सूतजीने कहा-ऋषियो! आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक-इन तीनों तापोंको हरण करनेवाले भगवान् विष्णुके मङ्गलमय चरित्रको जो सुनते हैं, वे सदा हरिके धाममें निवास करते हैं, किंतु जो भगवान् का आश्रय नहीं ग्रहण करते- उन्हें विस्मृत कर देते हैं, उन्हें कष्टमय नरक प्राप्त होता है। भगवान् विष्णुको पलीका नाम कमला (लक्ष्मी) है। इनके चार पुत्र हैं-धर्म, यज्ञ, राजा और चोर । ये सभी लक्ष्मी-प्रिय है अर्थात् ये लक्ष्मीकी इच्छा करते हैं। ब्राह्मणों और अतिथियोंको जो दान दिया जाता है, वह धर्म कहा जाता है, उसके लिये धनकी आवश्यकता है। स्वाहा और स्वधाके द्वारा जो देवयज्ञ और पितृयज्ञ किया जाता है, वह यज्ञ कहा जाता है, उसमें भी धनकी अपेक्षा होती है। धर्म और यज्ञकी रक्षा करनेवाला राजा कहलाता है, इसलिये राजाको भी लक्ष्मी-धनकी अपेक्षा रहती है। धर्म और यज्ञको नारा करनेवाला चोर कहलाता है, वह भी धनकी इच्छासे चोरी करता है। इसलिये ये चारों किसी-न-किसी रूपमें लक्ष्मीके किंकर हैं। परंतु जहाँ सत्य रहता है, वहीं धर्म रहता है और वहीं लक्ष्मी भी स्थिररूपमें रहती हैं।
वह वणिक् सत्य-धर्मसे च्युत हो गया था (उसने सत्यनारायणका व्रत न कर प्रतिज्ञाभंग की थी)। इसीलिये राजाने उस वणिक्के घरसे भी सारा धन हरण करवा लिया और घरमें चोरी भी हो गयी। बेचारी उसकी पत्नी लीलावती एवं पुत्री कलावतीके साथ अपने वस्त्र-आभूषण तथा मकान बेचकर जैसे-तैसे जीवन-यापन करने लगी। एक दिन उसकी कन्या कलावती भूखसे व्याकुल होकर किसी ब्राह्मणके घर गयी और वहाँ उसने ब्राह्मणको भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करते हुए देखा । जगन्नाथ सत्यदेवकी प्रार्थना करते हुए देखकर उसने भी भगवानसे प्रार्थना की-'हे सत्यनारायणदेव! मेरे पिता और पति यदि घरपर आ जायेंगे तो मैं भी आपकी पूजा करूँगी।' उसकी बात सुनकर ब्राहाणोंने कहा-'ऐसा ही होगा।' इस प्रकार ब्राहाणोंसे आश्वासनयुक्त आशीर्वाद प्राप्तकर वह अपने घर वापस आ गयी। रात्रिमें देरसे लौटनेके कारण माताने उससे डाँटते हुए पूछा कि 'बेटी! इतनी राततक तुम कहाँ रहो?' इसपर उसने उसे प्रसाद देते हुए सत्यनारायणके पूजा-वृत्तान्तको बताया और कहा-'माँ ! मैंने वहाँ सुना कि भगवान् सत्यनारायण कलियुगमें प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं, उनकी पूजा मनुष्यगण सदा करते हैं। गाँ। मैं भी उनकी पूजा करना चाहती हूँ, तुम मुझे आज्ञा प्रदान करो। मेरे पिता और स्वामी अपने घर आ जायें, यही मेरी कामगा है।'
रातमें ऐसा मनमें निक्षयकर प्रातः वह कलावतो शीलपाल नामक एक वणिक्के घरपर धन प्राप्त करनेकी इच्छासे गयी और उसने कहा-'बन्धो ! थोड़ा धन है, जिससे में भावान सत्यनारायणकी पूजा कर सकूँ।' यह सुनकर शीलपालने उसे पाँच अशर्फियाँ दी और कहा-'कलावती! तुम्हारे पिताका कुछ ऋण शेष था, मैं उन्हें ही वापस कर रहा हूँ, इसे देकर आज मैं उऋण हो गया।' यह कहकर शीलपाल गया-तीर्थमें श्राद्ध करने चला गया। कन्याने अपनी माँ लीलावतीके साथ उस द्रव्यसे कल्याणप्रद सत्यनारायणन्नतका श्रद्धा-भक्तिसे विधिपूर्वक अनुष्ठान किया। इससे सत्यनारायण- भगवान् संतुष्ट हो गये।
