सूतजी बोले-द्विज श्रेष्ठ! अब मैं यज्ञकुण्डोंके। निर्माण एवं उनके संस्कारकी संक्षिप्त विधि बतला रहा हूँ। कुण्ड दस प्रकारके होते हैं- (१) चौकोर, (२) वृत्त, (३) पडा, (४) अर्धचन्द्र, (५) योनिकी - आकृतिका, (६) चन्द्राकार, (७) पञ्चकोण, (८) ससकोण (९) अष्टकोण और (१०) नौ कोणोंवाला।
सबसे पहले भूमिका संशोधन कर भूमिपर पड़े हुए तृण, केश आदि हटा देने चाहिये। फिर उस भूमिपर भस्म और अंगारे घुमाकर भूमि-शुद्धि करनी चाहिये, तदनन्तर उस भूमिपर जल-सिंचनकर बीजारोपण करे और सात दिनके बाद कुण्ड निर्माणके लिये खनन करना चाहिये। तत्पश्चात् अभीष्ट उपर्युक्त दस कुण्डोमेसे किसीका निर्माण करना चाहिये। कुण्ड निर्माणार्थ विधिवत् नाप जोखने लिये सूनका उपयोग करे। कामना-भेदसे अण्ड भी अनेक आकार के होते हैं। कुण्डके अनुरूप हो मेखला भी बनायी जाती है। जो आहुतियों को संध्याकाजी अलग- बाला विधान है। विधि- प्रमाणके अनुसार आहुति देनी चाहिये। मानरहित. हवन करनेसे कोई फल नहीं मिलता। अत: बुद्धिमान् मनुष्यको मानका पूर्ण ज्ञान रखकर ही कुण्डका विधिवत् निर्माण कर यज्ञानुष्ठान करना चाहिये।
जिस यज्ञका जितना मान होता है, उसी मानकी ही योजना करनी चाहिये। पचास आहुतियोंका मान सामान्य है, इसके बाद सौ, हजार, अकुत, लक्ष और कोटि होम भी होते हैं। बड़े बड़े यज्ञ सम्पत्ति रहनेपर हो सकते हैं या राजा-महाराजा कर सकते हैं, मनुष्य अपने-अपने प्राक्तन कर्मके अनुसार सुख-दुःखका उपभोग करता है तथा शुभाशुभ फक्त ग्रहोंके अनुसार भोगता है। अत: शान्ति पुष्टि कर्ममें ग्रहोंकी शान्ति प्रयत्नपूर्वक परम भक्तिसे करनी चाहिये। दिव्य, अन्तरिक्ष और पृथिवी-सम्बन्धी बड़े-बड़े अद्भुत उत्पातोंके होनेपर शुभाशुभ फल देनेवाली ग्रह-शान्ति करनी चाहिये। इन अवसरों पर अयुत होम करना चाहिये। काम्य- कर्म या शान्ति पुटिके लिये ग्रहों का भक्तिपूर्वक नित्य पूजन एवं हवन करना चाहिये। कलिमें ग्रहोंके लिये लक्ष एवं कोटि होमका विधान है। गृहस्थको आभिचारिक कर्म नहीं करना चाहिये। कुण्डोंका शास्त्रानुसार संस्कार करना चाहिये। बिना संस्कार किये होम करनेपर अर्थ-हानि होती है। अत: संस्कार करके होमादि क्रियाएँ करनी चाहिये।
