राजा युधिष्ठिरने कहा-भगवन्! अब आप सौभाग्य एवं आरोग्य प्रदायक, शत्रुविनाशक तथा भुक्ति-गुक्ति प्रदायक कोई व्रत बतलाइये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज ! बहुत पहले की बात है, असुरसंहारक भगवान् शंकरने अनेक कथाओंके प्रसंगमें पार्वतीजीसे भगवती ललिताको आराधनाको जो विधि बतलायो थी, उसी व्रतका मै वर्णन कर रहा है, यह व्रत सम्पूर्ण पापोका नाश करनेवाला तथा नारियोंके लिये अत्यन्त उत्तम है, इसे आप सावधान होकर सुनें-
वैशाख, भाद्रपद जाधवा मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको श्वेत सरसोंका उबटन लगाकर स्नान करे । गोरोचन, मोथा, गोमूत्र, दही, गोमय और चन्दन-इन सबको मिलाकर मस्तकमें तिलक करे, क्योंकि यह तिलक सौभाग्य तथा आरोग्यको देनेवाला है एवं भगवती ललिताको बहुत प्रिय है। प्रत्येक मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको सीभाग्यवती स्त्रो रक्तवस्त्र, विधवा मेरा आदिसे रंगा वस्त्र और कुमारी शुक्ल वस्त्र धारणकर पूजा करे। भगवती ललिताको पक्षाच्या अथवा केवल दुग्धसे मान कराकर मधु और चन्दन पुष्यमिधा जलस खान कराना चाहिये। स्रानके अनन्तर थे। पुष्य, अनेक प्रकार के फल, धनिया श्वेत जीरा नमक, गुड़, दूध तथा घीका नैवेद्य अर्पण कर श्वेत अक्षत तथा तिलसे ललितादेवीकी अर्चना करे। प्रत्येक शुक्ल पक्षमें तृतीया तिथिको देवीकी अर्चना करे।
प्रत्येक शुक्ल पक्षमें तृतीया तिथिको देवीकी मूर्तिके चरणसे लेकर मस्तकपर्यन्त पूजन करनेका विधान इस प्रकार है-'वरदायै नमः' कहकर दोनों चरणोंकी, 'श्रियै नमः' कहकर दोनों टखनोंकी, 'अशोकायै नमः' कहकर दोनों पिण्डलियोंकी, भवान्यै नमः' कहकर घुटनोंकी, 'मङ्गलकारिण्यै नमः' कहकर ऊरुओंकी, 'कामदेव्यै नमः' कहकर कटिकी, 'पद्मोद्भवायै नमः' कहकर पेटकी, 'कामश्रियै नर्मः' कहकर वक्षःस्थलकी, 'सौभाग्यवासिन्यै नमः' कहकर हाथोंकी, 'शशिमुखश्रियै नमः कहकर बाहुओंकी, 'कन्दर्पवासिन्यै नमः' कहकर मुखकी, 'पार्वत्यै नमः' कहकर मुसकानकी, 'गौर्यै नमः' कहकर नासिकाकी, 'सुनेत्रायै नमः' कहकर नेत्रोंकी, 'तुष्टये नमः' कहकर ललाटकी, 'कात्यायन्यै नमः' कहकर उनके मस्तककी पूजा करे। तदनन्तर गौर्यै नमः', 'सृष्टौ नमः', 'कान्त्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'रम्भायै नमः', 'ललितायै नमः' तथा 'वासुदेव्यै नमः कहकर देवीके चरणों में बार-बार नमस्कार करे। इसी प्रकार विधिपूर्वक पूजाकर मूर्तिके आगे कुंकुमसे कर्णिकासहित द्वादश दलयुक्त कमल बनाये। उसके पूर्वभागमें गौरी, अग्निकोणमें अपर्णा, दक्षिणमें भवानी, नैऋत्यमें रुद्राणी, पश्चिममें सौम्या, वायव्यमें मदनवासिनी, उत्तरमें पाटला तथा ईशानकोणमें उमाकी स्थापना करे। मध्यमें लक्ष्मी, स्वाहा, स्वधा, तुष्टि, मङ्गला, कुमुदा, सती तथा रुद्राणीकी स्थापना कर कर्णिकाके ऊपर भगवती ललिताकी स्थापना करे। तत्पशात् गीत और मालिक बाधोंका आयोजन कर घेत पुष्प एक बात अर्चना कर उन्हें नमस्कार करे। फिर लाल वस्त्र रक्त पुष्पोंकी माला और लाल अङ्गरागसे सुषासिनी स्त्रियोंका पूजन करे तथा उनके सिर (माँग) में सिंदूर और केसर लगाये, क्योंकि सिंदूर और केसर सतीदेवीको सदा अभीष्ट है।
