महाराज युधिष्ठिरने कहा- भगवन् ! यदि इस संसार-सागरसे पार उतारनेवाला तथा स्वर्ग, आरोग्य एवं सुखप्रदायक कोई व्रत हो तो उसे आप बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्णा बोले-राजन्! जिस शुक्ला सामीको मादित्यवार हो, उसे विजया-सप्तमी या कल्याण सानी चाहते है। यह तिथि महापुण्यमयी है। इस दिन प्रात: काल गोदुग्धयुक्त जलसे स्नानकर शुक्ल वस्त्र धारण कर अक्षतोंसे अति सुन्दर एक कागकात अदलाकमल बनाये तथा पूर्वादि आग दलांग मशा पूर्व दिशामे ॐतपनाय नमः,' अग्रिकोणमें ॐमार्तपडाय नमः', दक्षिण दिशामें 'ॐ दिवाकराय नमः', नैर्ऋत्यकोणमें ॐ विधात्रे नमः', पश्चिम दिशामें 'ॐ वरुणाय नमः', वायव्यकोणमें 'ॐ भास्कराय नमः', उत्तर दिशामें 'ॐ विकर्तनाय नमः' तथा ईशानकोणमें 'ॐ रवये नमः' इस प्रकारसे नाम-मन्त्रोंद्वारा कणिकाओंमें सभी उपचारोंसे पूजन करे। शुक्ल वस्त्र, फल, भक्ष्य पदार्थ, धूप, पुष्पमाला, गुड़ और लवणसे नमस्कारान्त इन नाम-मत्रोंसे वेदीके ऊपर पूजा करे। इसके बाद व्याहति होमकर यथाशक्ति ब्राह्मणभोजन कराये। गुरुको सुवर्णसहित तिलपात्र दान करे। दूसरे दिन प्रातः उठकर नित्य क्रियासे निवृत्त हो ब्राहाणोंके साथ घृत एवं पायससे बने पदार्थोंका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्षतक भगवान् सूर्यका पूजन एवं व्रतकर उद्यापन करे। जल, कलश, घृतपात्र, सुवर्ण, वस्त्र, आभूषण और सवत्सा गौ ब्राह्मणको दे। इतनी शक्ति न हो तो गोदान करे। जो इस कल्याणसप्तमी-व्रतको करता है अथवा माहात्म्यको पढ़ता या सुनता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें निवास करता है। (अध्याय ४८)