रके योगमें विद्वान् दाताको शास्त्रादेशानुसार विधिपूर्वक धान्यशैल आदि पर्वतदानों को करना चाहिये। इसके लिये तीर्थोमें, देवमन्दिरमें, गोशालामें अथवा किसी नदीके संगमपर भक्तिपूर्वक विधि- विधानके साथ एक चौकोर मण्डपका निर्माण कराये, उसमें उत्तर और पूर्व दिशामें दो दरवाजे हों तथा उसकी भूमि पूर्वोत्तर दिशामें ढालू हो। उस मण्डपकी गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर कुश बिछाकर उसके बीचमें विष्कम्भपर्वतसहित' देय पदार्थकी पर्वताकार राशि लगा दे। इस विषयमें एक हजार द्रोण अन्नका पर्वत उत्तम, पाँच सौ द्रोणका मध्यम और तीन सौ द्रोणका कनिष्ठ माना जाता है।

महान् धान्यराशिसे बने हुए मेरुपर्वतको, मध्यमें तीन स्वर्णमय वृक्षोंसे युक्त कर, पूर्व दिशामें मोती और होरेसे, दक्षिण दिशामें गोमेद और पुष्पराग (पुखराज)-से, पश्चिम दिशामें गारुत्मत (पन्ना) और नीलम मणिसे, उत्तर दिशामें वैदूर्य और पद्मराग मणिसे तथा चारों ओर चन्दनके टुकड़ों और मूंगेसे सुशोभित कर दे। उसे लताओंसे परिवेष्टित तथा सीपीके शिला- खण्डोंसे सुसज्जित कर दिया जाय। पुनः यजमान गर्वरहित होकर अनेकों द्विजसमूहों के साथ उस पर्वतके मूर्धास्थानपर ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शंकर और सूर्यकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित करे। उसी प्रकार चारों दिशाओंमें गन्ना और बाँससे डको हुई कन्दराएँ तथा घी और जलके झरने भी बनाये जायें। पुनः पूर्व दिशामें क्षेत वस्त्रोंसे, दक्षिण दिशामें काले वस्त्रोसे, पश्चिम दिशामें केसरिया वस्त्रोंसे और उच्चर दिशामें लाल वस्त्रोंसे बादलोंकी पंक्तियाँ बनायी जाय। फिर चाँदीके बने हुए महेन्द्र आदि आठों लोकपालोंको क्रमश: स्थापित करे और उस पर्वतके चारों ओर अनेकों प्रकारके फल, मनोरम पुष्पमालाएँ और चन्दन भी रख दे। उसके ऊपर पंचरंगा चंदोवा लगा दे और उसे खिले हुए श्वेत पुष्पोंसे विभूषित कर दे। इस प्रकार श्रेष्ठ अमरशैल (सुमेरुगिरि)-की स्थापना कर उसके चतुर्थांशसे इसके चारों दिशाओंमें क्रमश: विष्कम्भ (मर्यादा)-पर्वतोंकी स्थापना करनी चाहिये। ये सभी पुष्प और चन्दनसे सुशोभित हों। पूर्व दिशामें मन्दराचलका आकार बनाये, उसके निकट अनेकों प्रकारके फलोंकी कतारें लगा दे, उसे क कभद्र (देवदारु) और कदम्ब-वृक्षोंके चिह्नोंसे सुशोभित कर दे, उसपर कामदेवकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे। फिर उसे अपनी शक्तिके अनुसार चाँदीके बने हुए वन और दुग्धनिर्मित अरुणोद नामक सरोवरसे सुशोभित करे। तत्पश्चात् वस्त्र, पुष्प और चन्दन आदिसे उसे भरपूर सुसज्जित कर देना चाहिये।

दक्षिण दिशामें गेहूंकी राशिसे गन्धमादनकी रचना करनी चाहिये। उसे स्वर्णपत्रसे सुशोभित कर दे। उसपर यज्ञपतिकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित कर उसे वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर उसे घीके सरोवर और चाँदीके वनसे सुशोभित कर देना चाहिये। पश्चिम दिशामें अनेकों सुगन्धित पुष्पों, स्वर्णमय पीपल-वृक्ष और सुवर्णनिर्मित हंससे युक्त तिलाचलकी स्थापना करनी चाहिये। उसी प्रकार इसे भी वस्त्रसे परिवेष्टित तथा चाँदीके पुष्पवनसे सुशोभित कर दे। इसके अग्रभागमें दहीसे सितोद सरोवरकी भी रचना करे। इस प्रकार उस विपुल शैलकी स्थापना करके उत्तर

*सुमेरुगिरिके चारों ओर स्थित मन्दर, गन्धमादन विपुल और सुपार्श्व नामक पर्वतोंको विष्कम्भ-सहाय पर्वत कहा जाता है।

दिशामें उड़दसे सुपार्थ नामक पर्वतकी स्थापना करे। इसे भी सुन्दर वस्त्र और पुष्पोंसे सुसज्जित करे, इसके शिखरपर स्वर्णमय वट-वृक्ष रख दे तथा सुवर्णनिर्मित गौसे सुशोभित कर दे। उसी प्रकार मधुसे बने हुए भद्रसर नामक सरोवर और चमकीली चाँदीसे निर्मित वनसे संयुक्त कर देना चाहिये। तत्पश्चात् पूर्व दिशामें एक हाथ लम्बा- चौड़ा और गहरा कुण्ड बनाकर तिल, घी, समिधा और कुशोद्वारा चार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे हवन कराये। वे सभी ब्राह्मण वेदों और पुराणों के ज्ञाता, जितेन्द्रिय, अनिन्द्य, चरित्रवान् और सुरूप हों। रातमें मधुर शब्दोंमें गायन और तुरही आदि वाद्योंका वादन कराते हुए जागरण करना चाहिये। इन पर्वतोंका आवाहन इस प्रकार करे-

