भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- राजन् ! अब मैं कपासपर्वतके दानकी विधि बता रहा हूँ। यह सभी दानों में श्रेष्ठ और समस्त देवताओंको परम प्रिय है। अपने कुटुम्बका उद्धार करनेके लिये उपयुक्त देश-काल और धनको प्राप्तकर श्रद्धापूर्वक इस महादानको यत्नपूर्वक करना चाहिये। बीस भार रूईसे बना हुआ कपासपर्वत उत्तम, दस भारसे बना हुआ मध्यम और पाँच भारसे बना हुआ अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य कृपणता छोड़कर एक भार कपासके बने हुए पर्वतका दान कर सकता है। नृपश्रेष्ठ ! धान्यपर्वतकी भाँति सारी सामग्री एकत्र कर रात्रिके व्यतीत होनेपर प्रात काल इस दानको करना चाहिये। उस समय यह मन्त्र पड़े
त्वमेवावरणं यस्माल्लोकानामिह सर्वदा।
कापसाचल नस्तस्मादधौघश्वसनो भव ।।
(उत्तरपर्व २००।१७)
'कार्पासाचल! कि इस लोकमें तुम्ही सदा सभी लोगों के शरीरके आच्छादन हो, इसलिये तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे पापसमूहका विनाश कर दो।' इस प्रकार जो मनुष्य भगवान् शिवके संनिधानगों कापसाचलका दान करता है, वह एक कल्पतक रुद्रलोकमें निवास करनेके पश्चात् भूतलपर सौभाग्यशाली राजा होता है।
राजन् ! इसके बाद मैं दिव्य तेजसे सम्पन्न अमृतमय और महान्-से-महान् पापोंके विनाशक श्रेष्ठ घृताचलदानका वर्णन कर रहा हूँ। पचास घड़े घोसे बना हुआ घृताचल उत्तम, पचीससे मध्यम और उसके आधेसे अधम (साधारण) कहा गया है। अल्य वित्तबाला भी यदि करना चाहे तो वह यथाशक्ति घृताचलकी रचना करके दान कर सकता है। उसके चतुर्थाशसे विकाभपर्वतोंकी भी कल्पना करनी चाहिये। उन सभी घड़ोंके ऊपर अगहनी चावलासे परिपूर्ण पात्र रखा जाय और उन्हें विधिपूर्वक एकके ऊपर एक रखकर ऊँचा कर देना चाहिये। उन्हें श्वेत वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर उनके निकट गया और फल आदि रख दे। इसमें शेष सारा विधान धान्यपर्वतकी ही भौति बतलाया गया है। देवताओं की स्थापना, उनका अर्चन और हवन भी उसी प्रकार करना चाहिये। रात्रि व्यतीत होनेपर प्रात:काल यजमान, शान्त मनसे वह घृताचल गुरुको निवेदित कर दे। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंको भी ऋत्विजोंको दान कर दे, उस समय इस मन्त्रका पाठ करना चाहिये-
संयोगाद्धृतमुत्पन्न यस्मादमृततेजसोः।
तस्माद्धृताचलचास्मात् प्रीयतां मम शंकरः ॥
यस्मात् तेजोमयं ब्रहा मते गिराय ज्यारिणराम्।
पतपर्वतरूपेण तस्मान्नः पाहि भूधर ॥
(उत्तरपर्व २०१४८-१)
'चूंकि अमृत और अग्निके संयोगसे घृत उत्पन्न हुआ है, इसलिये घृताचलरूप शंकर इस व्रतसे प्रसन्न हों। चूंकि ब्रह्म तेजोमय है और धीमें विद्यमान है, ऐसा जानकर घृतपर्वतरूप मूधर! हमारी रक्षा करो।' जो मनुष्य इस विधिसे इस श्रेष्ठ घृताचलका दान करता है, वह महापापी होनेपर भी शिवलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय २००-२०१)