युधिष्ठिसने कहा- भगवन्! आप सर्वज्ञ हैं, इसलिये आप यह बतलानेकी कृपा करें कि सम्पूर्ण कामनाओंकी अविचल सिद्धिके लिये शान्तिक एवं पौष्टिक काँका अनुष्ठान किस प्रकार करना चाहिये?
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन् ! लक्ष्मीकी कामनाबाले अथवा शान्तिके अभिलाषी तथा वृष्टि, दीर्घायु और पुष्टिकी इच्छासे युक्त मनुष्यको ग्रहयज्ञका समारम्भ करना चाहिये। मैं सम्पूर्ण शास्त्रोंका अवलोकन करनेके पश्चात् पुराणों एवं श्रुतियोंद्वारा आदिष्ट इस ग्रहशान्तिका संक्षिप्त वर्णन कर रहा इसके लिये ज्योतिधीद्वारा बतलाये गये शुभ मुहूर्तमें ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर ग्रहों एवं ग्रहाधिदेवोंकी स्थापना करके हवन प्रारम्भ करना चाहिये। पुराणों एवं श्रुतियों के ज्ञाता विद्वानोंने तीन प्रकारके ग्रहयज्ञ बतलाये हैं। पहला दस हजार आहुतियोंका अयुतहोम, उससे बढ़कर दूसरा एक लाख आहुतियोंका लक्षहोम तथा सम्पूर्ण कामनाओंका फल प्रदान करनेवाला तीसरा एक करोड़ आहुतियोंका कोटिहोम होता है। दस हजार आहुतियोंवाला ग्रहयज्ञ नवग्रहयज्ञ कहलाता है। इसकी विधि जो पुराणों एवं श्रुतियोंमें बतलायी गयी है, प्रथम मैं उसका वर्णन कर रहा हूँ। (यजमान मण्डपनिर्माणके बाद) हवनकुण्डको पूर्वोत्तर-दिशामें स्थापनाके लिये एक वेदीका निर्माण कराये, जो दो बीता लम्बी-चौड़ी, एक बीता ऊँची, दो परिधियोंसे सुशोभित और चौकोर हो। उसका मुख उत्तरको ओर हो। पुनः कुण्डमें अग्रिकी स्थापना करके उस वेदीपर देवताओंका आवाहन करे। इस प्रकार उसपर बत्तीस देवताओंकी स्थापना करनी चाहिये।
सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु- ये लोगों के हितकारी ग्रह कहे गये हैं। इन ग्रहों की प्रतिमा क्रमश: ताँबा, स्फटिक, रक्त चन्दन, स्वर्ण, चाँदी तथा लोडेसे बनानी चाहिये। श्वेत चावलोंद्वारा वेदीके मध्यमें सूर्यकी, दक्षिणमें मंगलकी, उत्तरमें बृहस्पतिकी, पूर्वोत्तरकोणपर बुधकी, पूर्व में शुक्रकी, दक्षिण-पूर्वकोणपर चन्द्रमाको, पश्चिममें शनिकी, पश्चिम-दक्षिणकोणपर राहुकी और पशिमोत्तरकोणापर केतुकी स्थापना करनी चाहिये। इन सभी ग्रहोंमें सूर्यके शिव, चन्द्रमाके पार्वती, मंगलके स्कन्द, बुधके भगवान् विष्णु, बृहस्पतिके ब्रह्मा, शुक्रके इन्द्र, शनै धरके यम, राहु के काल और केतुके चित्रगुत अधिदेवता माने गये हैं। अग्नि, जल, पृथ्वी, विष्णु, इन्द्र, सौवर्ण देवता, प्रजापति, सपं और ब्रह्मा-ये सभी क्रमशः
यो यादृशेन भावेन तिष्ठत्यस्यायुधिष्ठिर हर्षदैन्यादिरूपेण तस्य वर्ष प्रयाति हि ॥
रुदिते रोदिति सर्व कष्टो वर्षप्रहष्यति ।
भुक्तो भोला भवेत्वार्ष स्वस्थ: स्वस्थो भवेदिति ॥
(उत्तरपर्व १४० १६८-६९)
२-यह पाँच आथर्षण कल्पों-नक्षत्र, बैतान, संहिताविधि, अङ्गिरस एवं शान्तिकल्पमसे प्रथम एवं पांचवें शान्तिकल्पका समन्वित रूप है और अपर्वपरिशिष्ट, यावल्क्यस्मृत्ति १ । २९५-३०८, वृद्धपाराशर ११ प्राप्मुरान, सृष्टिसम्ह८२-८६, नारदपुराण १ ॥५१. मत्स्यपुराण, मणिपुराण २६४-२७४ आदिमें भी प्राप्त है।
