भविष्य महा पुराण

स्नान और तर्पण-विधि

भगवान् श्रीकृष्णने कहा-राजन्! स्नानके बिना न तो शरीर ही निर्मल होता है और न भावकी ही शुद्धि होती है, अतः शरीरकी शुद्धिके लिये सबसे पहले स्नान करनेका विधान है। घरमें रखे हुए अथवा तुरंतके निकाले हुए जलसे स्नान करना चाहिये। (किसी जलाशय या नदीका स्नान सुलभ हो तो और उत्तम है।) मन्त्रवेत्ता विद्वान् पुरुषको मूल मन्त्रके द्वारा तीर्थकी कल्पना कर लेनी चाहिये। 'ॐ नमो नारायणाय' यह मूल मन्त्र है। पहले हाथमें कुश लेकर विधिपूर्वक आचमन करे तथा नन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए बाहर-भीतरसे पवित्र रहे। फिर चार हाथका चौकोर मण्डल बनाकर उसमें निमाङ्किन मन्त्रोंद्वारा भगवती गङ्गाका आवाहन करेगड़े तुम भगवान् श्रीविष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई हो, श्रीविष्णु हो तुम्हारे देवता हैं, इसीलिये तुम्हें वाष्णवो कहते हैं। देवि! तुम जन्मसे लेकर मृत्युतक मेरे द्वारा किये गये समस्त पापोंसे मेरा त्राण करों। स्वर्ग, पृथ्वी और अंन्तरिक्षमें कुल साढ़े तीन करोड़ तीर्थ है, इसे वायुदेवताने (गिनकर) कहा है। माता जाहवि ! वे सब-के-सब तीर्थ तुम्हारे जलमें स्थित है। देवलोक में तुम्हारा नाग नन्दिनी और नलिनी है। इनके अतिरिक्त क्षमा, पृथ्वी आकाशगङ्गा, विश्वकाया, शिवा अग्रता विद्याधरा, सुप्रसन्ना, लोक-प्रसादिनी, क्षेम्या, जाह्नवी, शान्ता और शान्तिप्रदायिनी आदि भी तुम्हारे अनेकों नाम हैं।' जहाँ नामके समय इन पवित्र नामोंका कीर्तन होता है, वहाँ त्रिपथगामिनी भगवती गङ्गा उपस्थित हो जाती हैं।

सात बार उपर्युक्त नामोंका जप करके सम्पुटके आकारमें दोनों हाथोंको जोड़कर उनमें जल ले। तीन, चार, पाँच या सात बार उसे अपने मस्तकपर डाले, फिर विधिपूर्वक मृत्तिकाको अभिमन्त्रित कर अपने अगोंमें लगाये। अभिमन्त्रित करनेका मन्त्र इस प्रकार है-

अश्वक्रान्ते रथकान्ते विष्णुक्रान्ते बसुन्धरे।

मृत्तिके हर मे सर्वं यन्मया दुष्कृतं कृतम् ।।

उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना।

नमस्ते सर्वलोकानामसुधारिणि सुव्रते ॥

( उत्तरपर्व १२३ । १२ १३)

वसुन्धरे तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चला करते हैं। भगवान् श्रीविष्णुने भी वामनरूपसे तुम्हें एक पैरसे नापा था। मृत्तिके! मैंने जो बुरे कर्म किये हों, उन सबों को दूर कर दो। देवि! भगवान् श्रीविष्णुने सैकड़ों भुजाओंवाले वराहका रूप धारण करके तुम्हें जलसे बाहर निकाला था। तुग सम्पूर्ण लोकोंके समस्त प्राणियों में प्राण संचार करनेवाली हो। सुव्रते। तुम्हें मेरा नमस्कार है।'

१-माघ्र-स्रान माहात्म्यके नामसे विभिन्न पुराणों के कई स्वतन्त्र हैं। जिनका पारभुत अंश इस अध्यायमें उद्धृत है।

२-विष्णुपादनसूतासि विदयता ।

गरि उससस्तम्मादा जन्ममरणान्तिकात्।।

तिस्रः कोटयोऽर्धकोटी व तीनों वायुविधीन ।

दिवि भूम्यतारिख च तानि ले सन्ति जादवि ।।

नन्दिनीत्येव ते नाग देवेषु मालनीति च ।

सात युध्वी च जिना विभकाया शिवामृता ॥

विद्याधरा सुप्रन्ना तथा लोकप्रसादिनी।

श्रेम्या तथा जाह्ववी च शान्ता शान्तिप्रदायिनी

(उत्तरपर्व १२३४५-८)