उधर नर्मदा-तटवासी राजा अपने राजमहलमें सो रहा था। रात्रिके अन्तिम प्रहरमें ब्राह्मण- वेषधारी भगवान् सत्यनारायणने स्वप्रमें उससे कहा-'राजन्! तुम शीघ्र उठकर उन निर्दोष वणिकोंको बन्धनमुक्त कर दो। वे दोनों बिना अपराधके हो बंदी बना लिये गये हैं। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारा कल्याण नहीं होगा।' इतना कहकर वे अन्तर्हित हो गये। राजा निद्रासे सहसा जग उठा। वह परमात्माका स्मरण करने लगा। प्रात:काल राजा अपनी सभामें आया और उसने अपने मन्त्रीसे देखें नाये स्वनका फल पूछा। महामन्त्री ने भी राजासे कहा-'राजन्! बड़े आश्चर्यको बात है, मुझे भी आज ऐसा ही स्वप्न दिखलायो पड़ा। अतः उस वणिक् और उसके जामाताको बुलाकर भलीभांति पूछ-ताछ कर लेनी चाहिये।' राजाने उन दोनों को बंदी-गृहसे बुलवाया और पूछा-'तुम दोनों कहाँ रहते हो और तुम कौन हो?' इसपर साधु चणिक्ने कहा-'राजन्। मैं रत्नपुरका निवासी एक वणिकहूँ। मैं व्यापार करनेके लिये यहाँ आया था, पर देववश आपके सेवकों ने हमें चोर समझकर पकड़ लिया। साथमें यह मेरा जामाता है। बिना अपराधके ही हों मणि गुत की चोरी ला है। राजेन्द्र । हम दोनों चोर नहीं है। आप भलीभीत विचार कर लें। उसकी बातें सुनकर राजाको बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने उन्हें बन्धनमुक्त कर दिया। अनेक प्रकारसे उन्हें अलंकृत कर भोजन कराया और वस्त्र, आभूषण आदि देकर उनका सम्मान किया। साधु वणिक्ने कहा-'राजन्! मैंने कारागारमें अनेक कष्ट भोगे हैं, अब मैं अपने नगर जाना चाहता हूँ, आप मुझे आज्ञा दें।' इसपर राजाने अपने कोषाध्यक्षके माध्यमसे साधु वणिक्की नौका रत्नों आदिसे परिपूर्ण करवा दी। फिर वह साधु वणिक् अपने जामाताके साथ राजाद्वारा सम्मानित हो द्विगुणित धन लेकर रत्नपुरकी ओर चला। साधु वणिक्ने अपने नगरके लिये प्रस्थान किया, पर भगवान् सत्यनारायणका पूजन वह उस समय भी भूल गया। भगवान् सत्यदेवने जो कलियुग में तत्काल फल देते हैं, पुनः तपस्वीका रूप धारणकर वहाँ आकर उससे पूछा-'साधो ! तुम्हारी इस नौकामें क्या है?' इसपर साधु वणिक्ने उत्तर दिया-'आपको देनेके लिये कुछ भो धन मेरे पास नहीं है। नावमें केवल कुछ लताओंके पत्ते भरे पड़े हैं।' साधु वणिक्के ऐसा कहनेपर तपस्वीने कहा-'ऐसा ही होगाः' इतना कहकर तपस्वी अन्तर्धान हो गये। उनके ऐसा कहते ही नौकामें धनके बदले केवल पत्ते ही दौखने लगे। यह सब देखकर साधु अत्यन्त चकित एवं चिन्तित हो गया, उसे मूळ-सी आ गयी। वहे अनेक प्रकारसे विलाप करने लगा। वजपात होनेके समान वह स्तब्ध होकर