महाराज युधिष्ठिरने कहा- भगवन्! अनेक प्रकारके गोदान और भूमिदानकी विधि एवं माहात्म्य आदि सुनने के बाद अब मैं विद्यादानकी महिमा सुनना चाहता हूँ, उसे आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन् ! जिस प्रकार विद्याका दान करना चाहिचे तथा उससे जो फल प्राप्त होता है, उसका मैं वर्णन कर रहा हूँ-
शुभ मुहूर्तमें स्वस्तिक, फूलमालासे भूषित एक चौकोर मण्डल बनाकर उसके मध्यमें पुस्तकको स्थापित कर गन्ध, अक्षत, पुष्प आदिसे उसका पूजन करे। लेखकका पूजनकर सुवर्णकी लेखनी और चाँदीका मसिपात्र (दावात) बनाकर लेखकको देना चाहिये। लेखकको सुशील और अप्रमत्त होना चाहिये। अनन्तर लेखक पुस्तक लिखना आरम्भ करे। उसे एकागचित्त होकर मात्रा, अनुस्वार, संयुक्त अक्षरोंको साफ साफ और पर्दोको अलग-अलग लिखना चाहिये। अक्षर गोल-गोल सुन्दर, एक समान और शीर्षरेखायुक्त हों। इस विधिसे शिवभक्तिपरक या विष्णुभक्तिपरक पुराण, आगम, धर्मशास्त्र आदि लिखवाकर अन्तमें वस्त्र और आभूषण आदिसे लेखकका पूजन करने के बाद उस पुस्तकको दो वस्त्रोंसे आवेष्टित कर दक्षिणासहित व्युत्पन्नमति, प्रियंवद और उत्तम वाचक ब्राह्माणको अथवा सबके कल्याणके लिये मठ, मन्दिर या सामान्य गृह आदिमें स्थापित करे । इस विधिसे जो व्यक्ति पुस्तकदान करता है, वह यज्ञ और तीर्थयात्रा करनेसे भी कोटिगुना अधिक फल प्राप्त एक हजार कपिला मायका विधिपूर्वक दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह एक पुस्तकके दान करनेसे हो जाता है। फिर पुराण, रामायण और महाभारत, गीता आदि पवित्र ग्रन्थोंके दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसका वर्णन कौन कर सकता है?
प्रात:काल उठकर जो अपने शिष्योंको वेदादि
*वस्त्रयुग्मेन संवीतं पुस्तकं प्रतिपादयेत्।
सामान्यं सर्वलोकानां स्थापयेदच वा मठे।
(उत्तरपर्व १७४।११)
शास्त्रों तथा नृत्य, गीत-कलाओंको पढ़ाता है, उसके समान पुण्यात्मा कौन है ? जो पढ़ानेवालेको वृत्ति देकर विद्यार्थियोंको पढ़वाता है, उसने कौन-सा दान नहीं किया? विद्यार्थियोंको भोजन, वस्त्र, भिक्षा एवं पुस्तक आदि देनेसे मनुष्योंके सभी मनोरथ नि:संदेह सिद्ध होते हैं। वह विवेकवान्, दीर्घजीवी होता है तथा धर्म, अर्थ, काम आदि सब कुछ प्राप्त कर लेता है। राजन् ! जो भी व्यक्ति शास्त्रविद्या, शस्त्रविद्या, चौंसठ कलाएँ, ज्ञान-विज्ञान आदिको सीखना चाहता है, उसकी यथाशक्ति सहायता करनी चाहिये और उसके उपकारके लिये सदा तत्पर रहना चाहिये, क्योंकि उससे पारमार्थिक लाभ होता है। हजार वाजपेय-यज्ञ करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वही फल सद्विद्यादानसे प्राप्त हो जाता है। शिव, विष्णु, अथवा सूर्यके मन्दिरोंमें जो व्यक्ति प्रतिदिन पुराण आदिके वाचनकी व्यवस्था करवाता है, वह प्रतिदिन गौ, भूमि, सुवर्ण और वस्त्रके दानका फल प्राप्त करता है। विद्याहीन व्यक्ति धर्म तथा अधर्मका निर्णय नहीं कर सकता, इसलिये सदा विद्यादानमें तत्पर रहना चाहिये। ब्रह्मा आदि सभी देवता विद्यादान में प्रतिष्ठित रहते हैं। विद्यादान करनेवाला व्यक्ति एक कल्पतक विष्णुलोकमें पूजित होता है और पुनः भूलोकमें जन्म लेकर दाता, भोगी, रूपसौभाग्ययुक्त, दीर्घायु, नीरोग और पुत्र-पौत्रयुक्त धर्मात्मा राजा होता है । (अध्याय १७४)