कुण्डोंके स्थानका ओंकारपूर्वक अवेक्षण, कुशके जलसे प्रोक्षण, त्रिशूलीकरण तथा सूत्रसे आवेष्टित करना, कौलित करना, अग्रिजिह्वाकी भावना करना एवं अग्न्याहरण आदि अठारह संस्कार होते हैं। शूद्र घरसे अग्नि कभी न लाये। स्त्रीके द्वारा भी अग्नि नहीं मैंगवानी चाहिये। शुद्ध एवं पवित्र व्यक्तिद्वारा अग्नि ग्रहण करना चाहिये। तदनन्तर अग्निका संस्कार करे और उसे अपने अभिमुख रखे। अग्नि-बीज (२) और शिव बीज (श)-से उसका प्रोक्षण करे और शिव-शक्तिका ध्यान करे, इससे अभीष्ट सिद्धिकी प्रासि होती है। उसके बाद वायुके सहारे अग्नि प्रज्वलित करे। देवी भगवतीका और भगवान्का अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय आदिसे पूजन करे। अग्नि- पूजनमें इस मन्त्रका उपयोग करे-
'पितृपिङ्गल दह दह पच पच सर्वज्ञाज्ञापय स्वाहा।'
यज्ञदत्तमुनिने अग्निकी तीन जिह्वाएँ बतलायी हैं-हिरण्या, कनका तथा कृष्णा * । समिधा-भेदसे जिन जिला-भेदोंका वर्णन है, उनका उन्होंने विनियोग करना चाहिये। बहुरूपा, अतिरूपा और सात्त्विका इनका योग-कर्ममें विनियोग होता है। आज्यहोममें हिरण्या, त्रिमधु (दूध, चीनी और मधु-इन तीनोंके समाहार) से हवन करनेपर कर्णिका, शुद्ध क्षीरसे हवन करनेपर रक्ता, नैत्यिक कर्ममें प्रभा, पुष्पहोममें बहुरूपा, अन्न और पायससे हवन करनेमें कृष्णा, इक्षुहोममें पद्मरागा, पद्महोममें सुवर्णा और लोहिता, बिल्वपत्रसे हवन करनेपर श्वेता, तिल-होममें धूमिनी, काष्ठ होममें करालिका, पितृहोममें लोहितास्या, देवहोममें मनोजवा नामकी अग्निज्वाला कही गयी है। जिन-जिन समिधाओंसे हवन किया जाता है, उन-उन समिधाओंमें 'वैश्वानर' नामक अग्निदेव स्थित रहते हैं।
अग्निके मुखमें मन्त्रोच्चारणपूर्वक आहुति पड़नेपर अग्नि देवता सभी प्रकारका अभ्युदय करते हैं मुखके अतिरिक्त शेष स्थानोंपर आहुति देनेसे अनिष्ट फल होता है। अग्निकी जिलाएँ विशेषरूपसे घृताहुति में हिरण्या एवं अन्यान्य आहुतियोंगे गणना, वक्रा, कृष्णाभा, सुप्रभा, बहुरूपा तथा अति- रूपिका नामसे प्रसिद्ध हैं। कुण्डके उदरमें अर्थात् मध्यमें आहुतियाँ देनी चाहिये। इधर-उधर नहीं देनी चाहिये। चन्दन, अगर, कपूर, पाटला तथा यूथिका (जूही)-के समान अग्निसे प्रादुर्भूत गन्ध सभी प्रकारका कल्याणकारक होता है।
यदि अग्निकी ज्वाला छिन्न वृत्त रूपमें उठती हो तो मृत्युभय होता है और धनका क्षय होता है। अग्नि बुझ जाने तथा अत्यधिक धुआँ होनेपर भी महान् अनिष्ट होता है। ऐसी स्थितियोंमें प्रायश्चित्त करना चाहिये। पहले अट्ठाईस आहुतियाँ देकर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। अनन्तर भीसे मूल मन्त्रद्वारा पचीस आहुतियाँ देनी चाहिये। तीनों कालोम महास्नान करे तथा श्रद्धा भक्ति पूर्वक भगवान् विष्णुकी पूजा करें।
*प्रकरान्तरसे विश्वमूर्ति स्फुलिङ्गिनी धूम्रवर्णा मनोजया, लोहितास्या करालास्या तथा काली-ये भी सात प्रकारकी अग्निजिह्राएँ कही गयी हैं।