भविष्य महा पुराण

सत्यनारायणव्रत-कथा

भारतवर्ष में सत्यनारायणव्रत-कथा अत्यन्त लोकप्रिय है और जनता-जनार्दनमें इसका प्रचार-प्रसार भी सवाधिक है। भारतीय सनातन परम्परामें किसी भी माङ्गलिक कार्यका प्रारम्भ भगवान् गणपतिके पूजनसे एवं उस कार्यको पूर्णता भगवान् सत्यनारायणकी कथा-प्रवणसे समझी जाती है। वर्तमान समयमें भगवान् सत्यनारायणको प्रचलित कथा स्कन्दपुराणके रेवाखण्डके नामसे प्रसिद्ध है, जो पाँच या सात अध्यायोंके रूपमें उपलब्ध है। भविष्यपुराणके प्रतिसर्गपर्वमें भी भगवान् सत्यनारायणव्रत-कथाका उल्लेख मिलता है, जो छ: अध्यायोंमें प्राप्त है। यह कथा स्कन्दपुराणको कथासे मिलती-जुलती होनेपर भी विशेष रोचक एवं श्रेष्ठ प्रतीत होती है। सत्यनारायणव्रत-कथाकी प्रसिद्धिके साथ अनेक शंका-समाधान भी इसपर होते रहते हैं तथा लोग यह भी पूछते हैं कि साधु वणिक, काष्ठविक्रेता, शतानन्द ब्राह्मण, उल्कामुख, तुङ्गध्वज आदि राजाओंने कौन-सी कथाएँ सुनी थी और वे कथाएँ कहाँ गयौं तथा इस कथाका प्रचार कबसे हुआ? इस सम्बन्धमें यही जानना चाहिये कि कथाके माध्यमसे मूल सत्-तत्त्व परमात्माका ही इसमें निरूपण हुआ है, जिसके लिये गीतामें 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः' आदि शब्दों में यह स्पष्ट किया गया है कि इस मायामय दु:खद संसारको वास्तविक सत्ता ही नहीं है। परमेश्वर ही त्रिकालाबाधित सत्य है और एकमात्र वही शेय, ध्येय एवं उपास्य है। ज्ञान-वैराग्य और अनन्य भक्तिके द्वारा वही साक्षात्कार करनेके योग्य है। भागवत (१०।२।२६)-में भी कहा गया है

सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये।

सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥

यहाँ भी सत्यद्रत और सत्यनारायणव्रतका तात्पर्य उन शुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मासे ही है। इसी प्रकार निम्नलिखित श्लोकमें-

अन्तर्भवेऽनन्त भवन्तमेव ह्यतत्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः।

असन्तमप्यन्त्यहिमन्तरेण सन्तं गुणं तं किमु यन्ति सन्तः।।

(श्रीमद्रा० १०॥ १४॥२८)

संसारमें मनीषियोंद्वारा सत्य-तत्त्वकी खोजकी बात निर्दिष्ट है, जिसे प्राप्तकर मनुष्य सर्वथा कृतार्थ हो जाता है और सभी आराधनाएँ उसी में पर्यवसित होती हैं। निष्काम-उपासनासे सत्यस्वरूप नारायणकी प्राप्ति हो जाती है। अतः वृद्धा-भक्तिपूर्वक पूजन, कथा-श्रवण एवं प्रसाद आदिके द्वारा उन सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्मा भगवान् सत्यनारायणकी उपासनासे लाभ उठाना चाहिये।-सम्पादक)

कधाका उपक्रम-

व्यासजी बोले-एक समयकी बात है, नैमिषारण्यमें शौनकादि ऋषियोंने पौराणिक श्रीसूतजीसे विनयपूर्वक पूछा-'भगवन् ! संसारके कल्याणके लिये आप यह बतलानेकी कृपा करें कि चारों युगोंमें कौन पूजनीय और कौन सेवनीय है तथा कौन सबके अभीष्ट मनोरोंको पूर्ण करनेवाला है? मानव अनायास ही जिसकी आराधनाद्वारा अपनी मङ्गलमयो कामनाको प्राप्त कर सकता है? ब्रह्मन्! आप ऐसे सत्य उपायको बतलायें जो मनुष्योंकी कीर्तिको बढ़ानेवाला हो।' शौनकादि ऋषियोंद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर श्रीसूतजी भगवान् सत्यनारायणकी प्रार्थना करने लगे।