सोचने लगा कि मैं अब क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरा धन कहाँ चला गया? जामालाके समझाने बुझानेपर इसे तपस्वीका शाप समझकर बह पुतः उन्हीं तपस्वीको शरणमें गया और गलेमें कपड़ा लपेटकर उन तपस्वीको प्रणाम कर कहा- 'महाभाग। आप कौन हैं? कोई गन्धर्व है या देवता हैं अधचा साक्षात् परमात्मा हैं? प्रभो! मैं आपकी महिमाको लेशमात्र भी नहीं जानता। आप मेरे अपराधोंको क्षमा कर दें और मेरी नौकाके धनको पुनः पूर्ववत् कर दें।' इसपर तपस्वीरूप भगवान् सत्यनारायणने कहा कि तुमने चन्द्रचूड राजाके सत्यनारायणके मण्डपमें 'संततिके प्राप्त होनेपर भगवान् सत्यदेवकी पूजा करूँगा'-
ऐसी प्रतिज्ञा की थी। तुम्हें कन्या प्राप्त हुई, उसका विवाह भी तुमने किया, व्यापारसे धन भी प्राप्त किया, बंदी-गृहसे तुम मुक्त भी हो गये, पर तुमने भगवान् सत्यनारायणकी पूजा कभी नहीं की। इससे मिथ्याभाषण, प्रतिज्ञालोप और देवताकी अवज्ञा आदि अनेक दोष हुए, तुम भगवान् का स्मरणतक भी नहीं करते। इसी कारण हे मूढ ! तुम कष्ट भोग रहे हो। सत्यनारायणभगवान् सर्वव्यापी हैं, वे सभी फलोंको देनेवाले हैं। उनका अनादर कर तुम कैसे सुख प्राप्त कर सकते हो। तुम भगवान्को याद करो, उनका स्मरण करो। इसपर साधु वणिक्को भगवान् सत्यनारायणका स्मरण हो आया और वह पश्चात्ताप करने लगा। उसके देखते-ही-देखते वहाँ वे तपस्वी भगवान् सत्यनारायणरूपमें परिवर्तित हो गये और तब वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगा-
'सत्यस्वरूप, सत्यसंध, सत्यनारायण भगवान् हरिको नमस्कार हैं। जिस सत्यसे जगत्को प्रतिष्ठा है, उस सत्यस्वरूप. आपको बार-बार नमस्कार है। भगवन् । आपकी मायासे मोहित होने के कारण मनुष्य आपके स्वरूपको जान नहीं पाता और इस दुःखरूपी संसार समुद्रको सुख मानकर उसी में लिप्त रहता है। धनके गर्वसे मैं मूढ होकर मदान्धकारसे कर्तव्य और अकर्तव्यकी दृरिसे शून्य हो गया। मैं अपने कल्याणको भी नहीं समझ पा रहा हूँ। मेरे दौरालय भावके लिये आप क्षमा करें। हे तपोनिये। आपको नमस्कार है। कृपासागर। आप
मुझे अपने चरणोंका दास बना लें, जिससे मुझे आपके चरण-कमलोंका नित्य स्मरण होता रहे। इस प्रकार स्तुति कर उस साधु वणिक्ने एक लाख मुद्रासे पुरोहितके द्वारा घर आकर सत्यनारायणको पूजा करनेके लिये प्रतिज्ञा की। इसपर भगवान्ने प्रसन्न होकर कहा-'वत्स! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, तुम पुत्र-पौत्रसे समन्वित होकर श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर मेरे सत्यलोकको प्राप्त करोगे और मेरे साथ आनन्द प्राप्त करोगे।' यह कहकर भगवान् सत्यनारायण अन्तर्हित हो गये और साधुने पुन: अपनी यात्रा प्रारम्भ की।
