महाराज युधिष्ठिमने कहा-भगवन्! मैंने आपकी कृपासे सभी दान-विधियाँ सुनीं। इस समय आप नक्षत्रों में देय दानोंका वर्णन कीजिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! किसी समय देवर्षि नारद द्वारका आये। उनसे मेरी माता देवकीने नक्षत्रदान-विधि पूछी। उस समय नारदजीने जो उन्हें बतलाया, मैं वही कह रहा हूँ। इससे सब पातक दूर हो जाते हैं।
महाभाग ! कृत्तिका नक्षत्र में घी और खीरसे युक्त भोजन देकर साधुजनों और ब्राह्मणोंको संतुष्ट करनेसे उत्तम लोककी प्राति होती है। रोहिणी नक्षत्रमें धृतमिश्रित अन्नका ब्राह्मणों तथा साधु-संतोंको भोजन करानेसे श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति होती है। मृगशिरा नक्षत्र में ब्राह्मणोंको दूधका दान करनेसे किसी प्रकारका ऋण नहीं रहता और सवत्सा पयस्विनी गौ ब्राह्मणको दान करनेवाला विमानमें बैठकर स्वर्गलोकमें जाता है। आर्द्रा नक्षत्र में तिलमिश्रित कृशर (खिचड़ी) को दान करनेसे मनुष्य सभी प्रकारके संकटोंसे मुक्त हो जाता है। पुनर्वसु नक्षत्र में घृतपक्व अपूप (मालपूआ) ब्राह्मणको देनेवाला उत्तम कुलमें जन्म लेकर यश, धन और रूप प्राप्त करता है। पुष्य नक्षत्र में सुवर्णका दान करनेसे दाता पापरहित होकर इस लोक तथा परलोकमें चन्द्रमाकी तरह सुशोभित होता है। आश्लेषा नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको चाँदीका दान करे तो निर्भय और शासको जानने वाला विहान् होता है। मघा नक्षत्रमें तिलसे भरे हुए घड़ोंका दान करनेसे पुत्र, पशु तथा धनकी प्राप्ति होती है। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें ब्राह्मणको घोड़ीका दान देनेसे पुण्यलोकमें निवास मिलता है। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें सुवर्ण- कमल देनेसे सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं और सूर्यलोककी प्राप्ति होती है।
हस्त नक्षत्रमें सुवर्णका हाथी बनाकर ब्राह्मणको दान देनेसे दिव्य हस्तीपर आरूढ होकर इन्द्रलोकमें जानेका सौभाग्य प्रास होता है। चित्रा नक्षत्रमें वृषभका दान करनेसे उत्तम पुण्य प्रास होता है और अप्सराओंके नन्दनवनमें विहार करनेका अवसर प्राप्त होता है। स्वाती नक्षत्र में जो पदार्थ स्वयंका प्रिय हों, उनका दान करनेसे बहुत यश मिलता है और अन्त में सदति मिलती है। विशाखा नक्षत्रों धान्य एवं वस्त्रसहित सुदृढ़ बैलगाड़ीका दान करनेसे पितृगणोंको प्रसन्नता होती है, संसारमें कोई कर नहीं होता और दान देनेवाला. सभी प्रकारके पापोंसे छूटकर उत्तम गति प्राप्त करता है। अनुराधा नक्षत्रमें यथाशक्ति कम्बल और ओढ़ने तथा पहिननेवाले उत्तरीय वस्त्र आदि ब्राह्मणको दान देनेसे दिव्य सौ वर्षसे भी अधिक समयतक स्वर्ग देवताओं के समीप निवास करनेका अवसर प्राप होता है।
ज्येष्ठा नक्षत्रगें विविध प्रकारके कालशाक (करे) तथा मूली आदि शाक ब्राहाणों को देनेसे अभीष्ट गति प्राप्त होती है। मूल नक्षत्रमें ब्राह्मणों को
कन्द, मूल, फल आदि देनेसे पितर संतुष्ट हो जाते हैं और उसे उत्तम गति मिलती है। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें कुलीन और वेदवेचा ब्राह्मणको दधिपात्र देनेसे पुत्र, पौत्र, धन, धान्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है तथा उत्तम कुलमें जन्म होता है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्रमें उदमंथ (जौकी माडी), घी, मधु और फाणित (राब) ब्राह्मणको देनेसे सभी कामनाओंकी प्राप्ति होती है। अभिजित् नक्षत्रमें घी, मधु तथा दुग्ध देनेसे स्वर्गमें निवास होता है।
श्रवण नक्षत्रमें पुस्तक-दान करनेसे विमानमें बैठकर इच्छानुसार सभी लोकोंमें विचरण करनेका अवसर प्राप्त होता है। धनिष्ठिा नक्षत्र में दो गार्योंका दान करनेसे अनेक जन्मोंतक सुखकी प्राप्ति होती है। शतभिषा नक्षत्रमें अगरु और चन्दनका जो व्यक्ति दान करता है वह सुन्दर अप्सराओंके लोकमें जाता है। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में राजमाष (बड़े उड़द)-का दान देनेसे सभी प्रकारके भक्ष्य भोज्य प्राप्त होते हैं और जन्मान्तरमें सुखकी प्राप्ति होती है। उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में सुन्दर वस्त्रोंका दान करनेसे पितर संतुष्ट होते हैं और उसे सदति प्राप्त होती है।
रेवती नक्षत्रमें कांस्यके दोहन-पात्रसहित ब्राह्मणको गोदान करनेसे सभी मनोरयोंकी सिद्धि होती है और जन्मान्तरमें सद्गति प्राप्त होती है। अश्विनी नक्षत्रमें उत्तम अश्वोंसे युक्त रथ ब्राह्मणको दान देनेसे राजवैभव-सम्पन्न कुटुम्बमें जन्म होता है और इस दानको करनेवाला व्यक्ति तेजस्वी होता है। भरणी नक्षत्रमें ब्राह्मणको तिलधेनुका दान करनेसे उसे उत्तम गौएँ तथा यश और सदतिकी प्राप्ति होती है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! नारदजीने इस नक्षत्रकल्पको माता देवकीसे कहा था। यह नक्षत्र-दानकी विधि मैंने आपको सुनायी। इस दानके करनेसे सभी तरहके पाप दूर हो जाते हैं और सभी उपद्रव शान्त हो जाते हैं। इस दान में किसी समय, दिन और कालक्का कोई विशेष नियम नहीं है, बल्कि इसमें श्रद्धा और विश्वास ही मुख्य है। (अध्याय १९२)