महाराज युधिष्ठिरने पूछा-जनार्दन ! आप गोसहस्रदानका विधान बतायें। यह किस समय किस विधिसे किया जाता है।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-प्रजेश्वर! गौएँ सम्पूर्ण संसारमें पवित्र हैं और गौएँ ही उत्तम आश्रयस्थान हैं। संसारकी आजीविकाके लिये ब्रह्माजीने इनकी सृष्टि की है। तीनों लोकोंके हितकी कामनासे गौकी सृष्टि प्रथम की गयी है। इनके मूत्र और पुरीषसे देवमन्दिर भी पवित्र हो जाते हैं औरों के लिये तो कहना ही क्या ! गौएँ काम्य यज्ञोंकी मूलाधार हैं, इनमें सभी देवताओंका निवास है। गोमयमें साक्षात् लक्ष्मीका निवास है। ब्राह्मण और गौ-दोनों एक ही कुलके दो रूप हैं। एकमें मन्त्र अधिष्ठित हैं और एकमें हविष्य-पदार्थ। इन्हीं गौओंके पुत्रोंके द्वारा सारे संसार और देवताओंका भरण-पोषण होता है। राजन्! आप ऐसी विशिष्ट गुणमयी गौके दानका विधान सुनें । एकमात्र सर्वगुण तथा सर्वलक्षणसम्पन्न गौका दान करने पर समस्त कुटुम्ब तर जाता है, फिर यदि अधिक गौएँ दानमें दी जाये तो उनके माहात्म्यके विषयमें क्या कहा जाय?
प्राचीन कालमें महाराज नहुष और महामति ययातिने भी सहस्रों गौओंका दान किया था, जिसके प्रभावसे वे ब्रहा-स्थानको प्राप्त हो गये। पुत्रको कामनासे देवी अदितिने भी गङ्गाजीके तटपर अपार गोदान किया था, जिसके फलस्वरूप उन्होंने तीनों लोकोंके स्वामी नारायण (भगवान् चामन-उपेन्द्र) को पुत्ररूपमें प्राप्त किया। राजन्। ऐसा सुना जाता है कि पितृगण इस प्रकारको गाथा गाते हैं क्या मेरे कुलमें ऐसा कोई पुण्यात्मा पुत्र होगा, जो सहस्रों गौओंका दान करेगा, जिसके पुण्यकर्मसे हम सब परमसिद्धिको प्राप्त कर सकेंगे अथवा हमारे कुलमें सहस्रों गोदान करनेवाली कोई दुहिता (कन्या) होगी, जो अपने पुण्य-कर्मके आधारपर मेरे लिये मोक्षकी सीढ़ी तैयार कर देगी।
राजन्! अब मैं शास्त्रोक्त सार्वकामिक गोसहसदानरूप यज्ञकी विधि बता रहा हूँ। दाता किसी तीर्थस्थान अथवा गोष्ठ या अपने घरपर ही दस अथवा बारह हाथका लम्बा-चौड़ा एक सुन्दर मण्डप बनवाये। उसमें तोरण लगाये जायें। उसके चारों दिशाओंमें चार दरवाजे लगाये जायें। मण्डपके मध्यमें चार हाथको एक सुन्दर बेदी बनाये। इस वेदीके पूर्वोत्तर-दिशा (ईशानकोण)- में एक हाथके प्रमाणकी ग्रहवेदीका निर्माण करे। ग्रहयज्ञके विधानसे उसपर क्रमसे ग्रहोंकी स्थापना करे। सर्वप्रथम ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्रकी अर्चना करनी चाहिये। यज्ञके लिये ऋत्विजोंका वरण, पुनः वेदीके पूर्वोत्तर भागमें एक शिव कुण्डका निर्माण कर द्वार-प्रदेशमें पल्लवोंसे सुशोभित दो- दो कलशोंकी स्थापना करनी चाहिये और उनमें पञ्चरत्न डाल देना चाहिये। तदनन्तर हवन करना 'चाहिये। तुलापुरुषदानके समान इसमें भी लोकपालोके निमित्त बलि-नैवेद्य प्रदान करना चाहिये। सहनों गौओंमेंसे सवत्सा दस गौओंको अलग कर उन्हें वस्त्र और माला आदिसे खूब अलंकृत कर ले। इन दसों गौओंके मध्य जाकर विधिपूर्वक सबकी पूजा करे। इनके गलेमें सोनेकी घंटी, ताँबेके दोहनपात्र, खुरोंमें चाँदी और मस्तकको सुवर्ण- तिलकसे अलंकृतकर सींगोंमें भी सोना लगा दे।
