सुमन्तु मुनिने कहा-राजन्! चतुर्थी तिथि तीन प्रकारकी होती है-शिवा, शान्ता और सुखा। अब मैं इनका लक्षण कहता हूँ, उसे सुनें-
भाद्रपद मासकी शुक्ला चतुर्थीका नाम 'शिवा' है, इस दिन जो स्नान, दान, उपवास, जप आदि सत्कर्म किया जाता है, वह गणपतिके प्रसादसे सौ गुना हो जाता है। इस चतुर्थीको गुड़, लवण और घृतका दान करना चाहिये, यह शुभकर माना गया है और गुड़के अपूपों (मालपूआ)-से ब्राहाणोंको भोजन कराना चाहिये तथा उनकी पूजा करनी चाहिये। इस दिन जो, स्त्री अपने सास और ससुरको गुड़के पूए तथा नमकीन पूए
खिलाती है वह गणपतिके अनुग्रहसे सौभाग्यवती होती है। पतिकी कामना करनेवाली कन्या विशेषरूपसे इस चतुर्थीका व्रत करे और गणेशजीको पूजा करे। राजन्! यह शिवा चतुर्थीका विधाना है। माघ मासकी शुक्ला चतुर्थीको 'शान्ता' कहते हैं। यह शान्ता तिथि नित्य शान्ति प्रदान करनेके कारण 'शान्ता' कही गयी है। इस दिन किये हुए स्नान-दानादि सत्कर्म गणेशजीको कृपासे हजार गुना फलदायक हो जाते हैं। इस शान्ता नामक चतुर्थी तिथिको उपवास कर गणेशजीका पूजन तथा हवन करे और लवण, गुड, शाक एवं गुड़के पूर ब्राह्मणोंको दान दे। विशेषरूपसे
परम्परासे प्रचलित गणेश-गायश्रौमे एकदन्ताय पाठ है।
एकदन्ते जगन्नाथे गणेशे तुष्टिगते।
पितृदेवगनुष्याद्याः रार्वे तुष्यन्ति भारत।।
स्त्रियाँ अपने ससुर आदि पूज्य जनोंका पूजन करें एवं उन्हें भोजन करायें। इस व्रतके करनेसे अखण्ड सौभाग्यकी प्राप्ति होती है, समस्त विघ्र दूर होते हैं और गणेशजीकी कृपा प्राप्त होती है।
किसी भी महीनेके भौमवारयुक्त शुक्ला चतुर्थीको 'सुखा' कहते हैं। यह व्रत स्वियोंको सौभाग्य, उत्तम रूप और सुख देनेवाला है। भगवान् शङ्कर एवं माता पार्वतीके संयुक्त तेजसे भूमिद्वारा रक्तवर्णके मङ्गलकी उत्पत्ति हुई। भूमिका पुत्र होनेसे वह भौम कहलाया और कुज, रक्त, वीर, अङ्गारक आदि नामोंसे प्रसिद्ध हुआ। वह शरीरके अङ्गोंकी रक्षा करनेवाला तथा सौभाग्य आदि देनेवाला है, इसीलिये अङ्गारक कहलाया। जो पुरुष अथवा स्त्री भौमवारयुक्त शुक्ला चतुर्थीको उपवास करके भक्तिपूर्वक प्रथम गणेशजीका, तदनन्तर रक्त चन्दन, रक्त पुष्य आदिसे भौमका पूजन करते हैं, उन्हें सौभाग्य और उत्तम रूप-सम्पत्तिको प्राप्ति होती है।
प्रथम संकल्पकर स्नान करे, अनन्तर गणेश- स्मरणपूर्वक हाथमें शुद्ध मृत्तिका लेकर इस 'मन्त्रको पढ़ें-
इह त्वं वन्दिता पूर्वं कृष्णेनोद्धरता किल।
तस्मान्मे दह पाप्मानं यन्मया पूर्वसंचितम्॥
(बाहापर्व ३१ । २४)
इसके बाद मृत्तिकाको गङ्गाजलसे मिश्रितकर सूर्यके सामने करे, तदनन्तर अपने सिर आदि अङ्गोंमें लगाये और फिर जलके मध्य खड़ा होकर इस मन्त्रको पढ़कर नमस्कार करे-
त्वमापो योनिः सर्वेषां दैत्यदानवद्यौकसाम्।
स्वेदाण्डजोद्भिदा चैव रसानां पतये नमः ।।
(बाहापर्व ३१।२७)
अनन्तर सभी तीर्थो, नदियों, सरोवरों, झरनों और तालाबोंमें मैंने खान किया-इस प्रकार भावना करता हुआ गोते लगाकर स्नान करे, फिर
पवित्र होकर घरमें आकर दूर्वा, पीपल, शमी तथा गौका स्पर्श करे। इनके स्पर्श करनेके मन्त्र इस प्रकार हैं-
दूर्वा स्पर्श करनेका मन्त्र
त्वं दूर्वेऽमृतनामासि सर्वदेवस्तु वन्दिता॥
वन्दिता दह तत्सर्वं दुरितं यन्मया कृतम्।
(ब्राह्मपर्व ३१ । ३१-३२)
शमी स्पर्श करनेका मन्त्र
पवित्राणां पवित्रा त्वं काश्यपी प्रथिता श्रुतौ।
