भविष्य महा पुराण

भगवान् सूर्यके तेजसे आचार्य ईश्वरपुरी, आचार्य रामानन्द और निम्बार्काचार्यका आविर्भाव*

ऋषियोंने पूछा- सूतजी महाराज! देवगुरु बृहस्पतिने देवताओंको मण्डलस्थ भगवान् सूर्यका कौन सा माहात्म्य बतलाया, उसे आप बतलानेकी कृपा करें।

सूतजीने कहा- ऋषियोन प्रयागमें जब देवगुरु

बृहस्पति अपने आसनपर ! आसीन थे, उस समय देवताओंके साथ इन्द्रने भगवान् सूर्यके तत्काल प्रसत्र होनेके लिये जिस माहात्म्यको बतलाया था, उसे आप सुनें।

बृहस्पतिने देवताओंसे कहा-देवगणो! बहिष्मती (विदर) नगरसें धातृशर्मा नामक एक ब्राह्मणने पुत्रप्रासिके लिये तपस्या कर प्रजापति ब्रह्माको संतुष्ट किया। पाँच वर्धमें भगवान् प्रजापति संतुष्ट हुए और उन्होंने पुत्र, कन्या एवं पुनः पुत्र इस प्रकार तीन संतान प्रान करनेका वर प्रदान किया। भातशर्माको एक वर्षक गन्तरसे तीनों संताने उत्पन हुई पूजाके लाला पालनसे बातृशो बहुत आनन्दित मा। धरधर बडे होने लगे। धातृशर्माको इनके विवाहको चिन्ता होने लगी। तब इन लोगों के उत्तम विवाह के लिये उसने गन्धर्वपति तुम्बुरुको हवन आदिसे संतुष्ट किया । तुम्बुरुने आकर उनके मनोरथकी पूर्तिका वरदान दिया। धातृशर्मा वधू और जामाताको देखकर बहुत प्रसन्न हुआ, किंतु इन लोगोंके विविध अलंकारों और धन, वस्त्र आदिकी प्रासिके लिये वह चिन्तित हो गया। वह साठ वर्षका हो गया। उसने पुनः धनपति कुबेरकी विधिवत् पूजा की। प्रसन्न हो भगवान् कुबेरने उसे बहुत धन दिया और स्वर्ण प्रदान करनेवाली विद्या (मन्त्र) भी उसे प्रदान की। धीरे धीरे समय बीतनेपर बहू बीमार हो मरणासन्न हो गया। अपनी यह दशा देखकर उसने भगवान् शंकरको स्तुतियोंसे संतुए किया। भगवान् शंकरने एक मासमें ही उसे ज्ञान प्रदान किया। नयबुद्धि धातृशनि रविवार के व्रतके द्वारा माहनाशक भास्कर की आराधना की। पाँच वर्षमें उसके भक्तिभावसे संतुष्ट हो भगवान् सूर्यने कहा- वत्स ! तुम क्या वर चाहते हो,

*इन आचार्योंकी विशेष जानकारी के लिये कल्याण के वें वर्षके विशेषाङ्कको देखना चाहिये।

कहो।' इसपर धातृशर्माने कहा-'भगवन्! आपको बार-बार प्रणाम है, आप मुझे मोक्ष प्रदान करनेकी कृपा करें।' भगवान् सूर्यने ज्ञानी द्विज धातृशर्मासे कहा-'विप्र। मोक्ष चार प्रकारके हैं-तपसे उत्पन्न सालोक्य, भक्तिसे उत्पन्न सामीप्य, ध्यानसे उत्पन्न सारूप्य और ज्ञानसे उत्पन्न सायुज्य। इन चतुर्विध मोक्षोंके अधिष्ठाता परम परमेश्वर हैं। भगवान् विष्णुके उस परम पदको प्राप्त करनेपर पुनः आगमन नहीं होता। विप्रेन्द्र ! तुमको सायुज्य- मोक्षकी प्राप्ति होगी और मन्वन्तरपर्यन्त तुम्हारा वह मोक्ष वर्तमान रहेगा।' ऐसा कहकर भगवान् भास्कर अन्तर्धान हो गये और विप्रको मोक्ष- प्राप्तिका वर प्राप्त हो गया।

