भगवान् श्रीकृष्णाने कहा-महाराज!प्राचीन कालमें ब्रह्माजीके महातेजस्वी अत्रि पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए। अत्रिकी भार्याका नाम था अनसूया, वह महान् भाग्यशालिनी एवं पतिव्रता थी। कुछ कालके बाद उनके महातेजस्वी पुत्र दत्त हुए। दत्त महान् योगी थे। ये विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए थे। इनका दूसरा नाम था अनघ । इनकी भार्याका नाम था नदी। ब्राह्मणों के सभी गुणोंसे सम्पन्न इनके आठ पुत्र थे। 'दत्त' विष्णुरूपमें थे तथा 'नदी' लक्ष्मीकी रूप थीं। दत्त अपनी भार्या नदीके साथ योगाभ्यासमें लीन थे, उसी समय जम्भ* नामक दैत्यसे पीड़ित तथा पराजित देवता विन्ध्यगिरिमें स्थित इनके आश्रममें आये और उन्होंने इनकी शरण ग्रहण की। दत्तात्रेबजीने इन्द्रके साथ उन सभी देवताओंको अपने योगबलसे अपने आश्रम में रख लिया और कहा-'आपलोग निर्भय तथा निश्चिन्त होकर यहाँ रहें।' देवगण अत्यन्त प्रसत्र हो गये और वे वहीं रहने लगे। दैत्य-समुदाय भी देवताओंको खोजते-खोजते इसी आश्रमपर आ पहुँचा। वे क्रोधपूर्वक ललकारकर कहने लगे-'इस मुनिको पत्नीको पकड़ लो और यह सारा आश्रग उजाड़ डालो।' यह कहते हुए दैत्यगण आश्रममें घुस गये और उनकी पत्नीको उठाकर अपने सिरपर रखकर चल पड़े। लक्ष्मीको सिरपर उठाते ही सभी दैत्य श्रीहीन हो गये और दत्तकी दृष्टि पड़नेसे चे सभी दैत्य भागने और नष्ट होने लगे। देवताओंने भी उन्हें मारना प्रारम्भ कर दिया। निशेष्ट होकर दैत्यगण हाहाकार करने लगे। दत्तमुनिके प्रभावसे वहाँ प्रलय मच गया। इन्द्रादि देवताओने सभी असुरोंको पराजित कर दिया और फिर वे सभी अपने-अपने लोक चले गये तथा पूर्ववत् आनन्दसे रहने लगे। देवताओंने उन भगवान् दत्तात्रेयकी महिमा और प्रभावको ही इसमें कारण माना।
दत्तात्रेयजी भी संसारके कल्याणके लिये मज़बाहु होकर कठिन तपस्या करने लगे। वे योगमार्गका आश्रय लेकर ध्यान-समाधिमें स्थित हो गये। इसी प्रकार समाधिमें उन्हें तीन हजार वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन माहिष्मतीके राजा हैहयाधिपति कार्तवीर्यार्जुन उनके पास आया और रात-दिन उनकी सेवा करने लगा। दत्त उसकी सेवासे अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसकी याचनापर उसे चार वर प्रदान किये-पहला वर था हजार हाथ हो जायँ, दूसरे वरसे सारी पृथ्वीको अधर्मसे बचाते हुए धर्मपूर्वक पृथ्वीका शासन करना। तीसरे वरसे लड़ाईके मैदानमें किसीसे पराजित न होना तथा चौथे वरसे भगवान् विष्णुके हाथों मृत्यु होना।
कौन्तेय ! योगाभ्यासमें लीन उन दत्तमुनिने कार्तवीर्यार्जुनको अष्टसिद्धियोंसे समन्वित चक्रवर्ती घदवाले राज्यको प्रदान किया। कार्तवीर्यार्जुनने भी सप्तद्वीपा वसुमतीको धर्मपूर्वक अपने अधीन कर लिया। यह सब उसके हजार बाहुओंका प्रभाव था। वह अपनी मायाद्वारा यज्ञोंके माध्यमझे ध्वजावाला रथ उत्पन्न कर लेता था। इसके प्रभावसे सभी द्वीपोंमें दस हजार यज्ञ निरन्तर होते रहते थे। उन यज्ञोंकी वेदियाँ, यूप तथा मण्डप आदि सभी सोनेके रहते थे। उनमें प्रचुर दक्षिणाएँ दी जाती थीं । विमानमें बैठकर सभी देवता, गन्धर्व तथा अप्सराएँ पृथ्वीपर आकर यज्ञकी शोभा बढ़ाते रहते थे। नारद नामका गन्धर्व उसके यज्ञकी गाथा इस प्रकार गाया करता था-'कार्तवार्यके पराक्रमकी बात सुननेसे यह पता चलता है कि संसारका कोई भी राजा उसके समान
*यह अनेक राक्षसोंका नाम है। इसका वर्णन श्रीमद्भगवत ब्रह्माण्ड वायु0 मत्स्य और विष्णु आदि पुराणोंमें आया है। इसे इन्द्रने मारा था, अतः इन्द्रका एक नाम जम्भभेदी भी है।