१-यासां मूत्रपुरीषेण देवतायतनान्यपि ।
शुचीनि समजायन्त किं भूतमधिकं ततः॥
(उत्तरपर्व १५९।३)
२-दुहिता वा कुले काचिद् गोसहनप्रदायिनी ।
सोपान: सुगतिर्दत्तो भविष्यति न संशयः ।।
(उत्तरपर्व १५९।१४)
गोमाताके चतुर्दिक् चमर डुलाना चाहिये। इसी प्रसंगमें मुनियोंने सुवर्णमय नन्दिकेश्वर (वृषभ)- को लवणके ऊपर रखकर अथवा प्रत्यक्ष वृषभके भी दानका विधान बतलाया है। इस प्रकार दस- दस गौके क्रमसे गोसहस्र या गोशत दान करना चाहिये। यदि संख्यामें सम्पूर्ण गौएँ उपलब्ध न हो सकें तो दस गौओंकी पूजा कर शेष गौओंकी परिकल्पना कर उनका दान करना चाहिये।
तदनन्तर पुण्यकाल आनेपर गीत एवं माङ्गलिक शब्दोंके साथ वेदज्ञ ब्राह्मणों द्वारा सौंषधिमिश्रित जलसे स्नान कराया हुआ यजमान अञ्जलिमें पुष्प लेकर इस प्रकार उच्चारण करे-'विश्वमूर्तिस्वरूप विश्वमाताओंको नमस्कार है। लोकोंको धारण करनेवाली रोहिणीरूप गौओंको बारम्बार प्रणाम है। गौओंके अङ्गोंमें इक्कीसों भुवन तथा ब्रह्मादि देवताओंका निवास है, वे रोहिणीस्वरूपार माताएँ मेरी रक्षा करें। गौएँ मेरे अग्रभागर्ने रहें, गौएँ मेरे पृष्ठभाग में रहें, गौएँ नित्य मेरे चारों ओर वर्तमान रहें और मैं गौओंके मध्य में निवास करूं। चाक तुम्हीं वृषरूपसे सनातन धर्म और भगवान् शिवके वाहन हो, अतः मेरी रक्षा करो।' इस प्रकार आमन्त्रित कर बुद्धिमान् यजमान सभी सामगियोंके साथ एक गौ और नन्दिकेश्वरको गुरुको दान कर दे तथा उन दसों गौओंमेंसे एक-एक तथा हजार गौओंमेंसे एक-एक सौ, पचास-पचास अथवा बीस-बीस गौ प्रत्येक ऋत्विज्को समर्पित कर दे। तत्पश्चात् उनकी आज्ञासे अन्य ब्राह्मणों को दस-दस या पाँच-पाँच गौएँ देनी चाहिये। एक ही गाय बहुतोंको नहीं देनी चाहिये, क्योंकि वह दोषप्रदायिनी हो जाती है। बुद्धिमान् यजमानको आरोग्यवृद्धिके लिये एक-एकको अनेक गौएँ देनी चाहिये। इस प्रकार एक हजार गोदान करनेवाला यजमान एक दिनके लिये पुनः पयोव्रत करे और इस महादानका अनुकीर्तन स्वयं सुनाये अथवा सुने।
यदि उसे विपुल समृद्धिकी इच्छा हो तो उस दिन ब्रह्मचर्य व्रतका पालन करना चाहिये। इस विधिसे जो मनुष्य एक हजार गौओंका दान करता है, वह सभी पापोरो मुक्त होकर सिद्धों एवं चारणोंद्वारा सेवित होता है। वह क्षुद्र घंटियोंसे सुशोभित सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर आरूढ होकर सभी लोकपालोंके लोकोंमें देवताओंद्वारा पूजित होता है। इस गोसहसदानसे पुरक आने इक्कीस पीढियोंका उद्धार कर देता है। गोदानमें गौ, पात्र, काल एवं विधिका विशेषरूपसे विचार करना चाहिये। (अध्याय २५९)