राजा युधिष्ठिरने कहा-अच्युत! आप विस्तारस (अपने जन्म-दिन) जन्माष्टमीव्रतका विधान बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन् ! जब मथुरामें कंस मारा गया, उस समय माता देवकी मुझे अपनी गोदमें लेकर रोने लगी। पिता वसुदेवजी भी मुझे तथा बलदेवजीको आलिङ्गित कर गद्दवाणीसे कहने . लगे-'आज मेरा जन्म सफल हुआ, जो मैं अपने दोनों पुत्रोंको कुशलसे देख रहा हूँ। सौभाग्यसे आज हम सभी एकत्र मिल रहे हैं। हमारे माता- पिताको अति हर्षित देखकर बहुतसे लोग वहाँ एकत्र हुए और मुझसे कहने लगे-भगवन् ! आपने बहुत बड़ा काम किया, जो इस दष्ट कंसको मारा। हम सभी इससे बहुत पीड़ित थे। आप कृपाकर यह बतलायें कि आप माता देवकोके गर्भसे कब आविर्भूत हुए थे? हम सब उस दिन महोत्सब मनाया करेंगे। आपको बार-बार नमस्कार है, हम सब आपकी शरण हैं। आप हम सभीपर प्रसन्न होइये। उस समय पिता वसुदेवजीने भी मुझसे कहा था कि अपना जन्मदिन इन्हें बता दो।'
तब मैंने मधुरानिवासी जनोंको जन्माष्टमीव्रतका रहस्य बतलाया और कहा–'पुरवासियो! आपलोग मेरे जन्मदिनको विश्व में जन्माष्टमीके नामसे प्रसारित करें। प्रत्येक धार्मिक व्यक्तिको जन्माष्टमीका व्रत अवश्य करना चाहिये। जिस समय सिंह राशियर सूर्य और वृषराशिपर चन्द्रमा था, उस भाद्रपद मासको कृष्ण पक्षको अष्टमी तिथिको अर्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्रों मेरा जन्म हुआ: वसुदेवजीके द्वारा माता देवकीके गर्भसे मैने जन्म लिया। यह दिन संसार में जन्माशमी नामले विख्यात होगा। प्रथम यह व्रत मथुरा में प्रसिद्ध हुआ और बादमें सभी लोकों में इसकी प्रसिद्धि हो गयी। इस व्रतके करनेसे संसारमें शान्ति होगी, सुख प्राप्त होगा और प्राणिवर्ग रोगरहित होगा।'
१-मत्स्यपुराणमें बुधका स्वरूप इस प्रकार बतलाया गया है-
पीतमात्याम्बरधरः कर्णिकारसमद्युतिः ।
खड्गचर्मगदापाणिः सिंहस्थो बरदो बुधः ॥
(९४३४)
बुध पीले रंगको पुष्पमाला और वस्त्र धारण करते हैं । उन्को शरीरकानि करके गुप्म-सरीत्यी है। ये चारों हाथों में क्रमश: तलवार, ढाल, गदा और वरदमुद्रा धारण किये रहते हैं तथा सिंहपर सवार होते हैं।
हेमाद्रि व्रतराज तथा जयसिंहकल्पद्रुम आदि निब-धग्रयों में भी भविष्योत्तरपुराणके नाहरो बुधाष्टमीत्रत दिया गया है, पर पाठ-भेद अधिक है। व्रतराजमें युधके पूउनकी तथा अतः। उद्यापन की विधि भी भाषियोत्तरमुराणके नामर्स दो गया है। इस कथामें युद्धि, युक्ति और विमर्श-शक्तिका भी पर्याप्त सम्मिश्रण दीखता है।
२-सिंह राशिगते सूर्ये गगने जलदाकुले ।
गालि भाद्रपदेशागम्या कृष्णपक्षेऽर्धरात्रीः ।
वृषराशिस्थिते चन्द्र नक्षत्रे रोहिणीयुते ॥
उत्तरपर्य । ५.1 १४)