इस प्रकार मृत्तिका लगाकर पुनः नान करे। फिर विधिवत् आचमन करके उठे और शुद्ध सफेद धोती एवं चद्दर धारण कर त्रिलोकीको तृप्स करनेके लिये तर्पण करे। सबसे पहले ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और प्रजापतिका तर्पण करे। तत्पश्चात् देवता, यक्ष, नाग, गन्धर्व, श्रेष्ठ अप्सराओं, क्रूर सर्प, गरुड पक्षी, वृक्ष, जम्भक आदि असुर, विद्याधर, मेघ, आकाशचारी जीव, निराधार जीव, पापी जीव तथा धर्मपरायण जीवोंको तृप्स करनेके लिये मैं जल देता हूँ'-यह कहकर उन सबको जलाञ्जलि दे। देवताओंका तर्पण करते समय यज्ञोपवीतको बायें कंधेपर डाले रहे, तत्पश्चात् उसे गलेमें मालाकी भाँति कर ले और मनुष्यों, ऋषियों तथा ऋषिपुत्रोंका भक्तिपूर्वक तर्पण करे । सनक, सनन्दन, सनातन, कपिल, आसुरि, चोदु और पञ्चशिखरे-ये सभी मेरे दिये जलसे सदा तृप्त हों।' ऐसी भावना करके जल दे। इसी प्रकार मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु, नारद तथा सम्पूर्ण देवर्षियों 'एवं ब्रह्मर्षियोका अक्षतसहित जलके द्वारा तर्पण करे। इसके बाद यज्ञोपवीतको दायें कंधेपर रखकर चायें घुटनेको गृथ्वीपर टेककर बैठे, फिर अग्निवार, बर्हिषद्, हविष्मान, ऊष्पाप, सुकाली, भौम, सोमप तथा आज्यप संज्ञक पितरोंका तिल और चन्दनयुक्त जलसे भक्तिपूर्वक तर्पण करे। इसी प्रकार हाथों में कुश लेकर पवित्र भावसे परलोकबासी पिता, पितामह आदि और मातामह आदिका नाम-गोरका उच्चारण करते हुए लर्पण करे। इस क्रमसे विधि और भक्तिके साथ सबका तर्पण करके निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे-

येऽबान्धवा बान्धवा बायेऽन्यजन्मनि बान्धवाः।

ते तृप्तिमखिला यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति॥

(उत्तरपर्व १२३ । २५)

जो लोग मेरे बान्धव न हों, जो मेरे बान्धव हों तथा जो दूसरे किसी जन्ममें मेरे बान्धव रहे हों, वे सब मेरे दिये हुए जलसे तृप्त हों। उनके सिवा और भी जो कोई प्राणी मुझसे जलकी अभिलाषा रखते हों, वे भी तृप्ति-लाभ करें।' (ऐसा कहकर उनके उद्देश्यसे जल गिराये।)

तत्पश्चात् विधिपूर्वक आचमन कर अपने आगे पुष्प और अक्षतोंसे कमलकी आकृति बनाये। फिर यत्नपूर्वक सूर्यदेवके नामोंका उच्चारण करते हुए अक्षत, पुष्प और रक्त चन्दनमिश्रित जलसे अर्घ्य दे। अर्घ्य-दानका मन्त्र इस प्रकार है-

नमस्ते विश्वरूपाय नमस्ते विष्णुसखाय वै॥

सहस्त्ररश्मये नित्यं नमस्ते सर्वतेजसे।

नमस्ते सर्ववपुषे नमस्ते सर्वशक्तये ।।

जगत्स्वामिन् नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित।

पद्मनाभ नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्गदधारिणे ।।

नमस्ते सर्वलोकेश सर्वासुरनमस्कृत ।

सुकृतं दुष्कृतं चैव सम्यग्जानासि सर्वदा।।

सत्यदेव नमस्तेऽस्तु सर्वदेव नमोऽस्तु ते।

दिवाकर नमस्तेऽस्तु प्रभाकर नमोऽस्तु ते ।।

(उत्तरपर्व १२३ । २७-३१)

'हे भगवान् सूर्य! आप विश्वरूप और भगवान् विष्णुके सखा हैं, इन दोनों रूपों में आपको नमस्कार है। आप सहस्रों किरणोंसे सुशोभित और सबके तेजारूप हैं, आपको सदा नमस्कार है। सर्वशक्तिमान्

-देव पक्षास्तथा साना ग-धवांसासा गणाः । तदा सर्मा: सुप तरबो जम्भकादयः ।

विद्याधरा जलधारास्ववक शामिनः । निराधाराः ये जावा; यापकर्मस्ताः

तेपामाप्यायनात दोगने सलिल प्रया।

(उत्तरप १२३ । १५-१७)

सनकः सनन्दनश्वैव तृतीयश्व सनातनः ।

कपिल शासुरि शैतर योहुः पशिखवाया ।।

सर्वे ने तिगायात महत्तेनाम्बुता सदा।

(उत्तरपर्व १२३ । १८-१२)

भगवन्! सर्वरूपधारी आप परमेश्वरको बार-बार नमस्कार है। दिव्य चन्दनसे भूषित और संसारके स्वामी भगवन्! आपको नमस्कार है। कुण्डल और अङ्गद आदि आभूषण धारण करनेवाले पद्मनाभ! आपको नमस्कार है। भगवन् ! आप सम्पूर्ण लोकोंके ईश और सभी देवोंके द्वारा वन्दित हैं, आपको मेरा प्रणाम है। आप सदा सब पाप-पुण्यको भलीभाँति जानते हैं। सत्यदेव! आपको नमस्कार है। सर्वदेव। आपको नमस्कार है। दिवाकर! आपको नमस्कार है। प्रभाकर! आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार सूर्यदेवको नमस्कार कर तीन बार प्रदक्षिणा करे। फिर द्विज, गौ तथा सुवर्णका स्पर्श कर अपने घर जाय और वहाँ भगवान् की प्रतिमाका पूजन करे। (अध्याय १२३)