सप्ताश्ववाहन ( भगवान् सूर्य ) ने कहा-हे वीर ! जो प्राणी सूर्ग, अग्नि, गुरु तथा ब्राहाणको निवेदन किये बिना स्वयं जो कुछ भी भक्षण
करता है वह पाप-भक्षण करता है। गृहस्थ मनुष्योंके कृषिकार्यसे, वाणिज्यसे, क्रोध और असत्य आदिके आचरणरो तथा पशसूना* दोषसे
*भोजन पकाने का स्थान(चूल्हा), आटा आदि पीसनेका स्थान(चक्की आदि) मसाला आदि कूटने पीसने का स्थान(लोहा सिलवट आदि) जल रखनेका स्थान तथा झाडू देनेका काम-इसमें अनजाने ही हिंसाकी सम्भावना रहती है। अतः गृहस्थके लिये इन्हें ही प्रष्ठसूना-दोष कहा गया है।
पाप होते हैं। सूर्य, गुरु, अग्नि और अतिथि आदिके सेवारूप पञ्चमहायज्ञोंसे ये पाप नष्ट हो जाते हैं। इसी प्रकार अन्य पापोंसे भी वह लिस नहीं होता, अतः इनकी नित्य पूजा करनी चाहिये। देवाधिदेव दिवाकरके प्रति जो इस प्रकार भक्ति करता है, वह अपने पितरोंको सभी पापोंसे विमुक्त कर स्वर्ग ले जाता है।
हे खग! भगवान् सूर्यके दर्शनमात्रसे ही गङ्गा- स्नानका फल एवं उन्हें प्रणाम करनेसे सभी तीर्थोका फल प्राप्त हो जाता है तथा सभी पापोंसे मुक्ति मिल जाती है। संध्या-समयमें सूर्यकी सेवा करनेवाला सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। एक बार भी भगवान् सूर्यकी आराधना करनेसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, पितृगण तथा सभी देवगण एक ही साथ पूजित एवं संतुष्ट हो जाते हैं।
श्राद्धमें भगवान् सूर्यको पूजा करने तथा सौर भक्तोंको भोजन करानेसे पितृगण तृप्त हो जाते हैं। पुराणवेत्ताको आते हुए देखकर सभी ओषधियाँ यह कहकर आनन्दसे नृत्य करने लगती हैं कि आज हमें अक्षय स्वर्ग प्राप्त होगा। पितृगण एवं देवगण अतिथिके रूपमें लोकके अनुग्रह और श्रद्धाके परीक्षणके लिये आते हैं, अत: अतिथिको आया हुआ देखकर हाथ जोड़कर उसके सम्मुख जाना चाहिये तथा स्वागत, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अन्न आदिद्वारा उसको सेवा करनी चाहिये। अतिथि रूप-सम्पन्न है या कुरूप, मलिन चस्वधारी है अथवा स्वच्छ वस्वधारी इसपर विद्वान् पुरुषको विचार नहीं करना चाहिये। इसका यथेष्ट स्वागत करना चाहिये।
अरुण! दान सत्पात्रको ही देना चाहिये, जैसे कल्ये मिट्टी के पात्र में रखा हुआ दूब जल आदि पदार्थ नष्ट हो जाता है, जैसे ऊपर भूगि बोया गया बीज और भस्म हवन किया गया हव्य पदार्थ निष्फल हो जाता है, वैसे ही अपात्रको दिया गया दान भी निष्फल हो जाता है। खगश्रेष्ठ! जो दान करुणापूर्वक श्रद्धाके साथ प्राणियोंको दिया जाता है, वह सभी कर्मोंमें उत्तम है। हीन, अन्ध, कृपण, बाल, वृद्ध तथा आतुरको दिये गये दानका फल अनन्त होता है। साधु पुरुष दाताके दानको अपने स्वार्थका उद्देश्य न रखकर ग्रहण करते हैं। इससे दाताका उपकार होता है। कोई अर्थी यदि घरपर आये तो कौन ऐसा व्यक्ति है जो उसका आदर नहीं करेगा। घर-घर याचना करनेवाला याचक पूज्य नहीं होता। कौन दाता है और कौन याचक इसका भेद देने और लेनेवालेके हाथस्से ही सूचित हो जाता है। जो दाता व्यक्ति याचकको आया हुआ देखकर दान देनेकी अपेक्षा उसकी पात्रतापर विचार करता है, वह सभी कर्मोको करता हुआ भी पारमार्थिक दाता नहीं है। संसारमें यदि याचक न हों तो दानधर्म कैसे होगा? इसलिये याचकको 'स्वागत है, स्वागत है' यह कहते हुए दान देना चाहिये।
याचकको प्रेमपूर्वक आधा ग्रास भी दिया जाय तो वह श्रेष्ठ है, किंतु बिना प्रेमका दिया हुआ बहुत-सा दान भी व्यर्थ है, ऐसा मनीषियोंने कहा है। इसलिये अनन्त फल चाहनेवाले व्यक्तिको सत्कारपूर्वक दान देना चाहिये। इससे मरनेपर भी उसको कीर्ति बनी रहती है। प्रिय एवं मधुर बचनोंद्वारा दिया गया दान कल्याणकारी है, किंतु कटोरतासे असत्कारपूर्वक दिया गया दान युक दान नहीं है। अन्तरात्माले युद्ध होकर याचकको बात से न देना अच्छा है। प्रेमसे रहित दान न धर्म है, न धन है, न प्रीति है। दान, प्रदान, नियम यज्ञ ध्यान हवन और तप ये सभी क्रोधके साथ करनेपर निष्फल हो जाते हैं*।