प्रत्यधिदेवता हैं। इनके अतिरिक्त विनायक, दुर्गा, वायु, आकाश, सावित्री, लक्ष्मी तथा उमाको उनके पतिदेवताओंके साथ और अश्विनीकुमारोंका भी व्याहृतियोंके उच्चारणपूर्वक आवाहन करना चाहिये। उस समय मंगलसहित सूर्यको लाल वर्णका, चन्द्रमा और शुक्रको श्वेत वर्णका, बुध और बृहस्पतिको पीत वर्णका, शनि और राहुको कृष्ण वर्णका तथा केतुको धूम्र वर्णका जानना और ध्यान करना चाहिये। बुद्धिमान् यज्ञकर्ता जो ग्रह जिस रंगका हो, उसे उसी रंगका वस्त्र और फूल समर्पित करे, सुगन्धित धूप दे। पुनः फल, पुष्प आदिके साथ सूर्यको गुड़ और चावलर्से बने हुए अत्र (खीर)- का, चन्द्रमाको घी और दूधसे बने हुए पदार्थका, मंगलको गोझियाका, बुधको क्षीरषष्टिक (दूधमें पके हुए साठीके चावल) का, बृहस्पतिको दही- भातका, शुक्रको घी-भातका, शनैश्चरको खिचड़ीका, राहुको अजशृंगी नामक लताके फलके गूदाका और केतुको विचित्र रंगवाले भातका नैवेद्य अर्पण करके सभी प्रकारके भक्ष्य पदार्थोद्वारा पूजन करे वेदीके पूर्वोत्तरकोणपर एक छिद्ररहित कलशको स्थापना करे, उसे दही और अक्षतसे सुशोभित, आम्रके पल्लवसे आच्छादित और दो वस्त्रोंसे परिवेष्टित करके उसके निकट फल रख दे। उसमें पञ्चरत्र डाल दे और उसे पराभङ्ग (पीपल, बरगद, पाकड़, गूलर और आमके पल्लव)-से युक्त कर दे। उसपर वरुण, गङ्गा आदि नदियों, सभी समुद्रों और सरोवरोंका आवाहन तथा स्थापन करे। राजेन्द्र ! धर्मज्ञ पुरोहितको चाहिये कि वह हाथीसार, घुशाल, चौराहे, बिमवर, नदोके संगम, कुण्ड और गोशालाको मिट्ठी लाकर उसे सौषधिमिश्रित जलसे अधिषिक्त कर यजमान खान के लिये वहाँ प्रस्तुत कर दे (था यजमानो पापको गध करनेवाले सभी समुद्र नदी, नद बादल और सरोवर यहाँ पधारे ऐसा कहकर इन देवताओंका आवाहन करे। तत्पश्चात् घी, जौ, चावल, तिल आदिसे हवन प्रारम्भ करे। मदार, पलाश, खैर, चिचड़ा, पीपल, गूलर, शमी, दूब और कुश-ये क्रमश: नवों ग्रहोंकी समिधाएँ हैं। इनमें प्रत्येक ग्रहके लिये मधु, घी और दही अथवा पायससे युक्त एक सौ आठ या अट्ठाईस आहुतियाँ प्रदान करनी चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको सदा सभी कौमें अंगूठेके सिरेसे तर्जनीके सिरेतककी मापवाली तथा बर्रोह, शाखा और पत्तोंसे रहित समिधाओंकी कल्पना करनी चाहिये। परमार्थवेत्ता यजमान सभी देवताओंके लिये उन-उनके पृथक्- पृथक् मन्त्रोंका मन्द स्वरसे उच्चारण करते हुए समिधाओंका हवन करे। अनन्तर प्रत्येक देवताके लिये उसके मन्त्रद्वारा हवन करना चाहिये। ब्राह्मणको 'आ कृष्णेन रजसा०' (यजु० ३३ । ४३) इस मन्त्रका उच्चारण कर सूर्यको आहुति देनी चाहिये। पुनः 'इमं देवा०' (यजु० ९। ४०) इस मन्त्रसे चन्द्रमाको आहुति दे। मंगलके लिये 'अग्निर्मूर्धा० (यजु० १३। १४) इस मन्त्रसे आहुति दे। बुधके लिये 'उबुध्यस्व०' (यजु० १५ । ५४) और देवगुरु बृहस्पतिके लिये 'बृहस्पते अति०' (यजु० २६ । ३) ये मन्त्र माने गये हैं। शुक्रके लिये 'अन्नात्परि०' (यजु० १९ । ७५) और शनैश्चरके लिये 'शं नो देवीरभिष्टय०' (यजु० ३६ । १२) इस मन्त्रसे आहुति दे। राहुके लिये 'कया नश्चित्र०' (यजु० २७ । ३९) यह मन्त्र कहा गया है तथा केतुकी शान्तिके लिये केतु कृण्वन्०' (यजु० २९ । ३७) इस मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये । चरु आदि हवनीय पदार्थोंमें घी मिलाकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये, तत्पश्चात् व्याहृतियोंका उच्चारण करके घीकी दस आहुतियाँ अग्रिमें डाले। पुनः श्रेष्ठ ब्राह्मण उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर प्रत्येक देवताके मन्त्रोच्चारणपूर्वक चरु आदि पदार्थोका हवन करे।
फिर 'आ वो राजानमध्वरस्य रुद्र०' (ऋo ४।३।१, कृष्णयजु० तै० सं० १।३।१४।१) इस मन्त्रका उच्चारण कर रुद्रके लिये हवन और बलि देनी चाहिये। तत्पश्चात् उमाके लिये 'आपो हि ष्ठा०' (वाजस० सं० ११५०) इस मन्त्रसे, स्वामिकार्तिकेयके लिये 'स्यो ना०' इस मन्त्रसे, विष्णुके लिये 'इदं विष्णुर्वि०' (यजु० ५। १५) इस मन्त्रसे, ब्रह्माके लिये 'तमीशानम्' (वाजस० २५ । १८) इस मन्त्रसे और इन्द्रके लिये 'इन्द्रमिहेवताय०' इस मन्त्रसे आहुति डाले। इसी प्रकार यमके लिये 'आर्य गौ:०' (यजु० ३।६) इस मन्त्रसे हवन बतलाया गया है। कालके लिये 'ब्रह्मजज्ञानम्' (यजु० १३ । ३) यह मन्त्र प्रशस्त माना गया है। अग्निके लिये 'अगिं दूतं वृणीमहे० (ऋक्सं० १ । १२ । १) यह मन्त्र बतलाया गया है। वरुणके लिये उदुत्तमं वरुणपाशम्०' (ऋक्सं० १। २४। १५) यह मन्त्र कहा गया है। वेदों में पृथ्वीके लिये 'पृथिव्यन्तरिक्षम्०' इस मन्त्रका पाठ है। विष्णुके लिये 'सहस्त्रशीर्षा पुरुष:०' (वाजसं० सं० ३१ । १) यह मन्त्र कहा गया है। हवन समाप्त हो जानेपर चार ब्राह्मण अभिषेक मन्त्रोंद्वारा उसी जलपूर्ण कलशसे पूर्व अथवा उत्तर मुख करके बैठे हुए यजमानका अभिषेक करें और ऐसा कहें-'ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ये देवता आपका अभिषेक करें। जगदीश्वर वसुदेव- नन्दन श्रीकृष्ण, सामर्थ्यशाली संकर्षण (बलराम), प्रद्युम और अनिरुद्ध-ये सभी आपको विजय प्रदान करें। इन्द्र, अगि, ऐश्वर्यशालो यम, निति, वरुण, पवन, कुबेर, ब्रह्मासहित शिव, शेषनाग और दिक्पालगण-ये सभी आपकी रक्षा करें। कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, बझा, क्रिया, मति, बुद्धि, लज्जा, शान्ति, पुष्टिः कान्ति तथा तुष्टि-ये, सभी माताएँ जो धर्मको पन्नियाँ है आकर आपको अभिषिक्त करें। सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु और केतु-ये सभी ग्रह प्रसन्नतापूर्वक आपको अभिषिक्त करें। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, ऋषि, गौ, देवमाताएँ, देवपत्नियाँ, वृक्ष, नाग, दैत्य, अप्सराओंके समूह, अस्त्र, सभी शस्त्र, नृपगण, वाहन, औषध, रत्न, (कला, काष्ठा आदि) कालके अवयव, नदियाँ, सागर, पर्वत, तीर्थस्थान, बादल तथा नद-ये सभी सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धिके लिये आपको अभिषिक्त करें।'
