भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-राजन् ! जो विवाह करने योग्य कन्याको अलंकृतकर ब्राविधिसे सुयोग्य वरको प्रदान करता है, वह साल पूर्व और सात आगे आनेवाली पोड़ियों को तथा अपने कुलके सभी मनुष्यों को भी इस कन्या दानके पुण्यसे तार देता है, इसमें संदेश नहीं। जो प्राजापत्य-विधिके द्वारा कन्या-दान करता है, वह दक्षप्रजापतिके लोकको प्राप्त करता है। वह अपना उद्धार कर अपार पुण्य प्राप्त करता है तथा अन्तमें स्वर्गलोक प्राप्त करता है। जो पृथ्वी, गौ, अश्व, गजका दान हीन वर्णको करता है, वह धोर नरकमें पड़ता है। शुल्क लेकर कन्याका दान करनेवाला घोर नरक प्रास करता
है और हजारों वर्षोंतक अपवित्र लाला-भक्षण करता हुआ नरकमें जीवन-यापन करता है। इसलिये सवर्णा कन्या सवर्णको ही प्रदान करनी चाहिये। ब्राह्मणके बालक अथवा किसी अनाथको जो चूड़ाकरण, उपनयन आदि संस्कारों से संस्कृत करता है, वह अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है। अनाथ कन्याका विवाह करानेवाला स्वर्गम पूजित होता है। पूर्वजोंने कहा है कि जो कन्या-दानके साथ, प्रदीस शुद्ध स्वर्णका दान करता है, वह द्विगुणित कन्या-दानका फल प्राप्त करता है। कन्याकी पूजासे विष्णुकी पूजाके समान पुण्य होता है।
महाराज ! पृथ्वीपर ब्राह्मण ही देवता हैं, स्वर्ग में ब्राह्मण ही देवता हैं। इतना ही नहीं, तीनों लोकों में ब्राह्मणसे श्रेष्ठ कोई नहीं है। ब्राह्मणों में यह शक्ति है कि वे मन्त्र-बलके प्रभावसे देवताको अदेवता और अदेवताको देवता बना देते हैं। इसलिये महाभाग! ब्राह्मणकी सदा पूजा करनी चाहिये। देवगण ब्राह्मणसे ही पूर्वमें उत्पन्न हुए ऐसा स्मृतियोंका कथन है। सम्पूर्ण जगत् ब्राह्मणसे ही उत्पन्न है। इसलिये ब्राह्मण पूज्यतम हैं। देवगण, पितृगण, ऋषिगण जिसके मुखसे भोजन करते हैं, उस ब्राह्मणसे श्रेष्ठ और कौन हो सकता है? धर्मज्ञ!
ब्राह्मणोंका कल्याण करनेवाला व्यक्ति स्वर्गलोकमें पूजित होता है। जब प्रत्यक्ष देवता ब्राह्मण संतुष्ट होकर बोलते हैं तो यह समझना चाहिये कि परोक्षमें देवताओंकी ही यह वाणी है। उसीसे मनुष्यका कल्याण हो जाता है, अतः सदा ब्राह्मणकी सेवा करनी चाहिये। (अध्याय १४८-१५०)