भाद्रपद मासमें उत्पल (नील कमल)-से, आश्विनमें बन्धुजीव (गुलदुपहरिया)-से, कार्तिकमें कमलसे, मार्गशीर्षमें कुन्द-पुष्पसे, पौषमें कुंकुमसे, माघमें सिंदुवार (निर्गुडी)-से, फाल्गुनमें मालतीसे, चैत्रमें मल्लिका तथा अशोकसे, वैशाखमें गन्धपाटल (गुलाब)-से, ज्येष्ठमें कमल और मन्दारसे, आषाढ़में चम्पक और कमलसे तथा श्रावणमें कदम्ब और मालतीके पुष्पोंसे उमादेवीकी पूजा करनी चाहिये। भाद्रपदसे लेकर श्रावण आदि बारह महीनोंमें क्रमशः गोमूत्र, गोमय, दूध, दही, घी, कुशोदक, बिल्वपत्र, मदार-पुष्प, गोशृङ्गोदक, पञ्चगव्य और बेलका नैवेद्य अर्पण करे।
प्रत्येक पक्षकी तृतीयामें ब्राह्मण-दम्पतिको निमन्त्रितकर उनमें शिव-पार्वतीको भावना कर भोजन कराये तथा वस्त्र, माला, चन्दन आदिसे उनकी पूजा करे । पुरुषको दो पीताम्बर तथा स्त्रीको पीली साड़ियाँ प्रदान करे। फिर ब्राह्मणी स्त्रीको सौभाग्याष्टक-पदार्थ तथा ब्राहाणको फल और सुवर्णनिर्मित कमल देकर इस प्रकार प्रार्थना करे-
यथा न देवि देवेशस्त्वां परित्यज्य गच्छति।
तथा मां सम्परित्यज्य पतिर्नान्यत्र गच्छतु।
(उत्तरपर्व २६।३०)
'देवि! जिस प्रकार देवाधिदेव भगवान् महादेव आपको छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाते, उसी प्रकार मेरे भी पतिदेव मुझे छोड़कर कहीं न जाय।'
पुनः कुमुदा, विमला, अनन्ता, भवानी, सुधा, शिवा, ललिता, कमला, गौरी, सती, राम्भा और पार्वती-इन नामोंका उच्चारण करके प्रार्थना करे कि आप क्रमश: भाद्रपद आदि मासोंमें प्रसन्न हों। व्रतकी समातिमें सुवर्णनिर्मित कमलसहित शय्या-दान करे और चौबीस अथवा बारह द्विज- दम्पतियोंकी पूजा करे। प्रत्येक मासमें ब्राह्मण- दम्पतियोंकी पूजा विधिपूर्वक करे। अपने पूज्य गुरुदेवकी भी पूजा करे।
जो इस अनन्त-तृतीया-व्रतका विधिपूर्वक पालन करता है, वह सौ कल्पोंसे भी अधिक समयतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। निर्धन पुरुष भी यदि तीन वर्षांतक उपवास कर पुष्प और मन्त्र आदिके द्वारा इस व्रतका अनुष्ठान करता है तो उसे भी यही फल प्रास होता है। सधवा स्त्री, विधवा अथवा कुमारी जो कोई भी इस व्रतका पालन करती है, वह भी गौरीकी कृपासे उस फलको प्राप्त कर लेती है। जो इस व्रतके माहात्म्यको पढ़ता अथवा सुनता है, वह भी उत्तम लोकोंको प्राप्त करता है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! अब एक व्रत और बता रहा हूँ, उसका नाम है- रसकल्याणिनी- तृतीया। यह पापोंका नाश करनेवाला है। यह व्रत माघ मासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको किया जाता