*न तद्दानमसत्कारपारुष्यलिनोकृतम्।
वरं न दत्तर्थिभ्यः संक्रुद्वेनान्तरात्मना।।
न तद्धन र प्रीति था: प्रियवर्जितः ।
दानण्यामनियामाध्यानं हुतं तपः।
यत्रेनापि स स क्रोधीतस्य निष्फलं खग ॥
(बाहापर्व १८९ । १२-२७)
श्रद्धाके साथ आदरपूर्वक ग्रहीताका अर्चन कर दान देनेवाले तथा श्रद्धा एवं आदरपूर्वक दान ग्रहण करनेवाले दोनों स्वर्ग प्रास करते हैं। इसके विपरीत देना और लेना ये दोनों नरक-प्राप्तिके कारण बन जाते हैं। उदारता, स्वागत, मैत्री, अनुकम्पा, अमत्सर-इन पौंच प्रकारोंसे दिया गया दान महान् फल देनेवाला होता है।
हे खगश्रेष्ठ ! वाराणसी, कुरुक्षेत्र, प्रयाग, पुष्कर, गङ्गा और समुद्रतट, नैमिषारण्य, महापुण्य, मूलस्थान, मुण्डीरस्वामी (उड़ीसाका कोणार्कक्षेत्र), कालप्रिय (कालपी), क्षीरिकावास-ये स्थान देवताओं और पितरोंसे सेवित कहे गये हैं। सभी सूर्याश्रम, पर्वतोंसे युक्त सभी नदियाँ, गौ, सिद्ध और मुनियोंसे प्रतिष्ठित स्थान पुण्यक्षेत्र कहे गये हैं। सूर्यमन्दिरसे युक्त स्थानों में रहनेवालेको दिया गया थोड़ा भी दान क्षेत्रके प्रभावसे अनन्त फलप्रद होता है। सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, उत्तरायण विषुच, व्यतीपात, संक्रान्ति-ये सब पुण्यकाल कहे गये हैं। इनमें दान देनेसे पुण्यको वृद्धि होती है। भक्तिभाव, परमप्रीति, धर्म, धर्मभावना तथा प्रतिपत्ति-ये पाँच श्रद्धाके पर्याय हैं। श्रद्धापूर्वक विधानके साथ सुपात्रको दिया गया दान उत्तम एवं अनन्त फलप्रद कहा गया है, अत: अक्षय पुण्यको इच्छासे श्रद्धापूर्वक दान देना चाहिये। इसके विपरीत दिया गया दान भारस्वरूप ही है। आर्त, दीन और गुणवानको श्रद्धाके साथ थोड़ा भी दिया गया दान सभी कामनाओंका पूरक और सभी श्रेष्ठ लोकोंको प्राप करानेवाला होता है। मनीषियोंने बद्धाको ही दान माना है। श्रद्धा ही दान असा हो परम प तथा श्रद्धा ही था और श्रद्धा हो परम उपवास है। अहिंसा, क्षमा, सत्य, नम्रता, बडा दायरामा दायर तारामा ध्यान ये दस धर्मके साधन हैं।
पर-स्त्री तथा पर-द्रव्यकी अपेक्षा करनेवाला और गुरु, आर्त, अशक्त, विदेशमें गये हुए तथा शत्रुसे पराभूत व्यक्तिको कष्ट देनेवाला पापकर्मा कहा जाता है। ऐसे व्यक्तियोंका परित्याग कर देना चाहिये, किंतु उसकी भार्या तथा उसके मित्र एवं पुत्रका अपमान नहीं करना चाहिये? उनका अवमान करना गुरुनिन्दाके समान पातक माना गया है। ब्राह्मणको मारनेवाला, सुरा-पान करनेवाला, स्वर्ण-चोर, गुरुकी शय्यापर शयन करनेवाला एवं इनके साथ सम्पर्क रखनेवाला-ये पाँच महापातकी कहे गये हैं। जो क्रोध, द्वेष, भय एवं लोभसे ब्राह्मणका अपमान करता है, वह ब्रह्महत्यारा कहा गया है। जो याचना करनेवालेको और ब्राह्मणको बुलाकर 'मेरे पास कुछ नहीं है' ऐसा कहकर बिना कुछ दिये लौटा देता है, वह चाण्डालके समान है। देव, द्विज और गौके लिये पूर्वप्रदत्त भूमिका जो अपहरण करता है, वह ब्रह्मघाती है। जो मुर्ख सौरज्ञानको प्रासकर उसका परित्याग कर देता है अर्थात् तदनुकूल आचरण नहीं करता, उसे सुरा-पान करनेवाले के समान जानना चाहिये। अग्निहोत्रके परित्यागी, माता और पिताके परित्यागी, कुकर्मक साक्षी, मित्रके हन्ता, सूर्यभक्तोंके अप्रियको और पञ्चयज्ञोंके न करनेवाले, अभक्ष्य-भक्षण करनेवाले तथा निरपराध प्राणियोंको मारनेवालेको सर्वाधिपत्यकी प्राप्ति नहीं होती। सर्वजगत्पति भानुकी आराधनासे आत्मलोकका आधिपत्य प्राप्त होता है। अतः मोक्षकामीको भोगकी आसक्तिका परित्याग कर देना चाहिये। जो विरक्त हैं, शान्तचित्त है, वे सूर्यसाबन्धी लोकको प्राप्त करते है। (अध्याय १०० १८९)