भविष्य महा पुराण

माता, पिता एवं गुरुकी महिमा

श्रीसूतजी बोले-द्विज श्रेष्ठ। चारों वर्गों के लिये पिता ही सबसे बड़ा अपना सहायक है पिता के समान अन्य कोई अपना बन्धु नहीं है, ऐसा वेदोक कथन है। माता-पिता और गुरु-ये तीनों पचपदर्शकोपर इनमें माता हो सर्वोपरि भाइयोंमें जो क्रमशः बड़े हैं वे क्रम-क्रमसे  ही विशेष आदरके पात्र हैं। इन्हें द्वादशो, अमावास्या तथा संक्रान्तिके दिन यथारुचि मणियुक्त वस्त्र दक्षिणाके रूपमें देना चाहिये, दक्षिणायन और उत्तरायण, लिपुत्र संक्रान्ति तथा पर सूर्य ग्रहणके समय यथाशक्ति इन्हे भोजन कराना चाहिये, अनन्तर इन मन्त्रास इतका बरण बन्दना करनी चाहिये।

*स्वर्गापवर्गप्रदमेकमा ब्रह्मस्वरूप पितां नमामि ।

यतो जगत् पश्यति चाहरूपं तं तर्पयामः सलिलैतिलैयुः ।।

पितरो जनयन्तीह पितरः पालयन्ति च ।

पितरो ब्रहारूपा हि तेभ्यो नित्यं नमो नमः॥

यस्माद्विजयते लोकप्तस्मादमः अवर्तते ।

नमस्तुभ्यं चितः साक्षाद्ब्रह्मरूप नमोऽस्तु ते॥

क्योंकि विधिपूर्वक बन्दन करनेसे ही सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। स्वर्ग और अपवर्ग-रूपी फलको प्रदान करनेवाले एक आद्य ब्रह्मस्वरूप पिताको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनकी प्रसन्नतासे संसार सुन्दररूपमें दिखायी देता है, उन पिताका मैं तिलयुक्त जलसे तर्पण करता हूँ। पिता ही जन्म देता है, पिता ही पालन करता है, पितृगण ब्रह्मस्वरूप हैं, उन्हें नित्य पुनः-पुन: नमस्कार हैं। हे पितः आपके अनुग्रहसे लोकधर्म प्रवर्तित होता है, आप साक्षात् ब्रह्मरूप हैं, आपको नमस्कार है।

जो अपने उदररूपी विवरमें रखकर स्वयं उसकी सभी प्रकारसे रक्षा करती है, उस परा प्रकृतिस्वरूपा जननीदेवीको नमस्कार है । मातः! आपने बड़े कष्टसे मुझे अपने उदर-प्रदेशमें धारण किया, आपके अनुग्रहसे मुझे यह संसार देखनेको मिला, आपको बार-बार नमस्कार है। पृथिवीपर जितने तीर्थ और सामर आदि हैं उन संबकी स्वरूपभूता आपको अपनी कल्याण-प्राप्तिके लिये मैं नमस्कार करता हूँ। जिन गुरुदेवके प्रसादसे मैंने यशस्करी विद्या प्रास को है, उन भवसागरके सेतुस्वरूप शिवरूप गुरुदेवको मेरा नमस्कार है। अग्रजन्मन् ! वेद और वेदाङ्ग-शास्त्रोंके तत्त्व आपमें प्रतिष्ठित हैं। आप सभी प्राणियोंकि आधार हैं, आपको मेरा नमस्कार है। ब्राह्मण सम्पूर्ण संसारके चलते-फिरते परम पावन तीर्थस्वरूप हैं। अतः हे विष्णुरूपी भूदेव! आप मेरा पाप नष्ट करें, आपको मेरा नमस्कार है

 द्विजो! जैसे पिता श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पिताके बड़े-छोटे भाई और अपने बड़े भाई भी पिताके समान ही मान्य एवं पूज्य हैं। आचार्य ब्रह्माको, पिता प्रजापतिको, माता पृथ्वीकी और भाई अपनी ही मूर्ति हैं। पिता मेरुस्वरूप एवं वसिष्ठ- स्वरूप सनातन धर्ममूर्ति हैं। ये ही प्रत्यक्ष देवता हैं, अतः इनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। इसी प्रकार पितामह एवं पितामही (दादा-दादी)-के भी पूजन वन्दन, रक्षण, पालन और सेवनकी अत्यन्त महिमा है। इनकी सेवाके पुण्योंकी तुलनामें कोई नहीं है, क्योंकि ये माता- पिताके भी परम पूज्य हैं। (अध्याय ६)