भविष्य महा पुराण

योगाचार्य महर्षि पतञ्चलिका चरित्र

सूतजी बोले-अनेक धातुओंके द्वारा चित्रित रमणीय चित्रकूट पर्वतपर महाविद्वान् उपाध्याय पतञ्जलिमुनि रहते थे। वे वेद-वेदाङ्ग-तत्त्वज्ञ एवं गीता-शास्त्र-परायण थे। वे विष्णुके भक्त, सत्यवक्ता एवं व्याकरण-महाभाष्यके रचयिता भी माने गये हैं। एक समय वे शुद्धात्मा अन्य तीर्थोंमें गये। काशीमें उनका देवीभक्त कात्यायनके साथ शास्त्रार्थ हुआ। एक वर्षतक शास्त्रार्थ चलता रहा, अन्तमें पतञ्जलि पराजित हो गये। इससे लज्जित होकर उन्होंने सरस्वतीकी इस प्रकार आराधना की-

नमो देव्यै महामूत्यै सर्वमूत्यै नमो नमः ।

शिवायै सर्वमाङ्गल्यै विष्णुमाये च ते नमः ।।

त्वमेव श्रद्धा बुद्धिस्त्वं मेधा विद्या शिवंकरी।

शान्तिवाणी त्वमेवासि नारायणि नमो नमः ।।

(प्रतिसर्गपर्व २।३५1५-६)

'महामूर्ति देवीको नमस्कार है। सर्वमूर्तिस्व- रूपिणीको नमस्कार है। सर्वमङ्गलस्वरूपा शिवादेवीको नमस्कार है। हे विष्णुमाये ! तुम्हें नमस्कार है। हे नारायणि! तुम्ही श्रद्धा, बुद्धि, मेधा, विद्या तथा कल्याणकारिणी हो । तुम्हों शान्ति हो, तुम्ही वाणी हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार है।'

इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवती सरस्वतीने आकाशवाणी में कहा-'विप्र श्रेष्ठ । तुम एकाग्रचित्त होकर मेरे उत्तरचरित्रका जप करो। उसके प्रभावसे तुम निश्चय ही ज्ञानको प्राप्त करोगे। पतञ्जले। कात्यायन तुमसे परास्त हो जायेंगे।' देवीकी इस वाणीको सुनकर पतञ्जलिने विन्ध्यवासिनीदेवीके मन्दिरमें जाकर सरस्वतीकी आराधना की और वे प्रसन्न हो गयौं। इससे उन्होंने पुनः शास्त्रार्थमें कात्यायनको पराजित कर दिया, बादमें उन्होंने कृष्ण-मन्त्र और भक्तिके प्रचारमें तुलसीमाला आदिका भो महत्व बढ़ाया। भगवतो विष्णुमायाको कृपासे वे योगाचार्य अत्यन्त चिरजोची हो गये।

मुनियो ! इस प्रकार दुर्गासप्तशतीके उत्तरचरित्रकी महिमा निरूपित हुई। अब आगे आपलोग क्या सुनना चाहते हैं, वह बतायें। सभीका कल्याण हो, कोई भी दुःख प्राप्त न करे। गरुडध्वज, पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णु मङ्गलमय हैं। भगवान् विष्णु मङ्गलमूर्ति हैं। जो व्यक्ति पवित्र होकर इस इतिहास समुच्चयको प्रतिदिन सुनता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। (अध्याय ३५)

।। प्रतिसर्गपर्व द्वितीय जय खण्ड सम्पूर्ण।।

[भविष्यपुराणके प्रतिसर्गपर्वका तीसरा खण्ड रामांश और कृष्णांश अर्थात् आल्हा और ऊदल (उदयसिंह)- के चरन तथा जबड़ एवं पृथ्वीराज चौहानको वौर-गाधाओंसे परिपूर्ण है। इधर भारत में जगनिक भाटरचित आन्द्राका चौरकाब बहुत प्रचलित है। इसके बुंदेलखण्डौ, भोजपुरी आदि कई संस्करण हैं, जिनमें भाषाओंका घोड़ा-थोड़ा भेद है। इन कथाओंका मूल यह प्रतिस्पर्व ही प्रतीत होता है। इसीके आधार पर ये रचनाएं प्रचलित हैं। शब- ये कथाएँ लोकरञ्जनके अनुसार अतिशयोक्तिपूर्ण-सी प्रतीत होती हैं, किंतु ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वको भी हैं। यहाँ इनका सारमात्र प्रस्तुत किया गया है-सम्पादक]