है। उस दिन प्रात:काल गो-दुग्ध और तिल मिश्रित जलसे स्नान करे। फिर देवीको मूर्तिको मधु और गन्नेके रससे स्नान कराये तथा जाती-पुष्पों एवं कुंकुमसे अर्चना करे। अनन्तर पहले दक्षिणाङ्गकी पूजा करे तब वामाङ्गको। अङ्ग पूजा इस प्रकार करे–'ललितायै नमः' कहकर दोनों चरणों तथा दोनों रखनोंकी, 'सत्यै नमः कहकर पिण्डलियों और घुटनोंकी, 'श्रियै नमः कहकर ऊरूओंकी, 'मदालसायै नमः' कहकर कति-प्रदेशकी, 'मदनायै नमः' कहकर उदरकी, 'मदनवासिन्यै नमः कहकर दोनों स्तनों की, 'कुमुदायै नमः' कहकर गरदनको. 'माधव्यै नमः' कहकर भुजाओको तथा भुजाके अग्रभागको, 'कमलायै नमः' कहकर उपस्थकी, 'रुद्राण्यै नमः' कहकर और ललाटकी, 'शंकरायै नमः' कहकर पलकोंकी, 'विश्नवासिन्यै नमः' कहकर मुकुटकी, 'कान्त्यै नमः' कहकर केशपाशकी, 'चक्रावधारिण्यै नमः' कहकर नेत्रोंकी, 'पुष्टयै नमः' कहकर मुखकी, 'उत्कण्ठिन्यै नमः' कहकर कण्ठकी 'अनन्तायै नमः' कहकर दोनों कन्धोंकी, 'रम्भायै नमः' कहकर वाम बाहुकी, 'विशोकायै नमः' कहकर दक्षिण बाहुकी, 'मन्मथादित्यै नमः' कहकर हृदयकी पूजा करे, फिर 'पाटलायै नमः' कहकर उन्हें बार-बार नमस्कार करे।
इस प्रकार प्रार्थना कर ब्राह्मण-दम्पतिकी गन्ध-माल्यादिसे पूजा कर स्वर्णकमलसहित जलपूर्ण घट प्रदान करे। इसी विधिसे प्रत्येक मासमें पूजन करे और माघ आदि महीनों में क्रमश: लवण, गुड़, तेल (राई), मधु, पानक (एक प्रकारका पेय पदार्थ या ताम्बूल), जीरा, दूध, दही, घी, शाक, धनिया और शर्कराका त्याग करे। पूर्वकथित पदार्थोको उन-उन मासोंमें नहीं खाना चाहिये। प्रत्येक मासमें व्रतको समाप्तिपर करवेके ऊपर सफेद चावल, गोझिया, मधु, पूरी, घेवर (सेवई), मण्डक (पिष्टक), दूध, शाक, दही, छ: प्रकारका अन्न, भिंडी तथा शाकर्तिक रखकर ब्राहाणको दान करना चाहिये। माघ यासमें पूजाके अन्तमें 'कुमुदा प्रीयताम्' यह कहना चाहिये। इसी प्रकार फाल्गुन आदि महीनों में 'माधवी, गौरी, राभा, भद्रा, जया, शिवा, उमा, शची, सती, मङ्गला तथा रतिलालसा' का नाम लेकर 'प्रीयताम्' ऐसा कहे। सभी मासोंके व्रतमें पञ्चगव्यका प्राशन करे और उपवास करे। तदनन्तर माघ मास आनेपर करकपात्रके ऊपर पशरत्रसे युक्त अङ्गुछमात्रकी पार्वतीको स्वर्णनिर्मित मृतिकी स्थापना करे। वस्त्र, आभूषण और अलंकारसे उसे सुशोभित कर एक मैल और एक गाय 'भवानी प्रीयताम्' यह कहकर ब्राह्मणको प्रदान करे। इस विधिके अनुसार व्रत करनेवाला सम्पूर्ण पापोंसे उसी क्षण मुक्त हो जाता है और हजार वर्षातक दुःखी नहीं होता। इस व्रतके करनेसे हजारों अग्रिष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त होता है। कुमारी, सधवा, विधवा या दुर्भगा जो भी हो, वह इस व्रतके करनेपर गौरीलोकमें पूजित होती है। इस विधानको सुनने या इस व्रतको करनेके लिये औरोंको उपदेश देनेसे भी सभी पापोंसे छुटकारा मिलता है और वह पार्वतीके लोकमें निवास करता है। (अध्याय २६)