नवाम्भोजनेनं रमाकेलिपात्रं

चतुर्बाहुचामीकर चारुगात्रम्।

जगत्त्राणहेतुं रिपौ धूम्रकेतुं

सदा सत्यनारायण स्तौमि देवम्॥

(प्रतिसर्गपर्व २।२४।४)

 (श्रीसूतजीने प्रार्थना करते हुए कहा-) 'प्रफुल्लित नवीन कमलके समान नेत्रवाले, भगवती लक्ष्मीके क्रीडापात्र, चतुर्भुज, सुवर्णकान्तिके समान सुन्दर शरीरवाले, संसारकी रक्षा करनेके एकमात्र मूल कारण तथा शत्रुओंके लिये धूम्रकेतुस्वरूप भगवान् सत्यनारायणदेवकी मैं स्तुति करता हूँ।'

श्रीरामं सहलक्ष्मणं सकरुणं सीतान्वितं सात्त्विकं

वैदेहीमुखपद्मलुब्धमधुर्प पौलस्त्यसंहारकम्।

वन्दे वन्द्यपदाम्बुजं सुरवरं भक्तानुकम्पाकरं

शत्रुघ्नेन हनूमता च भरतेनासेवितं राघवम्॥

(प्रतिसर्गपर्व २।२४।५)

'जो भगवान् करुणाके निधान हैं, जिनके चरणकमल वन्दनीय हैं, जो भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले हैं, जो लक्ष्मणजीके साथ रहते हैं और माता श्रीसीतासे समन्वित हैं तथा माता वैदेही श्रीजनकनन्दिनीजीके मुख-कमलकी ओर स्निग्धभावसे देखते रहते हैं, उन शत्रुघ्न, हनुमान् तथा भरतसे सेवित, पुलस्त्यकुलका संहार करनेवाले, सत्स्वरूप · सुर श्रेष्ठ राघवेन्द्र श्रीरामचन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ।'

सूतजीने कहा-ऋषियो! अब मैं आपसे श्रेष्ठ राजाओंके चरित्रोंसे सम्बद्ध एक इतिहासका वर्णन करता हूँ, उसे आपलोग श्रवण करें। यह पवित्र आख्यान कलियुगके सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाला, कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, देवताओंद्वारा आभासित, ब्राहाणोंद्वारा प्रकाशित, विद्वानोंको आनन्दित करनेवाला तथा विशेष रूपसे सत्संगके चर्चास्वरूप है।

ऋषियो! एक समय योगी देवर्षि नारदजी सबके कल्याणकी कामनासे विविध लोकोंमें भ्रमण करते हुए इस मृत्युलोकमें आये। यहाँ उन्होंने देखा कि अपने-अपने किये गये कमौके अनुसार संसारके प्राणी नाना प्रकारके क्लेशों एवं दुःखोंसे दु:खी हैं और विविध आधि एवं व्याधिसे ग्रस्त हैं। यह देखकर उन्होंने सोचा कि कौन-सा ऐसा उपाय है, जिससे इन प्राणियोंके दुःखका नाश हो। ऐसा विचारकर वे विष्णुलोकमें गये। वहाँ उन्होंने शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म और वनमालासे अलंकृत, प्रसन्नमुख, शान्त, सनक- सनन्दन तथा सनत्कुमारादिसे संस्तुत भगवान् नारायणका दर्शन किया। उन देवाधिदेवका दर्शन कर नारदजी उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे-'वाणी और मनसे जिनका स्वरूप परे है और जो अनन्तशक्तिसम्पन्न हैं, आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, ऐसे महान् आत्मा निर्गुणस्वरूप आप परमात्माको मेरा नमस्कार है। सभीके आदिपुरुष लोकोपकारपरायण, सर्वत्र व्याप्त, तपोमूर्ति आपको मेरा बार-बार नमस्कार है।'