महाराज युधिष्ठिरने कहा-भगवन्! अब आप इस व्रतका विधान बतलायें, जिसके करनेसे आप प्रसन्न होते हैं।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! इस एक ही व्रतके कर लेनेसे सात जन्मके पाप नष्ट हो जाते हैं। व्रतके पहले दिन दन्तधावन आदि करके व्रतका नियम ग्रहण करे। व्रतके दिन मध्याह्नमें स्नानकर माता भगवती देवकीका एक सूतिका- गृह बनाये। उसे पद्मरागमणि और वनमाला* आदिसे सुशोभित करे । गोकुलकी भाँति गोप, गोपी, घण्टा, मृदङ्ग, शङ्ख और माङ्गल्य-कलश आदिसे समन्वित तथा अलंकृत सूतिका गृहके द्वारपर रक्षाके लिये खड्ग, कृष्ण छाग, मुशल आदि रखे। दीवालोंपर स्वस्तिक आदि माङ्गलिक चिह्न बना दे। षष्ठीदेवीकी भी नैवेद्य आदिके साथ स्थापना करे। इस प्रकार यथाशक्ति उस सूतिकागृहको विभूषितकर बीच में पर्यङ्कके ऊपर मुझसहित अर्धसुप्तावस्थाबाली, तपस्विनी माता देवकीकी प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाएँ आठ प्रकारकी होती हैं-स्वर्ण, चाँदी, ताम्र, पीतल, मृत्तिका, काष्ठकी, मणिमयी तथा चित्रगयी। इनमें से किसी भी वस्तुको सर्वलक्षणसम्पन्न प्रतिमा बनाकर स्थापित करे। माता देवकीका स्तनपान करती हुई बालस्वरूप मेरी प्रतिमा उनके समीप पलँगके ऊपर स्थापित करे। एक कन्याके साथ माता यशोदाकी प्रतिमा भी वहाँ स्थापित की जाय। सूतिका-मण्डपके ऊपरकी भित्तियों में देवता, ग्रह, नाग तथा विद्याधर आदिको मूर्तियाँ हाथोंसे पुष्प- वर्षा करते हुए बनाये। वसुदेवजीको भी सूतिकागृहके बाहर सड्ग और दाल धारण किये चित्रित करना चाहिये। वसुदेवजी महर्षि कश्यपके अवतार हैं और देवको माता अदितिकी। बलदेवजी शेषनागके
अवतार हैं, नन्दबाबा दक्षप्रजापतिके, यशोदा दितिकी और गर्गमुनि ब्रह्माजीके अवतार हैं। कंस कालनेमिका अवतार है। कंसके पहरेदारोंको सूतिकागृहके आस- पास निद्रावस्थामें चित्रित करना चाहिये। गौ, हाथी आदि तथा नाचती-गाती हुई अप्सराओं और गन्धर्वोकी प्रतिमा भी बनाये। एक ओर कालिय नागको यमुनाके हदमें स्थापित करे। इस प्रकार अत्यन्त स्मणीय नवसूतिका-गृहमें देवी देवकीका स्थापनकर भक्तिसे गन्ध, पुष्प, अक्षत, धूप, नारियल, दाडिम, ककड़ी, बीजपूर, सुपारी, नारंगी तथा पनस आदि जो फल उस देशमें उस समय प्राप्त हों, उन सबसे पूजनकर माता देवकीकी इस प्रकार प्रार्थना करे-
गायद्धिः किन्नराद्यैः सततपरिवृता वेणुवीणानिनादै-
भृङ्गारादर्शकुम्भप्रमरकृतकरः सेव्यमाना मुनीन्द्रः ।
पर्यङ्के स्वास्तृते या मुदिततरमनाः पुत्रिणी सम्यगास्ते
सा देवी देवमाता जयति सुवदना देवकी कान्तरूपा ॥
(उत्तरपर्व ५५ ४२)
'जिनके चारों ओर किंनर आदि अपने हाथों में वेणु तथा वीणा-वाद्योंके द्वारा स्तुति-गान कर रहे हैं और जो अभिषेक-पात्र, आदर्श, मङ्गलमय कलश तथा चंवर हाथों में लिये श्रेष्ठ मुनिगणोंद्वारा सेवित हैं तथा जो कृष्ण जननी भलीभाँति बिछे हुए पलँगपर विराजमान हैं, उन कमनीय स्वरूपवाली सुवदना देवमाता अदिति स्वरूपा देवी देवकीकी जय हो।'
उस समय यह ध्यान करे कि कमलासना लक्ष्मी देवकीके चरण दवा रही हों। उन देवी लक्ष्मीकी- नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।' इस मन्त्रसे पूजा करें। इसके बाद 'ॐ देवक्यै नमः, ॐ चमदेवाय नमः, ॐ बलभद्राय नमः,
*आजानुलम्बिनी ऋतु-पुष्पोंकी माला और पद्मराग,मुक्त आदि पञ्चमणियोंकी माला तथा तुलसीपत्रमिश्रित विविध पुष्योंकी मालाको भी वनमाला जयमाला और वैजयन्ती माला कहा गया है।
ॐ श्रीकृष्णाय नमः, ॐ सुभाहायै नमः, ॐ नन्दाय नमः तथा ॐ यशोदायै नमः'-इन नाम-मन्त्रोंसे सबका अलग-अलग पूजन करे।
