ब्रह्माजी बोले-विष्णो ! जिन-जिन कामनाओंको लेकर अथवा निष्काम होकर भगवान् सूर्यनारायणके उपवास-व्रतोंको करके व्यक्ति मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है, अब आप उन-उन उपवास- व्रतोंके विषयमें सुनें।
जो व्यक्ति फाल्गुन मासकी शुक्ला सप्तमी तिथिको भक्तिपूर्वक बार-बार हेलि नामक भगवान् सूर्यका जप एवं पूजन करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। देव पूजनमें पवित्र होकर १०८ बार जप करना चाहिये । स्नान करते हुए, प्रस्थान-कालमें, उठते-बैठते अर्थात् सभी समय भगवान् सूर्यका नामोच्चारण करना चाहिये। उपवास करनेवाले व्यक्तिको पाखण्डी, पतित और अन्यायी लोगोंसे बातचीत नहीं करनी चाहिये। श्रद्धापूर्वक सूर्यदेवके प्रति मन एकाग्र करके उनकी पूजा करते हुए इस श्लोकका पाठ करना चाहिये-
हंस हंस कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव।
संसारार्णवमनानां त्राता भव दिवाकर॥
(ब्राह्यपर्व १०४।५)
'हे परमहंस स्वरूप भगवान् सूर्य! आप दयालु | हैं, गतिहीनॉको सद्गति प्रदान करनेवाले हैं, संसार- सागरमें निमग्र लोगोंके लिये आप रक्षक बनें।'
इस प्रकार एकाग्रचित्त होकर उपवास करते हुए भगवान् सूर्यनारायणका पूजन करना चाहिये। पूर्वाहकालमें नानकर सूर्यदेवका पूजन करे, तत्पश्चात् । 'हंस हंस०' इस श्लोकका जप करे और भगवान्
सूर्यके चरणों में तीन बार जलधारा अर्पित करे।
इसी प्रकार चैत्र, वैशाख और ज्येष्ठ मासमें भी भगवान् सूर्यदेवका पूजन करते हुए मनुष्य मृत्युलोकमें ही श्रेष्ठ गतिको प्राप्त कर लेता है और अन्तमें सूर्यलोकको प्राप्त करता है। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन मासमें भी इसी विधिसे उपवास रखकर सूर्यभगवान्का 'मार्तण्ड' नामसे सम्यक् पूजन और जप करना चाहिये। गोमूत्रके प्राशनसे पवित्र मनुष्य धनवान् होकर कुबेरलोकको प्राप्त करता है। संसारके स्वामी अव्यय आत्मस्वरूप भगवान् सूर्यनारायणकी आराधना एवं अन्तकालमें भगवान् सूर्यका स्मरण करनेसे सूर्यलोकको प्राप्ति होती है। कार्तिक आदि चार महीनोंमें दूधका प्राशन करना चाहिये। इन महीनोंमें 'भास्कर' नामसे भगवान् सूर्यका पूजन तथा जप करना चाहिये। ऐसा करनेपर व्यक्ति भगवान् सूर्यके लोकको प्राप्त होता है। मासमें ब्राह्मणोंको यथाभिलषित दान देना चाहिये। चातुर्मासकी समाप्तिपर पुराण-वाचन कराना चाहिये और कीर्तनका आयोजन करना चाहिये। विद्वानोंको चाहिये कि कथावाचककी पूजा करके श्राद्धकर्म करें, क्योंकि सिद्ध मालपुआ आदि पकानोद्वारा कथावाचक या ब्राह्मणके सहयोगसे किया गया यथोचित श्राद्ध भगवान् सूर्यनारायणको अभीष्ट यह तिथि भीष्ट धर्म, अर्थ तथा काम इस त्रिवर्गको सदैव देनेवाली है। (अध्याय १०४)
Summary of chapter 177 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
The Brahmaṇḍa dāna — the gift of a golden model depicting all fourteen worlds with their inhabitants — is the most cosmologically ambitious of the six Mahādānas. The narrative that accompanies it is one of the Uttara Parva's most striking upākhyānas: King Sudyumna reached Brahmaloka through his accumulated merits but was unable to enter or enjoy it because he had never performed this dāna. Brahmā himself appeared, revealed the reason, and sent him back to perform the Brahmaṇḍa dāna. After its completion, Sudyumna returned to Brahmaloka permanently.