इस प्रकार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा सर्वौषधि एवं सम्पूर्ण सुगन्धित पदार्थोंसे युक्त जलसे स्नान करा दिये जानेके पश्चात् सपत्नीक यजमान श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दनका अनुलेप करे और विस्मयरहित होकर शान्त चित्तवाले ऋत्विजोंका प्रयत्नपूर्वक दक्षिणा आदि देकर पूजन करे तथा सूर्यके लिये कपिला गौका, चन्द्रमाके लिये शङ्खका, मंगलके लिये भार वहन करने में समर्थ एवं ऊँचे डीलवाले लाल रंगके बैलका, बुधके लिये सुवर्णका, बृहस्पतिके लिये एक जोड़ा पीले वस्त्रका, शुक्रके लिये श्वेत रंगके घोड़ेका, शनैश्चरके लिये काली गौका, राहुके लिये लोहे की बनी हुई वस्तुका और केतुके लिये उत्तम बकरेके दानका विधान है। यजमानको ये सारों दक्षिणाएँ सुवर्णक साथ अथवा स्वर्णनिर्मित मूर्तिक रूप देनी चाहिये या जिस प्रकार गुरु (पुरोहित) प्रसन्न हों, उनके आज्ञानुसार सभी ब्राह्मणोंको सुवर्णसे अलंकृत गौएँ अथवा केवल सुवर्ण दान करना चाहिये। पर सर्वत्र मन्त्रोच्चारणपूर्वक ही इन सभी दक्षिणाओंके देनेका विधान है।
दान देते समय सभी देय वस्तुओंसे पृथक्-पृथक इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये-'कपिले। तुम रोहिणीरूप हो, तीर्थ एवं देवता तुम्हारे स्वरूप हैं तथा तुम सम्पूर्ण देवोंकी पूजनीया हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। शङ्ख! तुम पुण्योंके भी पुण्य और मङ्गलोंके भी मङ्गल हो। भगवान् विष्णुने तुम्हें अपने हाथमें धारण किया है, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। जगत्को आनन्दित करनेवाले वृषभ! तुम वृषरूपसे धर्म और अष्टमूर्ति शिवजीके वाहन हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। सुवर्ण! तुम ब्रह्माके आत्मस्वरूप, अग्निके स्वर्णमय बीज और अनन्त पुण्यके प्रदाता हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। दो पीले वस्त्र अर्थात् पीताम्बर भगवान् श्रीकृष्णको परम प्रिय हैं, इसलिये विष्णो ! उसको दान करनेसे आप मुझे शान्ति प्रदान करें। अश्व! तुम अश्वरूपसे विष्णु हो, अमृतसे उत्पन्न हुए हो तथा सूर्य एवं चन्द्रमाके नित्य वाहन हो, अत: मुझे शान्ति प्रदान करो। पृथ्वी ! तुम समस्त धेनुस्वरूपा, कृष्ण (गोविन्द) नामबालो और सदा सम्पूर्ण पापोंको हरण करनेवालो हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। लौह ! चूँकि विश्वके सभी सम्पादित होनेवाले लौह-कर्म हल एवं अस्त्र आदि सारे कार्य संदा तुम्हारे ही अधीन हैं, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। छाग! चूँकि तुम सम्पूर्ण यज्ञों के मुख्य अङ्गरूपसे निर्धारित हो और अग्रिदेवके नित्य वाहन हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। गौ! चूंकि गौओंके अङ्गोंमें चौदहों भवन निवास करते हैं, इसलिये तुम मेरे लिये इहलोक एवं परलोकमें भी कल्याण प्रदान करो। जिस प्रकार भगवान् केशव तथा शिवकी शय्या कभी शून्य नहीं रहती, बल्कि लक्ष्मी तथा पार्वतीसे सदा सुशोभित रहती है, वैसे ही मेरे द्वारा भी दान की गयी शम्या जन्म-जन्ममें सुखसे सापच रहे। जैसे सभी रोमें समस्त देवता निवास करो। वैसे ही रलदान करनेसे वे देवता मुझे शान्ति प्रदान करें। सभी दान भूमिदानको सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते, अत: भूमि- दान करनेसे मुझे इस लोकमें शान्ति प्राप्त हो।' इस प्रकार कृपणता छोड़कर भक्तिपूर्वक रत्न, सुवर्ण, वस्त्रसमूह, धूप, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे ग्रहोंकी पूजा करनी चाहिये।