कुछ लोग चन्द्रमाके उदय हो जानेपर चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान कर हरिका ध्यान करते हैं, उन्हें निम्नलिखित मन्त्रोंसे हरिका ध्यान करना चाहिये-
अनघं वामन शौरि वैकुण्ठं पुरुषोत्तमम्।
वासुदेवं हृषीकेशं माधवं मधुसूदनम्॥
वाराहं पुण्डरीकाक्षं नृसिंह ब्राह्मणप्रियम्।
दामोदरं पद्मनाभं केशवं गरुडध्वजम्॥
गोविन्दमच्युतं कृष्णमनन्तमपराजितम्।
अधोक्षजं जगद्वीजं सर्गस्थित्यन्तकारणम्॥
अनादिनिधनं विष्णु त्रैलोक्येर्श त्रिविक्रमम्।
नारायणं चतुर्बाहुं शङ्खचक्रगदाधरम् ।।
पीताम्बरधरं नित्यं वनमालाविभूषितम्।
श्रीवत्साहू जगत्सेतुं श्रीधरं श्रीपति हरिम् ।
(उत्तर पर्व ५५ । ४६ ५०)
-इन मन्त्रोंसे भगवान श्रीहरिका ध्यान करके 'योगेश्वराय योगसम्भवाय योगपतये गोविन्दाय नमो नमः' इस मन्त्रसे प्रतिमाको स्नान कराना चाहिये। अनन्तर 'यज्ञेश्वराय यज्ञसम्भवाय यज्ञपतये गोविन्दाय नमो नमः' - इस मन्त्रसे अनुलेपन, अह्म, धूप, दीप आदि अर्पण करे। तदनन्तर विश्वाय विश्वेश्वराय विश्वसम्भवाय विश्वपतये गोविन्दाय नमो नमः।' इस मन्त्रसे नैवेद्य निवेदित करे। दीप अर्पण करनेका मन्त्र इस प्रकार है-'धर्मेश्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नमः।
इस प्रकार वेदीके ऊपर रोहिणीसहित चन्द्रमा, वसुदेव, देवकी, नन्द, यशोदा और बलदेवजीका पूजन करे, इससे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। चन्द्रोदयके समय इस मन्त्रसे चन्द्रमाको अर्घ्य प्रदान करे-
क्षीरोदार्णवसम्भूत अभिनेत्रसमुखवा
गृहाणाध्य शशान्दो रोहिण्या सहितो मम॥
(उत्तरपर्ष ५५ ॥ ५४)
आधी रातको गुड़ और घीसे वसोर्धाराकी आहुति देकर षष्ठीदेवीकी पूजा करे। उसी क्षण नामकरण आदि संस्कार भी करने चाहिये। नवमीके दिन प्रात:काल मेरे ही समान भगवतीका भी उत्सव करना चाहिये। इसके अनन्तर ब्राह्मणों को भोजन कराकर 'कृष्णो मे प्रीयताम्' कहकर यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये और यह मन्त्र भी पढ़ना चाहिये-
यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत् ।
भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ।।
(उत्तरपर्व ५५।६०)
इसके बाद ब्राह्मणोंको बिदा करे और ब्राह्मण कहे-'शान्तिरस्तु शिवं वास्तु ।'
धर्मनन्दन! इस प्रकार जो मेरा भक्त पुरुष अथवा नारी देवी देवकीके इस महोत्सवको प्रतिवर्ष करता है, वह पुत्र, संतान, आरोग्य, धन-धान्य, सद्गृह, दीर्घ आयुष्य और राज्य तथा सभी मनोरथोंको प्राप्त करता है। जिस देशमें यह उत्सव किया जाता है, वहाँ जन्म-मरण, आवागमनको. व्याधि, अवृष्टि तथा ईति-भीति आदिका कभी भय नहीं रहता। मेघ, समयपर वर्षा करते हैं। पाण्डुपुत्र! जिस घरमें यह देवकी-व्रत किया जाता है, वहाँ अकालमृत्यु नहीं होती और न गर्भपात होता है तथा वैधव्य, दीर्भाग्य एवं कलह नहीं होता। जो एक बार भी इस व्रतको करता है, वह विष्णुलोकको प्राप्त होता है। इस व्रतके । करनेवाले संसारके सभी सुखोंको भोगकर अन्तमें विष्णुलोकमें निवास करते हैं। (अध्याय ५५)