देवर्षि नारदकी स्तुति सुनकर भगवान् विष्णु बोले- देवर्षे! आप किस कारणसे यहाँ आये हैं ? आपके मनमें कौन-सी चिन्ता है? महाभाग! आप सभी बातें बतायें। मैं उचित उपाय कहूँगा। नारदजीने कहा -प्रभो! लोकों में भ्रमण करता हुआ मैं मृत्युलोक में गया था, वहाँ मैंने देखा कि संसारके सभी प्राणी अनेक प्रकारके क्लेश तापोंसे दु:खी हैं। अनेक रोगोंसे ग्रस्त हैं। उनकी वैसी दुर्दशा देखकर मेरे मनमें बड़ा का हुआ और मैं सोचने लगा कि किस उपायसे इन दुःखी प्राणियोंका उद्धार होगा? भगवन् । उनके 'कल्याणके लिये आप कोई श्रेष्ठ एवं सुगम उपाय बतलानेकी कृपा करें। नारदजीके इन वचनोंको सुनकर भगवान् नारायणने साथ साथ शब्दोरी उनका अभिवादन

कलिकलुषविनाशं कामसिद्धिप्रकाश सुरवामुखभासं भूसुरेण प्रकाशम्।

विमुभबुधिषिलास साधुचर्याविशेष नृपतिवाचरित्र भोः शृणुष्वेतिहासम् ॥

(प्रतिसर्गपर्व २।४।६)

किया और कहा-'नारदजी! जिस विषयमें आप पूछ रहे है, उसके लिये मैं आपको एक सनातन व्रत बतलाता हूँ।'

भगवान् नारायण सत्ययुग और त्रेतायुगमें विष्णुस्वरूपमें फल प्रदान करते हैं और द्वापरमें अनेक रूप धारणकर फल देते हैं, परंतु कलियुगमें सर्वव्यापक भगवान् सत्यनारायण प्रत्यक्ष फल देते हैं, क्योंकि धर्मके चार पाद हैं-सत्य, शौच, तप और दान। इनमें सत्य ही प्रधान धर्म है। सत्यपर ही लोकका व्यवहार टिका है और सत्यमें ही ब्रह्म प्रतिष्ठित है, इसलिये सत्यस्वरूप भगवान् सत्यनारायणका व्रत परम श्रेष्ठ कहा गया है।

नारदजीने पुनः पूछा-भगवन् सत्यनारायणकी पूजाका क्या फल है और इसकी क्या विधि है? देव! कृपासागर! सभी बातें अनुग्रहपूर्वक मुझे बतायें।

श्रीभगवान् बोले- नारद! सत्यनारायणकी पूजाका फल एवं विधि चतुर्मुख ब्रह्मा भी बतलाने में समर्थ नहीं है, किंतु संक्षेपमें मैं उसका फल तथा विधि बतला रहा हूँ, आप सुनें-

सत्यनारायणके व्रत एवं पूजनसे निर्धन व्यक्ति धनाळा और पुत्रहीन व्यक्ति पुत्रवान् हो जाता है। राज्यच्युत व्यक्ति राज्य प्राप्त कर लेता है, दृष्टिहीन व्यक्ति दृष्टिसम्पन्न हो जाता है, बंदी बन्धनमुक्त हो जाता है और भयार्त व्यक्ति निर्भय हो जाता है। अधिक वया? व्यक्ति जिस-जिस वस्तुको इच्छा करता है, उसे वह सब प्राप्त हो जाती है। इसलिये मुने। मनुष्य-जन्ममें भक्तिपूर्वक सत्यनारायणकी अवश्य आराधना करनी चाहिये। इससे वह अपने अभिलषित वस्तुको नि:संदेह शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है।

इस रात्यनारायणवलकै करनेवाले वतीको चाहिये कि वह प्रातः दन्तधावनपूर्वक मानकर पवित्र हो जाय। हायमें तुलसी-मजरीको लेकर सत्पमें प्रतिष्ठित भगवान् श्रीहरिका इस प्रकार ध्यान करे-

