सूतजी बोले- महामुने शौनक ! तोताद्रिमें बोपदेव नामके ब्राह्मण रहते थे। वे कृष्णभक्त और वेद-वेदाङ्गपारंगत थे। उन्होंने गोप-गोचियोंसे प्रतिष्ठित वृन्दावन-तीर्थमें जाकर देवाधिदेव जनार्दनकी आराधना की। एक वर्ष बाद भगवान श्रीहरिने प्रसन्न होकर उन्हें अतिशय श्रेष्ठ ज्ञान प्रदान किया। उसी ज्ञानके द्वारा उनके हृदय में भागवती कथाका उदय हुआ। जिस कथाको श्रीशुकदेवजीने बुद्धिमान् राजा परीक्षितको सुनाया था, उस सनातनी मोक्ष-स्वरूपा कथाका बोपदेवने हरि-लीलामृत नामसे पुनः वर्णन किया। कथाको समाप्तिपर जनार्दन भगवान् विष्णु प्रकट हुए और बोले 'महामते! वर माँगो। बोपदेवने अतिशय स्नेहमयी वाणी में कहा-'भगवन् ! आपको नमस्कार है। आप सम्पूर्ण संसारपर अनुराह करनेवाले हैं। आपसे देव, मनुष्य, पशु-पक्षी सभी निर्मित हुए हैं। नरकसे दुखी पाणी भी इस कलियुगमें आपके ही नामसे कृतार्थ होते है। महर्षि वेदव्यासरचित श्रीमद्भागवतका ज्ञान तो आपने महो प्रदान किया है, न, यदि आ।वर दाकरना चाहते हैं तो उस भागवतका माहात्म्य मुझसे कहें।'
श्रीभगवान् बोले-बोपदेव ! एक समय भगवान् शंकर पार्वतीके साथ दम्भ और पाखण्डसे युक्त बौद्धोंके राज्य प्राप्त होनेपर काशीमें उत्तम भूमि देखकर वहाँ स्थित हो गये। भगवान् शंकरने आनन्दपूर्वक प्रणाम करते हुए कहा-'हे सच्चिदानन्द! हे विभो! हे जगत्को आनन्द प्रदान करनेवाले! आपकी जय हो।' इस प्रकारकी वाणी सुनकर पार्वतीने भगवान् शंकरसे पूछा-'भगवन् । आपके समान दूसरा अन्य देवता कौन है जिसे आपने प्रणाम किया।' इसपर भगवान् शिवने कहा- 'महादेवि! यह काशी परम पवित्र क्षेत्र है, यह स्वयं सनातन ब्रहास्वरूप है, यह प्रणाम करने योग्य है। यहाँ मैं सप्ताह-यज्ञ (भागवत-सप्ताह यज्ञ) करुंगा। उस यज्ञ-स्थलकी रक्षाके लिये भगवान् शंकरने चण्डीश, गणेश, नदी तथा गुहाकोंको स्थापित किया और स्वयं ध्यान स्थित होकर माता पार्वतीले सात दिनतक भागवती कथा कहते रहे। आये दिन पार्वतीको सोते देखकर मजे किती कथा
सूत्रपाठं धानुपाठं गणपाठं तथैव च।
लिङ्गसूत्र या कृत्वा पर निर्माणमालवान्॥
(प्रतिसापर्व २।३।१३-१४)
सुनी।' उन्होंने कहा-'देव ! मैनै अमृत-मन्थनपर्यन्त विष्णुचरित्रका श्रवण किया। इसी कथाको वहीं वृक्षके कोटरमें स्थित शुकरूपी शुकदेव सुन रहे थे। अमृत-कथाके श्रवणसे वे अमर हो गये। मेरी इस आज्ञासे वह शुक साक्षात् तुम्हारे हृदय में स्थित है। बोपदेव! तुमने इस दुर्लभ भागवत- माहात्म्यको मेरे द्वारा प्राप्त किया है। अब तुम जाकर राजा विक्रमके पिता गन्धर्वसेनको नर्मदाके तटपर इसे सुनाओ। हरि-माहात्म्यका दान करना सभी दानोंमें उत्तम दान है। इसे विष्णुभक्त बुद्धिमान् सत्पात्रको ही सुनाना चाहिये। भूखेको अन्न-दान करना भी इसके समान दान नहीं है। यह कहकर भगवान् श्रीहरि अन्तर्हित हो गये और बोपदेव बहुत प्रसन्न हो गये। (अध्याय ३२)