राजन् ! अब आप भक्तिपूर्वक ग्रहोंके स्वरूपोंको सुनें-(चित्र-प्रतिमादि विधानोंमें) सूर्यदेवकी दो भुजाएँ निर्दिष्ट हैं, वे कमलके आसनपर विराजमान रहते हैं, उनके दोनों हाथों में कमल सुशोभित रहते हैं। उनकी कान्ति कमलके भीतरी भागकी-सी है और वे सात घोड़ों तथा सात रस्सिोंसे जुते रथपर आरूढ रहते हैं। चन्द्रमा गौर वर्ण, श्वेत वस्त्र और श्वेत अश्वयुक्त हैं तथा उनके आभूषण भी श्वेत वर्णके हैं। धरणीनन्दन मंगलकी चार भुजाएँ हैं। वे अपने चारों हाथोंमें खड्ग, ढाल, गदा तथा वरदमुद्रा धारण किये हैं, उनके शरीरकी कान्ति कनेरके पुष्प-सरीखी है। वे लाल रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं। बुध पीले रंगकी पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं। पीत चन्दनसे अनुलिप्त हैं। वे दिव्य सोनेके रथपर विराजमान हैं। देवताओं और दैत्योंके गुरु बृहस्पति और शुक्रकी प्रतिमाएँ क्रमशः पीत और श्वेत वर्णकी होनी चाहिये। उनके चार भुजाएँ हैं, जिनमें वे दण्ड, रुद्राक्षकी माला, कमण्डलु और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं। शनैश्चरकी शरीर-कान्ति इन्द्रनीलमणिकी-सी है। वे गीधपर सवार होते हैं और हाथमें धनुष-बाण, त्रिशूल और वरमुद्रा धारण किये रहते हैं। राहुका मुख सिंहके समान भयंकर है। उनके हाथों में तलवार, कवच, त्रिशूल और वरमुद्रा शोभा पाती है तथा वे नीले रंगके सिंहासनपर आसीन होते हैं। ध्यान (प्रतिमा) में ऐसे ही राहु प्रशस्त माने गये हैं। केतु बहुतेरे हैं। उन सबकी दो भुजाएँ हैं। उनके शरीर आदि धूम्र वर्णके हैं।
उनके मुख विकृत हैं। वे दोनों हाथों में गदा एवं वरमुद्रा धारण किये हैं और नित्य गीधपर समासीन रहते हैं। इन सभी लोक-हितकारी ग्रहोंको किरीटसे सुशोभित कर देना चाहिये तथा इन सबकी ऊंचाई अपने हाथके प्रमाणसे एक सौ आठ अङ्गुल (साढ़े चार हाथ)-की होनी चाहिये।
हे पाण्डुनन्दन! यह मैंने आपको नवग्रहोंका स्वरूप बतलाया है। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि ऐसी प्रतिमा बनाकर इनकी पूजा करे। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे ग्रहोंकी पूजा करता है, वह इस लोकमें सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है तथा अन्तमें स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। यदि किसी निर्धन मनुष्यको कोई ग्रह नित्य पीडा पहुँचा रहा हो तो उस बुद्धिमान्को चाहिये कि उस ग्रहकी यत्नपूर्वक भलीभाँति पूजा करके तत्पश्चात् शेष ग्रहोंकी भी अर्चना करे, क्योंकि ग्रह, गौ, राजा और ब्राह्मण-ये विशेषरूपसे पूजित होनेपर रक्षा करते हैं, अन्यथा अवहेलना किये जानेपर जलाकर भस्म कर देते हैं। इसलिये वैभवको अभिलाषा रखनेवाले