नाराषणं सान्द्रवनावदातं

चतुर्भुज पीतमहाहवाससम्।

प्रसन्नवलं नवकालोचनं

सनन्दनाद्यैरुपसेवितं भजे।।

करोमि ते व्रतं देव सायंकाले त्वदर्चनम्।

श्रुत्वा गाथा त्वदीयां हि प्रसादं ते भजाम्यहम्॥

(प्रतिसर्गपर्व २ । २४ । २६-२७)

'सघन मेघके समान अत्यन्त निर्मल, चतुर्भुज, अतिश्रेष्ठ पीले वस्त्रको धारण करनेवाले, प्रसन्नमुख, नवीन कमलके समान नेत्रवाले, सनक-सनन्दनादिसे उपसेवित भगवान् नारायणका मैं सतत चिन्तन करता हूँ। देव ! मैं आपके सत्यस्वरूपको धारणकर सायंकालमें आपकी पूजा करूँगा। आपके रमणीय चरित्रको सुनकर आपके प्रसाद अर्थात् आपकी प्रसनताका मैं सेवन करूंगा।'

इस प्रकार मनमें संकल्पकर सायंकालमें विधिपूर्वक भगवान् सत्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। पूजामें पाँच कलश रखने चाहिये। कदली-स्तम्भ और बंदनवार लगाने चाहिये। स्वर्णमण्डित भगवान् शालग्रामको पुरुषसूक्त (यजु० ३१ ।१-१६) द्वारा पञ्चामृत आदिसे भलीभाँति स्नान कराकर चन्दन आदि अनेक उपचारोंसे भक्तिपूर्वक उनकी अर्चना करनी चाहिये। अनन्तर भगवान्को निम्न मन्त्रका उच्चारण करते हुए प्रणाम करना चाहिये-

नमो भगवते नित्यं सत्यदेवाय धीमहि।

चतु पदार्थदाने च नमस्तुभ्यं नमो नमः ।।

(प्रतिसर्गपर्व २।२४ । ३०)

'पडैश्वर्यरूप भगवान् सत्यदेवको नमस्कार है. में आपका सदा ध्यान करता हूँ। आग धर्म, अर्थ,

काम और मोक्ष-इस चतुर्विध पुरुषार्थको प्रदान करनेवाले हैं, आपको बार-बार नमस्कार है।' इस मन्त्रका यथाशक्ति जपकर १०८ बार हवन करे। उसके दर्शाशसे तर्पण तथा उसके दांशसे मार्जन कर भगवान्की कथाको सुनना चाहिये, जो छ: अध्यायोंमें उपनिबद्ध है। भगवानकी इस कथामें सत्य-धर्मकी ही मुख्यता है। कथा-श्रवणके अनन्तर भगवान्के प्रसादको चार भागोंमें विभक्तकर उसे भलीभाँति वितरण करे। प्रथम भाग आचार्यको दे, द्वितीय भाग अपने कुटुम्बको, तृतीय भाग श्रोताओंको और चतुर्थ भाग अपने लिये रखे। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन कराये एवं स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। देवर्षे ! इस विधिसे सत्यनारायणकी पूजा करनी चाहिये। श्रमा-भक्तिपूर्वक सत्यनारामफकी पूजा करनेवाला व्रती सभी अभीष्ट कामनाओंको इसी जन्ममें प्राप्त कर लेता है। इस जन्ममें किये गये पुण्यफलको दूसरे जन्ममें भोगा जाता है और दूसरे जन्ममें किये गये कर्मोंका फल मनुष्यको यहाँ भोगना पड़ता है। श्रद्धापूर्वक किया गया सत्यनारायणका व्रत सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है।

नारदजीने कहा- भगवन्! आज ही आपकी आज्ञासे भूमण्डलमें इस सत्यदेव-व्रतको मैं प्रतिष्ठित करूँगा। यह कहकर नारदजी तो पृथ्वीपर व्रतका प्रचार करने चले गये और भगवान् नारायणदेव अन्तर्धान हो काशीपुरीमें चले आये। (अध्याय २४)

[सत्यनारायणव्रत-कथाका प्रथम अध्याय ]