शमी शमय मे पापं नूनं वेत्सि धराधरान्॥
(ब्राहापर्व ३१ । ३३)
पीपल-वृक्ष स्पर्श करनेका मन्त्र
नेत्रस्पन्दादिजं दुःखं दुःस्वप्नं दुर्विचिन्तनम्।
शक्तानां च समुद्योगमश्चत्ध त्वं क्षमस्व मे।।
(ब्राह्मपर्व ३१ । ३४)
गौको स्पर्श करनेका मन्त्र
सर्वदेवमयी देवि मुनिभिस्तु सुपूजिता ।
तस्मात् स्पृशामि वन्दे त्वा वन्दिता पापहा भव ॥
(बाहापर्व ३१ । ३६)
श्रद्धापूर्वक पहले गौंकी प्रदक्षिणा कर उपर्युक्त मन्त्रको पढ़े और गौका स्पर्श करे। जो गौकी प्रदक्षिणा करता है, उसे सम्पूर्ण पृथ्वीको प्रदक्षिणाका फल प्रास होता है।
इस प्रकार इनको स्पर्शकर, हाथ-पैर धोकर, आसनपर बैठकर आचमन करे। अनन्तर खदिर (खैर) की समिधाओंसे अग्नि प्रज्वलित कर घृत, दुग्ध, यव, तिल तथा विविध भक्ष्य पदार्थासे मन्त्र पढ़ते हुए हवन करे। आहुति इन मन्त्रोंसे दे-ॐ शर्वाय स्वाहा, ॐ शर्वपुत्राय स्वाहा, क्षोण्युत्सङ्गभवाय स्वाहा, ॐ कुजाय स्वाहा, ॐ ललिताङ्गाय स्वाहा तथा ॐ लोहिताशाय स्वाहा।
पर इन प्रत्येक मन्बोंसे १०८ या अपनी शक्तिके अनुसार आहुति। अनन्ता सुवर्ण, चाँदी, चन्चन या देवदारके
काष्ठकी मङ्गलकी मूर्ति बनाकर ताँबे अथवा चाँदीके पात्र में उसे स्थापित करे। घी, कुंकुम, रक्त चन्दन, रक्त पुष्प, नैवेद्य आदिसे उसकी पूजा करे अथवा अपनी शक्तिके अनुसार पूजा करे। अथवा ताम्र, मृत्तिका या बाँससे बने पात्र में कुंकुम, केसर आदिसे मूर्ति अङ्कितकर पूजा करे। 'अग्निर्मूर्धा० *' इत्यादि वैदिक मन्त्रोंसे सभी उपचारोंको समर्पित कर वह मूर्ति ब्राह्मणको दे दे और यथाशक्ति घी, दूध, चावल, गेहूँ, गुड़ आदि वस्तु भी ब्राह्मणको दे। धन रहनेपर कृपणता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि कंजूसी करनेसे फल नहीं प्राप्त होता।
इस प्रकार चार बार भौमयुक्त चतुर्थीका व्रत कर श्रद्धापूर्वक दस अथवा पाँच तोले सोनेकी मङ्गल और गणपतिकी मूर्ति बनवाये। उसे बीर पल या दस पलके सोने, चाँदी अथवा ताम्न आदि पात्रमें भक्तिपूर्वक स्थापित करे। सभी उपचारों पूजा करनेके बाद दक्षिणाके साथ सत्पात्र ब्राह्मणक उसे दे, इससे इस व्रतका सम्पूर्ण फल प्राप्त होत है। राजन्! इस प्रकार इस उत्तम तिथिको मैं कहा। इस दिन जो व्रत करता है, वह चन्द्रमाने समान कान्तिमान्, सूर्यके समान तेजस्वी एवं प्रभावा तथा वायुके समान बलवान् होता है और अन्त महागणपतिके अनुग्रहसे भौमलोकमें निवास करत है। इस तिथिके माहात्म्यको जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक पढ़ता-सुनता है, वह महापातकादिसे मुक्त होक श्रेष्ठ सम्पत्तियोंको प्राप्त करता है। ( अध्याय ३१)
Summary of chapter 21 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
Following the Sauradharma, the vrata cycle extends beyond the Saptamī group to cover the remaining tithi vratas. The Aṣṭamī vratas are sacred to Śiva and Durgā; the Navamī vratas are associated with Devī; the Daśamī vratas span important festival occasions; the Ekādaśī vratas constitute a major section sacred to Viṣṇu; and the Dvādaśī vratas bridge the transition toward the Trayodaśī. Each carries its presiding deity, specific rules, and the narrative that establishes the tithi's sacred character.