सत्यदेवभगवान्से रक्षित हो वह साधु वणिक् एक सप्ताह में नगरके समीप पहुँच गया और उसने अपने आगमनका समाचार देने के लिये घरपर दूत भेजा। दूतने घर आकर साधु वणिक्की स्त्री लीलावतीसे कहा-'जामाताके साथ सफलमनोरथ साधु वणिक् आ रहे हैं।' वह साध्वी लोलावतो कन्याके साथ सत्यनारायणभगवान्की पूजा कर रही थी। पतिके आगमनको सुनकर उसने पूजा वहींपर छोड़ दी और पूजाका शेष दायित्व अपनी पुत्रीको सौंपकर वह शोधतासे नौकाके समीप चली आयी। इधर कलावती भी अपनी सखियोंके साथ सत्यनारायणकी जैसे-तैसे पूजा समास कर बिना प्रसाद लिये ही अपने पतिको देखनेके लिये उत्तावली हो नौकाकी ओर चली गयो।
भगवान् सत्यनारायणके प्रसादके अपमानसे जामातासहित साधु वणिक्की नौका जलके मध्य अलक्षित हो गयी। यह देखकर सभी दुःखमें निमग्न हो गये। साधु वणिक् भी मूर्च्छित हो गया। कलावती भी यह देखकर मूच्छिन्त हो पृथ्वीपर गिर पड़ी और उसका सारा शरीर आँसुओंसे भीग गया। वह हवाके वेगसे हिलते हुए केलेके पत्तेके समान काँपने लगी। हा नाथ! हा कान्त! कहकर विलाप करने लगी और कहने लगी-'हे विधाता। आपने मुझे पतिसे वियुक्त कर मेरी आशा तोड़ दी। पतिके बिना स्त्रीका जीवन अधूरा एवं निष्फल है।' कलावती आर्तस्वरमें भगवान् सत्यनारायणसे बोली-'हे सत्यसिन्धो ! हे भगवान् सत्यनारायण ! मैं अपने पतिके वियोगमें जलमें डूबनेवाली हूँ, आप मेरे अपराधोंको क्षमा करें। पतिको प्रकट कर मेरे प्राणों की रक्षा करें।' (इस प्रकार जब वह अपने पति के पादुकाओंको लेकर जलमें प्रवेश करनेवाली ही धी) उसी समय आकाशवाणी हुई 'हे साधो। तुम्हारी पुत्रीने मेरे प्रसादका अपमान किया है। यदि वह पुनः घर जाकर श्रद्धापूर्वक प्रसादको ग्रहण कर ले तो उसका पति नौकासहित यहाँ अवश्य दीखेगा, चिन्ता मत करो।' इसपर आश्चर्यचकित हो कलावतीने वैसा ही किया और उसे उसका पति पुनः अपनी नौकासहित दोखने लगा। फिर क्या था? सभी परस्पर आनन्दसे मिले और घर आकर साधु वणिक्ने एक लाख मुद्राओंसे बड़े समारोहपूर्वक भगवान् सत्यदेवको पूजा की और आनन्दरी रहने लगा। पुन: कभी भगवान् सत्यदेवकी उपेक्षा नहीं की। उस व्रतके प्रभाव पुर पौत्रसबिना अनेक भागाका उपभोग करते हुए सभी स्वर्गलोक चले गये। इस इतिहासको जो मनुष्य भकिन सुनता है वह मा विष्णुक
*सत्यरूपं सत्त्यसन्धं सत्यनारायणं हरिम् ।
वत्सत्यत्वेन जगतस्तं सत्य त्वा नमाम्यहम् ।।
त्वमायामोहितात्मानौ न पश्यन्त्यात्मनः शुभम् ।
दुःखाम्भोधी सदा ममा द सो च सुखपानिरः ॥
मूढोऽहं धनगर्वेण मदान्धीकृतलोचना ।
न जाने स्वात्मनः क्षेप करः पश्यामि मृद्रधीः ।।
क्षमस्य मम दौरातयं तापोभाने हरे नमः ।
आज्ञापया पदास्यं में येन थे चरणों स्मरे ।।
अत्यन्त प्रिय हो जाता है। अपनी मनःकामनाकी सिद्धि प्रास कर लेता है।
सूतजी बोले-ऋषिगणो! मैंने सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ इस सत्यनारायणव्रतको कहा। ब्राह्मणके मुखसे निकला हुआ यह व्रत कलिकालमें अतिशय पुण्यप्रद है। (अध्याय २९)
[श्रीसत्यनारायणव्रत-कथाका षष्ठ अध्याय]
(सत्यनारायणव-कथा सम्पूर्ण)