यज्ञ, दान तथा तप नहीं कर सकता। सातों द्वीपोंमें केवल वही ढाल, तलवार तथा धनुष-बाणवाला है। जैसे बाज पक्षीको अन्य पक्षी डरसे अपने समीप ही समझते हैं, वैसे ही अन्य राजा लोग दूरसे ही इससे भय खाते हैं। इसकी सम्पत्ति कभी नष्ट नहीं होती, इसके राज्य में न कहीं शोक दिखायी पड़ता है न कोई क्लान्त ही। यह अपने प्रभावसे पृथ्वीपर धर्मपूर्वक प्रजाओंका पालन करता है।'
भगवान् श्रीकृष्ण पुन: बोले-नराधिप! कार्तवीर्य इस पृथ्वीपर पचासी हजार वर्षतक अखण्ड शासन करता रहा। वह अपने योगबलसे पशुओंका पालक तथा खेतोंका रक्षक भी था । समयानुसार मेघ बनकर वृष्टि भी करता था। धनुषकी प्रत्यज्ञाके आघातसे कठोर त्वचायुक्त अपनी सहस्रों भुजाओंद्वारा वह सूर्यके समान उद्भासित होता था। उसने अपनी हजार भुजाओंके बलसे समुद्रको मथ डाला और नागलोक में काटक आदि नागोंको जीतकर वहाँ भी अपनी नगरी बसा ली। उसकी भुजाओंद्वारा समुद्रके उद्वेलित होनेसे पातालवासी महान् असुर 'भी निशेष्ट हो जाते थे। बडे-बडे नाग उसके पराक्रमको देखकर सिर नीचा कर लेते थे। सभी धनुर्धरोंको उसने जीत लिया। अपने पराक्रमसे रावणको भी उसने अपनी माहिती नगरीमें लाकर बंदी बना रखा था, जिसे पुलस्त्य ऋषिने छुड़वाया। एक बार भूखे-प्यासे चित्रभानु (अगिदेव)-को राजा कार्तवीर्यार्जुनने समस्त सप्तद्वीपा वसुन्धराको दान में दे दिया। इस प्रकार वह कार्तवीर्यार्जुन बडा पराक्रमी एवं गुणवान् राजा हुआ था।
योगाचार्य भगवान् अनम (दत्तात्रेय)-से वर प्राप्तकर कार्तवीर्यार्जुनने पृथ्वीलोकमें इस अनघाटमी- व्रतको प्रवर्तित किया। अघको पाप कहा जाता है यह तीन प्रकारका होता है-कायिक, वाचिक और मानसिक। यह अनघाष्टमी त्रिविध पापोंको नष्ट करनेवाली है, इसलिये इसे अनघा कहते हैं। इस व्रतके प्रभावसे अष्टविध ऐश्वर्य (अणिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, लघिमा, ईशित्व, वशित्व तथा सर्वकामावसायिता) प्राप्त कर लेना मानो विनोद ही है।
महाराज युधिष्ठिरने पूछा-पुण्डरीकाक्ष ! राजा कार्तवीर्यार्जुनके द्वारा प्रवर्तित यह अनघाष्टमी-व्रत किन मन्त्रों के द्वारा, कब और कैसे किया जाता है? इसे आप बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्णाने कहा- राजन् ! इस व्रतको विधि इस प्रकार है- मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमीको कुशोंसे स्त्री-पुरुषकी प्रतिमा बनाकर भूमिपर स्थापित करनी चाहिये। उनमें एकमें सौम्य एवं शान्तिस्वरूपयुक्त अनघ (दत्तात्रेय)-की तथा दूसरे में अनघा (लक्ष्मी) की भावना करनी चाहिये और ऋग्वेदके विष्णुसूक्तसे* पूजा करनी चाहिये। पूजामें फल, कन्द, श्रृंगारकी सामग्री, बेर, विविध धान्य, विविध पुध्मका उपयोग करना चाहिये। दीपक जलाना चाहिये तथा ब्राहाणों एवं बन्धु-बान्धवोंको भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार पूजा करनेवाला सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है, लक्ष्मी प्राप्त करता है तथा भगवान् विष्णु उसपर प्रसन्न हो जाते हैं। (अध्याय ५८)
*अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुचिंचक्रमे । पृथिव्या. सः धामभिः ।।
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूहळनाय पांसुरे।।
औणि पदा वि चक्रमे विष्णुगौमा अदाधरः । अतो धर्माणि पात्यन्।।
विष्णो: कर्माणि पश्यत यतो ब्रतानि पस्यो । इन्द्रस्य
तद् विष्णो: परमं पदं सदा पश्यति। तपः । दिवीव चक्षुराततम्।।
तद् विपासो चिपन्यवो जागन्यांसः समिाने । विभगोयन् पाम पदम् ॥
(ऋग्वेद ।।२।१६-२१)