सूतजीने कहा-मुने! इस प्रकार चैत्र मासमें देवाधिदेव दिवाकरने अपने स्वरूपका उन्हें दर्शन कराया और कहा 'वंगदेशमें अपने अंशसे उत्पन्न होकर मैं देवकार्य सम्पन्न करूँगा।' यह कहकर दिवाकरने अपने मुखसे तेजको उत्पन्न किया और अपनी भक्त सुकन्या जो द्विज-पत्नी थी, उसके कल्याणके लिये उसे प्रदान किया। धातृशर्मा ब्राहाण जिसने सूर्यको आराधना कर मोक्ष प्राप्त किया था, वही उस तेजसे सम्पन्न होकर काव्यकर्ताके घरमें ईश्वरपुरी नामसे उत्पन्न हुआ। उसने वैदिक विनोंको शास्त्रार्थमें जीतकर महान् कीर्ति प्राप्त की।

ऋषियो ! बृहस्पतिने जैसा मुझसे कहा था, वैसा ही मैंने आपसे कहा। पुनः बृहस्पतिद्वारा कही गयी एक अन्य रमणीय कथा सुने।

मायावती (हरिद्वार) नगरी मित्रशर्मा नामका एक ब्राह्मण रहता था। वह काव्यप्रिय विधापरायण और रसिक था। हरिद्वारमे कुम्भराक्षिपर बृहस्पति के आलेपर महोत्सव समय अनेक राजा स्थानपर आये। उस महोत्सबमे अनेक अलंकारोंसे अलंकृत मितशमा एवं असंख्ला स्त्री पुरुष आये वहीं दाक्षिणात्य राजा कामसेनकी चित्रिणी नामकी एक कन्या भी आयी। उसकी अवस्था बारह वर्षकी थी। उसे मित्रशर्माने बड़े ध्यानसे देखा। श्रेष्ठ मित्रशर्माको देखकर चित्रिणीके हृदयमें भी उसके प्रति प्रीति उत्पन्न हो गयी। घर आकर वह उसे प्राप्त करने के लिये प्रतिदिन भगवान् भास्करकी श्रद्धापूर्वक आराधना करने लगी। इधर मित्रशर्मा भी वैशाख मासमें गङ्गामें मानकर जलके मध्य स्थित होकर भगवान् सूर्यका ध्यान करते हुए 'आदित्यहृदयस्तोत्र' का प्रतिदिन पाठ करने लगा। एक मास बाद भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर उसे मनोरथ पूर्ण होनेका वर प्रदान किया। वर प्राप्तकर वह अपने घर लौट आया। चित्रिणीने भी भगवान् भास्करसे अपने मनोऽनुकूल वर प्रास कर लिया। राजा कामसेनको भी भगवान् सूर्यने स्वनमें कहा कि 'तुम अपनी कन्याका विवाह मित्रशर्मासे कर दो', तब राजाने ऐसा ही किया।

विवाहके बाद दोनों ही भगवान् सूर्यका प्रतिदिन व्रत रखते थे और ताम्रपात्रपर सूर्ययन्त्र लिखकर रक्त पुष्योंसे नित्य उनका श्रद्धा भक्तिपूर्वक पूजन भी करते थे। उनको अवस्था प्रायः सौ वर्षको हो गयी, किंतु वे नीरोग रहे, उनका जीवन देवमय हो गया। मृत्युके अनन्तर उन्होंने भगवान सूर्यको सामीप्यता प्राप्त की। इन्हीं के पुत्ररूपमें कान्यकुब्जमें देवल ब्राह्मणके घरमें भगवान् सूर्य अवतरित हुए। ये ही काशीमें रामानन्दके नामसे विख्यात हुए। बाल्यावस्थासे ही ये ज्ञानी, रामनाम- जप-परायण एवं रामभक्तिमें रत थे। पिता-माताका परित्याग कर ये राघवानन्द यतिकी शरणमें आये। उस समय भगवान् सीतापति श्रीराम उनके हृदयमें न सहसा विराजमान हो गये। इस प्रकार भगवान् से मित्रदेव (सूर्यदेव) के अंशरबलवान्, हरिभक्त रामानन्दका आविर्भाव हुआ।