त्वं सर्वदेवगणधामनिधे च विघ्न-

मस्मद्गृहेष्वमरपर्वत नाशयाशु।

क्षेमं विधत्स्व कुरु शान्तिमनुत्तमा नः

सम्पूजितः परमभक्तिमतः प्रदेहि।।

त्वमेव भगवानीशो ब्रह्मा विष्णुर्दिवाकरः।

मूर्तामूर्तपरं बीजमतः पाहि सनातन ।

यस्मात् त्वं लोकपालानां विश्वमूर्तेश मन्दिरम्।

केशवार्कवसूनां च तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥

यस्मादशून्यममरैर्गन्धर्वैश्च शिवेन च।

तस्मान्मामुद्धराशेषदुःखसंसारसागरात्।।

(उत्तरपर्व १९५ । २८-३१)

अमरपर्चत! आप समस्त देवगणोंके निवासस्थान और रतोंकी निधि हैं। आप हमारे घरों में स्थित विघ्न-बाधाओंको शीघ्र ही नष्ट कर दें, हमारे कल्याणका विधान करें और हमें श्रेष्ठ शान्ति तथा परम भक्ति प्रदान करें। सनातन !आप ही ब्रा, भगवान् विष्णु, शंकर और सूर्य हैं तथा मूर्त (साकार) और अमूर्त (निराकार)- से परे संसारके बीज (कारणरूप) हैं, अत: हमारी रक्षा करें। चूंकि आप लोकपालों, विश्वमूर्ति, केशव, सूर्य और वसुओंके निवासस्थान हैं, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करें। चूँकि आप देवताओं, गन्धर्षों और शिवजीसे अशून्य अर्थात् संयुक्त रहते हैं, इसलिये इस निखिल दुःखोंसे भरे हुए संसार-सागरसे मेरा उद्धार करें।'

इस विधिसे उस मेरुगिरिकी अर्चना करनेके पश्चात् मन्दराचलकी पूजा करनी चाहिये और इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-'मन्दराचल! चूंकि आप चैत्ररथ वन और भद्राश्व वर्षसे सुशोभित हैं, इसलिये शीघ्र ही मेरे लिये तुष्टिकारक बनें।' 'गन्धमादन! चूँकि आप जम्बूद्वीपके शिरोमणि हैं, इसलिये गन्धों और अप्सराओंके द्वारा मेरे यशका गान हो।' 'विपुल! चूँकि आप केतुमाल वर्ष और वैभ्राज वनसे सुशोभित हैं तथा आपका पाषाण स्वर्णमय है, इसलिये आप मुझे शक्ति प्रदान करें।' 'सुपार्श्व! चूँकि आप उत्तर कुरुवर्ष और सावित्र वनसे नित्य शोभित हैं, अत: मुझे अक्षय लक्ष्मी प्रदान करें।' इस प्रकार उन सभी पर्वतोंको आमन्त्रित करके पुनः निर्मल प्रभात होनेपर स्नान आदिसे निवृत्त हो बीचवाला श्रेष्ठ पर्वत गुरु (यज्ञ करानेवाले)-को दान कर दे। इसी प्रकार चारों विष्कम्भपर्वतोंको चारों ऋत्विोंको क्रमशः दान कर देना चाहिये। इसके बाद चौतीस, दस, सात अथवा आठ गौका दान करनेका विधान है। यदि यजमान निर्धन हो तो वह एक ही दुधारू कपिला गौ गुरुको दान करे। सभी पर्वतदानोंकी यही विधि है। उनके पूजनमें ग्रहों, लोकपालों और ब्रह्मा आदि देवताओंके वे ही मन्त्र हैं और वे ही सामग्रियाँ भी मानी गयी हैं। सभी पर्वत पूजनों में उन-उनके मन्त्रों के उच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये। यजमानको सदा व्रतमें उपवास करना चाहिये। यदि असमर्थ हो तो रातमें एक बार भोजन किया जा सकता है। भारत ! अब आप सभी पर्वतदानोंकी विधि, मन्त्र और उनके फल सुनें। दान देते समय धान्यशैलसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-

अन्न ब्राह्म यतः प्रोक्तमो प्राणा: प्रतिष्ठिताः।

अन्नाद् भवन्ति भूतानि जगदओन वर्धते॥

अन्नमेव यतो लक्ष्मीरत्रमेव जनार्दनः।

धान्यपर्वतरूपेण पाहि तस्मात्रगोत्तम॥

(उत्तरपर्व १९५।४३-४४)

'पर्वतश्रेष्ठ ! चूँकि अन्नको ही ब्रह्म कहा जाता है और उसीमें प्राणियोंके प्राण प्रतिष्ठित हैं। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते है, मनसे ही संसार संचालित हो रहा है, इसलिये अन्न ही लक्ष्मी है, अन्न ही भगवान जनार्दन है, अतः धान्यशैलके रूपमें आप मेरी रक्षा करें।'

जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे धान्यमय पर्वतका दान करता है, वह सौ मन्वन्तरसे भी अधिक कालतक देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा अप्सराओं और गन्धवाद्वारा व्याप्त सुन्दर विमानसे स्वर्गलोकको जाता है एवं उनके द्वारा पूजित होता है। पुनः पुण्य-क्षय होनेपर वह इस लोकमें निःसंदेह राजाधिराज होता है। (अध्याय १९५)