भविष्य महा पुराण

विविध स्मृति-धर्मों तथा संस्कारोंका वर्णन

राजा शतानीकने कहा-ब्रह्मन्! पाँच प्रकारके जो स्मृति आदि धर्म हैं, उन्हें जाननेकी मुझे बड़ी ही अभिलाषा है। कृपापूर्वक आप उनका वर्णन करें।

सुमन्तुजी बोले-महाराज! भगवान् भास्करने अपने सारथि अरुणसे जिन पाँच प्रकारके धर्मोको बतलाया था, मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ, आप उन्हें सुनें।

भगवान् सूर्यने कहा-गरुडाग्रज ! स्मृतिप्रोक्त धर्मका मूल सनातन वेद ही है। पूर्वानुभूत जानका स्मरण करना ही स्मृति है। स्मृत्यादि धर्म पाँच प्रकारके होते हैं। इन धर्मोंका पालन करनेसे स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति होती है तथा इस लोक में सुख, यश और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। पहला वेद- धर्म है। दूसरा है आश्रम-धर्म अर्थात् ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास । तीसरा है वर्णाश्रम- धर्म अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । चौथा है गुणधर्म और पाँचवाँ है नैमित्तिक धर्म-ये ही स्मृत्यादि पाँच प्रकारके धर्म कहे गये हैं। वर्ण और आश्रमधर्मके अनुसार अपने कर्तव्योंका निर्वाह करते हुए कर्मोको सम्पादित करना ही वर्णाश्रम और आश्रमधर्म कहलाता है। जिस धर्मका प्रवर्तन गुणके द्वारा होता है, वह गुणधर्म कहलाता है। किसी निमित्तको लेकर जो धर्म प्रवर्तित होता है, उसे नैमित्तिक धर्म कहते हैं। यह नैमित्तिक धर्म जाति, द्रव्य तथा गुणके आधारपर होता है।

निषेध और विधिरूपमें शास्त्र दो प्रकारके होते हैं। स्मृतियाँ पाँच प्रकारको है-दृष्ट- स्न्ति, अदए स्मृति, दृशदृष्ट-स्मृति, अनुवाद स्मृति और अदाए स्मृति। सभी स्मृतियों का मूल वेद हो है। स्मृतिधर्मक साधन स्थान ब्रह्मावर्त, मध्यक्षेत्र मध्यदेश, आर्यावर्त तथा यज्ञिय आदि देश है। सरस्वती और दृषद्वती (कुरुक्षेत्रके दक्षिण सीमाकी एक नदी) इन दो देव-नदियों के बीचका जो देश है वह देव-निर्मित देश ब्रह्मावर्त नामसे कहा जाता है। हिमाचल और विन्ध्यपर्वतके बीचके देशको जो कुरुक्षेत्रके पूर्व और प्रयागके पश्चिममें स्थित है, उसे मध्यदेश कहा जाता है। पूर्व-समुद्र तथा पश्चिम-समुद्र, हिमालय तथा विन्ध्याचल पर्वतके बीचके देशको आर्यावर्तदेश कहा जाता है। जहाँ कृष्णसार मृग (कस्तूरी मृग) विचरण करते हैं और स्वभावतः निवास करते हैं, वह यज्ञियदेश है। इनके अतिरिक्त दूसरे अन्य देश म्लेच्छदेश हैं जो यज्ञ आदिके योग्य नहीं हैं। द्विजातियोंको चाहिये कि विचारपूर्वक इन देशोंमें निवास करें।

भगवान् आदित्यने पुनः कहा-खगराज! अब मैं आश्रमधर्म बतला रहा हूँ। अहाचर्याश्रम- धर्म, गृहस्थाश्रम धर्म, वानप्रस्थाश्रम-धर्म और संन्यासाश्रम-धर्म-क्रमसे इन चार प्रकारसे जीवन- यापन करनेको आश्रम धर्म कहा जाता है। एक ही धर्म चार प्रकारसे विभक्त हो जाता है। ब्रह्मचारीको गायत्रीकी उपासना करनी चाहिये। गृहस्थको संतानोत्पत्ति और ब्राह्मण, देव आदिकी पूजा करनी चाहिये। वानप्रस्थीको देवव्रत-धर्मका और संन्यासीको नैष्ठिक धर्मका पालन करना चाहिये। इन चारों आश्रमोंके धर्म वेदमूलक हैं। गृहस्थको ऋतुकालमें मन्त्रपूर्वक गर्भाधान-संस्कार करना चाहिये। तीसरे मासमें पुंसवन तथा छठे अथवा सातवें मासमें सीमन्तोन्नयन संस्कार करना चाहिये। जन्मके समय जातकर्म-संस्कार करना चाहिये। जातक (शिशु) को स्वर्ण, घी, मधुका मन्त्रोंद्वारा प्राशन कराना चाहिये। जन्मसे दसवें, ग्यारहवें या बारहवें दिन शुभ मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र, योग आदि देखकर नामकरण संस्कार करना चाहिये। शास्त्रानुसार छठे मासमें अन्नप्राशन करना चाहिये। सभी द्विजाति बालकोंका चूडाकरण-संस्कार एक वर्ष अथवा तीसरे वर्षमें करना चाहिये। ब्राह्मण- बालकका आठवें वर्षमें, क्षत्रियका ग्यारहवें और वैश्यका बारहवें वर्षमें यज्ञोपवीत-संस्कार करना उत्तम होता है। गुरुसे गायत्रीकी दीक्षा ग्रहण कर वेदाध्ययन करना चाहिये। विद्याध्ययनके पश्चात् गुरुकी आज्ञा प्राप्तकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहिये और गुरुको यथेष्ट सुवर्णादि देकर प्रसन्न करना चाहिये। गृहस्थाश्रममें प्रवेश कर अपने समान वर्णवाली उत्तम गुणों से युक्त कन्यासे विवाह करना चाहिये। जो कन्या माता-पिताके कुलसे सात पीढ़ीतककी न हो और समान गोत्रकी न हो ऐसी अपने वर्णकी कन्यासे विवाह करना चाहिये।

विवाह आठ प्रकारके होते हैं-ब्राहा, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्ष, राक्षस और पैशाच । वर और कन्याके गुण-दोषको भलीभाँति परखनेके बाद ही विवाह करना चाहिये। कन्याएँ अवस्था- भेदसे चार प्रकारकी होती हैं। जिनके नाम इस प्रकार हैं-गौरी, नग्निका, देवकन्या तथा रोहिणी। सात वर्षकी कन्या, गौरी, दस वर्षकी नग्निका, बारह वर्षकी देवकन्या तथा इससे अधिक आयुकी कन्या रोहिणी (रजस्वला) कहलाती है। निन्दित कन्याओंसे विवाह नहीं करना चाहिये। द्विजातियोंको अग्निके साक्ष्यमें विवाह करना चाहिये। स्त्री-पुरुषके परस्पर मधुर एवं दृढ़ सम्बन्धोंसे धर्म, अर्थ और कामको उत्पत्ति होती है और वही मोक्षका कारण भी है। (अध्याय १८१-१८२)