बृहस्पतिने पुन: कहा-देवेन्द्र! ज्येष्ठ मासके सूर्यकी रमणीय कथा आप सुनें। प्राचीन कालमें सत्ययुगमें अर्यमा नामका एक विप्र उत्पन्न हुआ था, वह धर्मशास्त्रपरायण तथा वेद-वेदाङ्गक तत्त्वोंका ज्ञाता था। राजा श्राद्धयज्ञकी पितृमती नामकी पुत्री उसकी पत्नी थी। वह अतिशय साध्वी थी। उसने धर्मशास्त्रपरायण सात पुत्रोंको जन्म दिया। किसी समय उस बुद्धिमान् ब्राह्मण अर्यमाने हृदयमें भलीभाँति विचारकर धनकी कामनासे अनेक प्रकारकी उपासनाओंसे भगवान् भास्करको प्रसन्न किया। ज्येष्ठ मासमें भगवान् सूर्यने उसे एक दिव्य मणि प्रदान की। उसके प्रभावसे एक प्रस्थ स्वर्ण प्रतिदिन उत्पन्न होता था। उसने उस धनसे धर्मकार्यार्थ-वापी, कूप, तडाग, सुन्दर भवन आदिका निर्माण कराया। अन्त में उसने सूर्यदेवकी कृपासे एक हजार वर्धतक निर्विघ्र जरारहित जीवन बिताकर रमणीय सूर्यलोकको प्राप्त किया। वहाँ एक लक्ष वर्षतक सूर्यरूपमें निवास किया। देवेन्द्र ! इस प्रकार मैंने भास्करके माहात्म्यको आपसे कहा। इसलिये देवताओंके साथ आप भी मण्डलस्थ भगवान् सूर्यकी पूजा करें।

ज्येष्ठ मासमें देवताओंने श्रद्धासम्पन्न हो भगवान् सूर्यको स्तुतियोंसे संतुष्ट किया। प्रसन्न हो भगवान् सूर्यने उपस्थित होकर कहा-'देवगणो। द्वापरके अन्त में श्रीकृष्णाकी आज्ञासे सुदर्शनका जन्म होगा, वह निाबादित्य (निबार्काचार्य) नामसे प्रसिद्ध होगा और क्षीण होते हुए धर्मकी रक्षा करेगा।'

सूतजीने कहा- ऋषियों ! अब आप महात्मा निाचार्कके चरिखको सुनें जिसको भगवान् श्रीकृष्णाने कहा था। भगवान श्रीकृष्ण सुदर्शनसे कहा था कि मेरी आज्ञासे आप देवकार्य सम्पन्न करें से दक्षिण दिशा नादाके तत्पर देवताओं और कपियोले रोचित लेला नामक एक देश है। यहाँ आप अपती होकर देवर्षि नारदसे उपदेश प्राप्तकर मथुरा, नैमिषारण्य, द्वारावती, सुदर्शनाश्रम आदि स्थानों में स्थित होकर धर्मका प्रचार करें। इस आदेशको 'ओम्' के द्वारा स्वीकारकर भक्तोंकी अभिलाषाको पूर्ण करनेवाले भगवान् श्रीसुदर्शन पृथ्वीतलपर अवतीर्ण हुए। पवित्र सुदर्शनाश्रममें भृगुवंशमें उत्पन्न वेदवेदाङ्ग- पारङ्गत अरुण नामके एक महामनस्वी द्विजश्रेष्ठ मुनि रहते थे। उनकी भार्याका नाम था जयन्ती। अरुणमुनिने ध्यानद्वारा भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्रके तेजको धारण किया और उस तेजको पतिपरायणा जयन्तीदेवीने मनसे धारण किया। उस तेजके प्रभावसे देवी जयन्ती चन्द्रमाके समान सुशोभित होने लगी। परम शुभ समय उपस्थित हुआ। दिशाएँ निर्मल हो गयौं । कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी पूर्णिमामें जब चन्द्रमा वृषराशिपर स्थित थे, कृत्तिका नक्षत्र था, पाँच ग्रह अपने उच्च स्थानपर स्थित थे, उस समय सायंकालमें मेषलग्नमें जयरूपिणी जयन्तीदेवीसे जगदीश्वर निम्बादित्य प्रादुर्भूत हुए, जिन्होंने इस विश्वको वेदधर्ममें नियोजित किया।

एक समय निम्बार्कके आनासमें भगवान् विरिञ्चि पधारे। उन्होंने कहा-'मैं भूखसे व्याकुल होकर आपके पास आया हूँ। जबतक आकाशमें भगवान् सूर्य स्थित हैं, तबतक ही मुझे भोजन करा दीजिये। विरिशिकी इस बातको सुनकर निम्बार्कने उन्हें भोजन दिया। परंतु भगवान् सूर्य अस्ताचलपर पहुँच गये थे। लब निम्बार्क मुनिने अपने तेजसे भगवान् सुदर्शनके तेजको निकटस्थ एक निम्ब वृक्षपर प्रतिष्ठित कर दिया। ब्रह्मा सूर्यके समान उस तेजको देखकर आश्चर्यमें पड़ गये और एक दूसरे सूर्यके समान उस बालमुनिको दण्डवत् प्रणाम कर उसे संतुए किया और बार-बार साधुवाद देते हुए कहा कि आजसे आम सारी पृथ्वीपर निम्बादित्य नामसे प्रसिद्ध होंगे।' (अध्याग ७)