मनुष्यको दक्षिणासे रहित यज्ञ नहीं करना चाहिये, क्योंकि भरपूर-दक्षिणा देनेसे (यज्ञका प्रधान) देवता भी संतुष्ट हो जाता है। नवग्रहोंके यज्ञमें यह दस हजार आहुतियोंवाला हवन ही होता है। इसी प्रकार विवाह, उत्सव, यज्ञ, देवप्रतिष्ठा आदि कर्मोंमें तथा चित्तकी उद्विग्रता एवं आकस्मिक विपत्तियोंमें भी यह दस हजार आहुतियोंवाला हवन ही बतलाया गया है। इसके बाद अब मैं एक लाख आहुतियोंवाले सजको विधि बतला रहा है, सुनिये।
विद्वानों ने सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्धिके लिये लक्षहोमका विधान किया है, क्योंकि यह पितरों को परम प्रिय और साक्षात् भोग एवं मोक्षरूपी फलका प्रदाता है। बुद्धिमान् यजमानको चाहिये कि ग्रहबल और ताराबलको अपने अनुकूल पाकर ब्राह्मणद्वारा स्वस्तिवाचन कराये और अपने गृहके पूर्वोत्तर दिशामें अथवा शिवमन्दिरकी समीपवर्ती भूमिपर विधानपूर्वक एक मण्डपका निर्माण कराये, जो दस हाथ अथवा आठ हाथ लम्बा-चौड़ा चौकोर हो तथा उसका मुख (प्रवेशद्वार) उत्तर दिशाकी ओर हो। उसकी भूमिको यत्नपूर्वक पूर्वोत्तर दिशाकी ओर ढालू बना देना चाहिये।
तदनन्तर मण्डपके पूर्वोत्तर भागमें यथार्थ लक्षणोंसे युक्त एक सुन्दर कुण्ड' तैयार कराये। परिमाणसे कम अथवा अधिक परिमाणमें बना हुआ कुण्ड अनेकों प्रकारका भय देनेवाला हो जाता है, इसलिये शान्तिकुण्डको परिमाणके अनुकूल ही बनाना चाहिये । ब्रह्माने लक्षहोमको अयुतहोमसे दसगुना अधिक फलदायक बतलाया है, इसलिये इसे प्रयलपूर्वक आहुतियों और दक्षिणाओंद्वारा सम्पादित करना चाहिये। लक्षहोममें कुण्ड चार हाथ लम्बा और दो हाथ चौड़ा होता है, उसके भी मुखस्थानपर योनि बनी होती है और वह तीन मेखलाओंसे युक्त होता है। देवताओंकी स्थापनाके लिये एक वेदीका भी विधान बतलाया है, जो तीन परिधियोंसे युक्त हो। इनमें पहली परिधि दो अङ्गुल ऊँची शेष दो एक-एक अङ्गुल ऊँची होनी चाहिये। विद्वानों ने इन सबकी चौड़ाई दो अङ्गुलको बतलायी है। वेदीके ऊपर दस में अङ्गुल ऊँची एक दीवाल बनायी जाय, उसीपर पहलेकी ही भाँति फूल और अक्षतोंसे देवताओंका आवाहन किया जाय। राजेन्द्र ! अधिदेवताओं एवं ये प्रत्यधिदेवताओंसहित सभी ग्रहोंको सूर्यके सम्मुख नही स्थापित करना चाहिये, उत्तराभिमुख अथवा पराङ्मुख नहीं। लक्ष्मीकामी मनुष्यको इस यज्ञमें
*कल्याण अग्रिपुराणङ्क अ0 24 की टिप्पणीमें कुण्ड-मण्डप-निर्माणकी पूरी विधि द्रष्टव्य है।
(सभी देवताओंके अतिरिक्त) गरुडकी भी पूजा करनी चाहिये। (उस समय ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये-) 'गरुड! तुम्हारे शरीरसे सामवेदकी ध्वनि निकलती रहती है, तुम भगवान् विष्णुके वाहन और नित्य विषरूप पापको हरनेवाले हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।'
तत्पश्चात् पहलेकी तरह कलशकी स्थापना करके हवन आरम्भ करे। एक लाख आहुतियोंसे हवन करनेके पश्चात् पुनः समिधाओंकी संख्याके बराबर और अधिक आहुतियाँ डाले। फिर अग्निके ऊपर घृतकुम्भसे वसोर्धारा गिराये।
