भविष्य महा पुराण

कुमारषष्ठी-व्रतकी कथा

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-भरतसत्तम महाराज युधिष्ठिर! मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथि समस्त पापनाशिनी, धन-धान्य तथा शान्ति-प्रदायिनी एवं अतिकल्याणकारिणी है। उसी दिन कार्तिकेयने तारकासुरका वध किया था, इसलिये यह षष्ठी तिथि स्वामिकार्तिकेयको बहुत प्रिय है। इस दिन किया हुआ स्नान-दान आदि कर्म अक्षय होता है। दक्षिण देशमें स्थित कार्तिकेयका जो इस तिथिमें दर्शन करता है, वह नि:संदेह ब्रह्महत्यादि पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसलिये इस तिथिमें कुमारस्वामीको सोने, चाँदी अथवा मिट्टीकी मूर्ति बनवाकर पूजा करनी चाहिये। अपराहमें स्रान तथा आचमनकर, पद्मासन लगाकर बैठ जाय और स्वामी कुमारका एकाग्रचित्तसे ध्यान करे। इस दिन उपवासपूर्वक निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए इनके मस्तकपर कलशसे अभिषेक करे-

चन्द्रमण्डलभूतानां भवभूतिपवित्रिता।

गङ्गाकुमार धारेयं पतिता तव मस्तके॥

(उत्तरपर्व ४२।७)

इस प्रकार अभिषेक कर भगवान् सूर्यका पूजन करे, तदनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि उपचारोंद्वारा कृत्तिकापुत्र कार्तिकेयको निम्न मन्त्रसे पूजा करे-

देव सेनापते स्कन्द कार्तिकेय भवोद्भव।

कुमार गुह गाङ्गेय शक्तिहस्त नमोऽस्तु ते॥

(उत्तरपर्व ४२।९)

दक्षिण-देशोत्पन्न अन्न, फल और मलय चन्दन भी चढ़ाये। इसके बाद स्वामिकार्तिकेय के परमप्रिय छाग, कुफरकलापयुक्त मयूर तथा उनकी माता भगवती पार्वती इनका प्रत्यक्ष पूजन करे अथवा इनको सुवर्णको प्रतिमा बनाकर पूजन करे। पूजाके अगत्तर पूर्वोक्त देवसेनापति तथा स्कन्द आदि नाम-मन्त्रोंसे आण्ययुक्त तिलोंसे हवन करे, अनन्तर फल भक्षण कर भूमिपर कुशाकी शय्यापर शयन करे। क्रमशः बारह महीनोंमें नारियल, मातुलुंग (बिजौरा नींबू), नारंगी, पनस (कटहल), जम्बीर (एक प्रकारका नींबू), दाड़िम, द्राक्षा, आम्र, बिल्व, आमलक, ककड़ी तथा केला इन फलोंका भक्षण करे। ये फल उपलब्ध न हों तो उस कालमें उपलब्ध फलोंका सेवन करे। प्रात:काल सोनेके बने छाग अथवा कुकुटका 'सेनानी प्रीयताम्' ऐसा कहकर ब्राह्मणको दे। बारह महीनों में क्रमसे सेनानी, सम्भूत, क्रौञ्चारि, षण्मुख, गुह, गाङ्गेय, कार्तिकेय, स्वामी, बालग्रहाग्रणी, छागप्रिय, शक्तिधर तथा द्वार-इन नामोंसे कार्तिकेयका पूजन करे और नामोंके अन्तमें 'प्रीयताम्' यह पद योजित करे। यथा-'सेनानी प्रीयताम्' इत्यादि। इसके पश्चात् ब्राह्मर्णों को भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। वर्ष समाप्त होने पर कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठीको वस्त्र, आभूषण आदिसे कार्तिकयका पूजन एवं हवन करे और सब सामग्री ब्राह्मणको निवेदित कर दे।

इस विधिसे जो पुरुष अथवा स्त्री इस व्रतको करते हैं, वे उत्तम फलोको प्राप्त कर इन्द्रलोकमें निवास करते हैं, अत: राजन्! शंकरात्मज कार्तिकेयका सदा प्रयत्नपूर्वक पूजन करना चाहिये। राजाओंके लिये तो कार्तिकयको पूजाका विशेष महत्त्व है। जो राजा स्वामी कुमारका इस प्रकार पूजनकर युद्धके लिये जाता है, वह अवश्य ही विजय प्राप्त करता है। विधिपूर्वक पूजा करलेपर भगवान् कार्तिकेय पूर्ण प्रसन्न हो जाते है। जो  षष्ठीको नत्कव्रत करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर कार्तिकेय के लोकमें निवास करता है। दक्षिण दिशामें जाकर  जो भक्तिपूर्वक कार्तिकेयका दर्शन और पूजन करता है यह शिवलोकको प्राप्त करता है। जो सदा शरवणोद्भय आदिदेव कार्तिकेयकी आराधना करता है, वह बहुत कालतक स्वर्गका सुख भोगकर पृथ्वीपर जन्म ग्रहण करता तथा चक्रवर्ती राजाका सेनापति होता है। (अध्याय ४२)