भविष्य महा पुराण

चरित्र, वरुणदेव और पराम्बाकी महिमा

देवगुरु बृहस्पतिने कहा-देवेन्द्र ! संसारमें जो जलको एक जगहसे दूसरी जगह पहुँचाता है, वही आपव कहलाता है। उसीका दूसरा नाम वरुण है। वे जलों तथा समुद्रोंके अधिपति हैं। दैत्योंके बन्धनके लिये ब्रह्माने उन्हें पोश प्रदान किया। पाश प्राप्त होनेपर महात्मा वरुणका नाम पाशी हो गया।

वे वरुण पहले शक्तिके पूजक एक ब्राह्मण थे और उनका नाम था आपव। वे भद्रकालोके प्रिय भक्त थे, प्रतिदिन उनके पूजनमें तत्पर रहते थे। अनेक प्रकारके रक्त पुष्पोंकी मालाओंको बनाकर, रक्त चन्दनसे संयुक्तकर मन्बोंद्वारा भद्रकालीको समर्पित करते थे। नवार्णजपमें तत्पर हो धूप-दीप नैवेद्य, ताम्बूल, सातूफल आदिसे सनातनी महालक्ष्मी भद्रकालीको पूजा करते रहो। तिल शर्करायुक्त मधुरो हवन भी करते थे। वे दुर्भातसाती के मध्यम चरित्रका पाठकर नवार्णमन्त्र-जपमें तत्पर हो तीन वर्षतक पूजामें संलग्न रहे। अनन्तर सर्वमङ्गला भगवतीदेवी प्रसन्न हुई और बोली-'द्विजसत्तम! तुम वर मांगो।' देवीके इस प्रिय वचनको सुनकर ननधी द्विज आपबने उन्हें दण्डवत् प्रणाम कर उन भद्रकाली सनातनीदेवीकी अनेक प्रकारसे स्तुति की।

फिर देवी भद्रकालीने प्रसन्न होकर आपबसे कहा-द्विज । प्रलयके आने तथा स्थावर जंगमके विनष्ट हो जाने पर एकार्णवमें मेरी कृपासे तुम सुखी होओगे। यह कहकर वे देवी अन्तर्लोन हो गयीं और वे ब्राह्मण वरुणदेवके रूपमें विशेष समादूत हुए।

सूतजी बोले-मुने ! देवगुरुके इन वाक्यों को सुनकर द्वितीय वसु भगवान् वरुणने अपने मुखसे को पृथ्वीपर एक तेज उत्पन्ना किया। वह तेज देहलीमें

*'रामानन्दजोको शिष्य-परम्पराके भक्तों-त्रिलोचन वैश्य, नामदेव, रंकण-यंकणा (रौका-यांका), कबीर, नरसी मेहता तथा सधन कसाई आदिका उदात्त चरित्र एवं आचार्योके नहनीय चरित्र गीताप्रेसले प्रकाशित ' भक्तचरिताङ्क' में विस्तारसे दिये गये हैं। उससे भी लाभ उठाना चाहिये।

धर्मभक्तके घर उत्पन्न हुआ। उसकी विधवा कन्याने  ' हरिके उस तेजको धारण किया। यह जानकर धर्मभक्त पुत्रकी उत्पत्तिसे अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसका नाम नामदेव हुआ। वह सांख्ययोगपरायणस था। चराचर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड विष्णुमय है, यह जानकर और देखकर वे काशीमें हरिप्रिय रामानन्दके पास आये और उनकी शिष्यता ग्रहण कर वहीं निवास किये। उस समय प्लेच्छपति सिकन्दरका देहलीमें राज्य था। उसने नामदेवको बुलाकर और भलीभाँति उनकी परीक्षाकर प्रसन्न हो पचास लाख मुद्राएँ दी। नामदेवने उस द्रव्यसे काशीमें श्रेष्ठ शुभ्र शिलामय घाटका निर्माण कराया और अपने योगबलसे मरे हुए दस ब्राह्मणों, पाँच राजाओं, पाँच वैश्यों तथा सौ गौओंको पुनः जीवित किया।

देवगुरु बृहस्पतिने कहा- देवेन्द्र ! पूर्वकालमें विश्वानर नामका एक ब्राह्मण था। उसके पुत्र नहीं था। पुत्रकी प्राप्तिके लिये उसने आराधनाद्वारा ब्रह्माको संतुष्ट किया। एक वर्षमें ही भगवान् परमेष्ठी पितामहने संतुष्ट होकर वर मांगनेको कहा। इसपर उसने कहा-'भगवन्! आपको नमस्कार है। प्रकृतिसे भी जो परे है, यह मेरा पुत्र हो। यह सुनकर आश्चर्यचकित हो ब्रह्माने उस ब्राह्मणसे कहा-'हे ब्राह्मण! वह तो नित्य सनातन पुरुष है, वह तुम्हारा पुत्र कैसे हो सकता है? इसलिये विश्वानर मुने! मायाभूत हरि स्वयं जनार्दन मेरे वरदानसे तुम्हारे पुत्ररूपमें आयेंगे।' यह कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये और विश्वानरका पावक नामसे पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पावक आठ वसुओंका पति हुआ और वैश्वानर नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा स्वाहादेवीका स्वामी हुआ। यह वैश्वानर पुराकल्पमें अनल था और निषधका बुद्धिमान् ब्राह्मण था।

सूतजी बोले-मुने ! बृहस्पतिके इन वचनोंको सुनकर भगवान् पावकने अपने मुखसे अपने अंशको उत्पन्न किया। वही पावकांश वसु होकर लक्ष्मीदत्तका पुत्र रंकण । (राँका) नामसे प्रसिद्ध हुआ। कांचनपुर नगरमें वैश्यकुलमें उसकी उत्पत्ति हुई। उसकी पतिव्रता पत्नी यंकणा (बाँका) थी । वे दोनों धर्मकार्यमें अपने सभी द्रव्योंको खर्चकर काष्ठ बेचकर उससे उपार्जित धनद्वारा भगवान्की पूजा करके प्रभुके प्रसादसे अपना जीवन-निर्वाह किया करते थे। महात्मा रंकणके गुरु रामानन्द थे। (अध्याय १६)