(वसोर्धाराकी विधि यह है-) भुजा-बराबर लम्बी गूलरकी लकड़ीसे, जो खोखली न हो तथा सीधी एवं गीली हो, खुवा बनवाकर उसे दो खाभोंपर रखकर उसके द्वारा अग्निके ऊपर सम्यक् प्रकारसे घीकी धारा गिराये। उस समय अग्निसूक्त (ऋ० सं० १।१), विष्णुसूक्त (बाजसं० ५।१- २२), रुद्रसूक्त ( वही १६) और इन्दु (सोम)- सूक्त (ऋक्०१।११) पाठ करना चाहिये तथा पहावैश्वानर साम और ज्येष्ठ सामका गान करना चाहिये। तदुपरान्त पूर्ववत् यजमान स्नान कर स्वस्तिवाचन कराये तथा काम क्रोधरहित होकर शान्तचित्तसे पूर्ववत् ऋत्विजोंको पृथक्-पृथक् दक्षिणा प्रदान करे। नवग्नहयज्ञके अयुतहोममें चार वेदवेत्ता ब्राह्मणों को अथवा श्रुतिके जानकार एवं शान्त स्वभाववाले दो ही ऋत्विजोंको नियुक्त करना चाहिये। विस्तारमें नहीं फँसना चाहिये।
इसी प्रकार लक्षहोममें अपनी सामर्थ्यके अनुकूल मत्सररहित होकर दस, आठ अथवा चार ऋत्विजों को नियुक्त करना चाहिये। पाण्डवश्रेष्ठ ! सम्पत्तिशाली यजमानको यथाशक्ति भक्ष्य पदार्थ, आभूषण, वस्त्रोंसहित शय्या, स्वर्णनिर्मित कड़े, कुण्डल और अंगूठी आदि सभी वस्तुएँ लक्षहोममें नवग्रह-यज्ञसे दसगुनी अधिक देनी चाहिये। मनुष्यको कृपणतावश दक्षिणारहित यज्ञ नहीं करना चाहिये। जो लोभ अथवा अज्ञानसे भरपूर दक्षिणा नहीं देता, उसका कुल नष्ट हो जाता है। समृद्धिकामी मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार अन्नका दान करना चाहिये, क्योंकि अन्न- दानरहित किया हुआ यज्ञ दुर्भिक्षरूप फलका दाता हो जाता है। अन्नहीन यज्ञ राष्ट्रको, मन्त्रहीन यज्ञ ऋत्विको और दक्षिणारहित यज्ञ यज्ञकर्ताको जलाकर नष्ट कर देता है । इस प्रकार (विधिहीन) यज्ञके समान अन्य कोई शत्रु नहीं है। अल्प धनवाले मनुष्यको कभी लक्षहोम नहीं करना चाहिये, क्योंकि यज्ञमें (दक्षिणा आदिके लिये) प्रकट हुआ विग्रह सदाके लिये कष्टकारक हो जाता है। स्वल्य सम्पत्तिवाला मनुष्य केवल पुरोहितकी अथवा दो या तीन ब्राह्मणोंकी भक्तिके साथ विधिपूर्वक पूजा करे अथवा एक ही वेदज्ञ ब्राह्मणकी भक्तिके साथ दक्षिणा आदिसे प्रयत्नपूर्वक अर्चना करे, बहुतोंके चक्करमें न पड़े। अधिक सम्पत्ति होनेपर लक्षहोम करना चाहिये, क्योंकि यह अधिक लाभदायक है। इसका विधिपूर्वक अनुष्ठान करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। वह आठ सौ कल्पोंतक शिवलोकमें वसुगण, आदित्यगण और मरुद्गणोंद्वारा पूजित होता है तथा अन्त में मोक्षको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य किसी विशेष कामनासे इस लक्षहोमको विधिपूर्वक सम्पन्न करता है, उसे उस कामनाको प्राप्ति तो हो ही जाती है, साथ ही वह अविनाशी पदको भी प्राप्त कर लेता है। इसका अनुष्ठान करनेसे पुत्रार्थीको पुत्रकी प्राप्ति होती है, धनार्थी धन लाभ करता है, भार्यार्थी सुन्दर पत्नी, कुमारी कन्या सुन्दर पत्ति, राज्यसे भ्रष्ट हुआ राजा राज्य और लग्मीका अभिलाषी लक्ष्मी प्राप्त करता है।
इस प्रकार मनुष्य जिस वस्तुकी अभिलाषा करता है, उसे वह प्रचुर मात्रामें प्राप्त हो जाती है। जो निष्कामभावसे इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। (अध्याय १४५)