भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन् ! अब मैं सम्पूर्ण पापोंके विनाशक परमोत्तम सप्तसागर- दानकी विधि बतला रहा हूँ। बुद्धिमान् पुरुष युगादि तिथियों तथा ग्रहण आदिके समय स्वर्णनिर्मित सात स्वतन्त्र कुण्डोंका निर्माण करे। ये कुण्ड एक बित्ता चौड़े तथा एक अरलि अर्थात् बँधी हुई मुट्ठीवाले हाथ-जितने लम्बे होने चाहिये। इन्हें अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार सात पल सोनेसे ऊपर एक हजार पलतकका बनवाना चाहिये। इन सभी कुण्डोंको कृष्णमृगके चर्मपर रखे गये तिलोंके ऊपर स्थापित करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको पहले कुण्डको लवणसे, दूसरे कुण्डको दुग्धसे, तीसरेको घृतसे, चौथेको गुड़से पाँचवेंको दहीसे, छठेको चीनीसे तथा सातवेंको तीर्थोके पवित्र जलसे पूर्ण करना चाहिये। फिर लवणकुण्डमें सुवर्णनिर्मित ब्रह्मकी, दुग्धकुण्डके मध्यमें भगवान् विष्णुकी, घृतकुण्डमें भगवान् शिवकी, गुड्कुण्डमें भगवान् भास्करकी, दधिकुण्डमें सुराधिपकी, शर्कराकुण्डमें लक्ष्मीकी और जलकुण्डमें पार्वतीकी स्थापना करनी चाहिये। सभी कुण्डोंको सभी ओरसे रनों तथा अन्नद्वारा अलंकृत करना चाहिये। जब पुण्यपर्व आ जाय, यजमान स्नानकर श्वेत वस्त्र धारण कर सुखपूर्वक जो पदार्थ मिल सके उन्हें भी वहाँ स्थापित कर ले। फिर इन कुण्डों (सागरों)-की तीन प्रदक्षिणा कर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे-
नमो वः सर्वसिन्धूनामाधारेभ्य: सनातनाः॥
जन्तूनां प्राणदेभ्यश समुद्रेभ्यो नमो नमः ।
पूर्णाः सर्वे भवन्तो वै क्षारक्षीरघृतैक्षवैः ।।
दधा शर्करया तद्वत् तीर्थवारिभिरेव च।
तस्मादधौघविध्वंसं कुरुध्वं मम मानदाः ।।
अलक्ष्मीः प्रशमं यातु लक्ष्मीश्चास्तु गृहे मम।
(उत्तरपर्व १८२ । १०–१३)
'सभी नदियोंके एकमात्र आश्रयस्थान सप्तसागरो ! आप सनातन हैं, आपको नमस्कार है। सभी प्रणियोंको जीवनदान देनेवाले समुद्रोंको नमस्कार है। आप लवण, क्षीर, घृत, इक्षुरस, दही, शर्करा तथा तीर्थोके जलसे परिपूर्ण हैं, आप मान-सम्मान देनेवाले हैं, आप मेरे सम्पूर्ण पापसमूहोंका विनाश करें। मेरे घरसे अलक्ष्मी दूर हो जाय और उसमें लक्ष्मीका निवास हो।'
इस प्रकार कहकर उन सप्तसागरोंको ब्राह्मणों को दान कर दे। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! इस सप्तसागरके दान करनेवालेके घरसे आठ पीढ़ीतक लक्ष्मी दूर नहीं होती, वह सात मन्वन्तरोंतक देवलोक में पूजित होता है और फिर अन्तमें ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय १८२)