भविष्य महा पुराण

भक्तोंसहित चैतन्यमहाप्रभुकी जगन्नाथपुरी-यात्रा एवं साक्षात् भगवान् से वार्तालाप

सूतजी बोले- शौनक ! शिवभक्तिपरायण शुद्धात्मा भट्टोजिदीक्षितने श्रीमहाप्रभु कृष्णचैतन्यके पास आकर उनको नमस्कारकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया और उन्होंने वेदके तृतीय अङ्ग व्याकरण, जो पाणिनिसे निर्मित हो चुका था, उसकी प्रक्रियात्मक व्याख्या की और फिर उनकी आज्ञासे सिद्धान्तकौमुदीका निर्माण कर वहीं निवास किया। सूर्यपरायण वराहमिहिर नामके विद्वान् महाप्रभु चैतन्यको बाईस वर्षको अवस्थामें उनके समीप आये और उनके शिष्य हो गये। उनकी आज्ञासे इन्होंने अनेकों ज्योतिष ग्रन्थोंका निर्माण किया और वहीं रहने लगे। शिवभक्तिपरायण छन्दःशास्त्रके रचयिता वाणीभूषणने तेईस वर्षको अवस्थावाले कृष्णचैतन्यले पास आकर उनके शिष्य होकर वहाँ निवास किया और अपने नामसे छन्दःशास्त्रका निर्माण किया तथा उन्होंने परम श्रेष्ठ राधाकृष्याका जप करने हुए आनन्दमय जीवन यापन किया।

सूतजी पुनः बोले- मुने। ब्रह्मभक्तिपरायण धन्वन्तरि नामके एक ब्राह्मण थे। उन्होंने कृष्णचैतन्यके पास आकर उनका शिष्यत्व स्वीकार किया और वहीं रहकर कल्पवेदस्वरूप वेदाङ्गको

१. वराहमिहिर विक्रमादित्यले दयारो थे और उनके प्रन्यावर स्थल भट्ट आदिको प्राचीन टीकाई हैं। महाप्रभु बैतन्यका प्रायः सभर चादरों शती है। अतः यहाँ किसी अन्य विशिष्ट ज्योतिबाचे भाव निकालने चाहिये, जो वाहमिहिरक सिद्धान्तों को मानते हो।

२-धन्तारिक सम्बन्धमें भी अराहमिहिर जमा हो समझना चाहिये, क्योंकि ये भी पूर्ववर्ती है।

रचना की। सुश्रुतके अतिरिक्त इनके और भी अनेक शिष्य हुए।

इसी प्रकार बौद्धमार्गपरायण जयदेव नामक ब्राह्मण पचीस वर्षकी अवस्थावाले कृष्णचैतन्यके समीप आये। उनसे कृष्ण चैतन्यने कहा-आपके परम उपास्य गुरु उड्देश (उड़ीसा)-निवासी जगन्नाथ हैं। अतः मुझे भी शि?के साथ वहीं जाना चाहिये।

यह सुनकर कृष्णचैतन्यके भक्तोंने अपने-अपने शिष्योंको बुलाकर उनके पीछे-पीछे जगन्नाथ- क्षेत्र (उड़ीसा)-की यात्रा की। निधियाँ तथा सभी सिद्धियाँ भी उनकी सेवाके लिये उपस्थित हुई। शैव और शाक्तोंके साथ दस हजार वैष्णयोंने महाप्रभु कृष्णचैतन्यको आगे कर जगन्नाथपुरीकी ओर प्रस्थान किया। उनके आगमनको देखकर भगवान जगन्नाथ मुनिवेशमें एक ब्राह्मणका रूप धारण कर जहाँ महाप्रभु आदि थे वहाँ आये। कृष्णचैतन्यने उनको देखकर नमस्कार कर कहा- 'इस भयानक कलियुगमें आप किस मतको उचित समझते हैं, मुझे कृपापूर्वक बतायें। मैं उसे तत्त्वतः सुनना चाहता हूँ।' यह सुनकर स्वयं जगन्नाथ भगवान्ने लोक-कल्याणके लिये इस प्रकार कहा-'काश्यपसे शासित मिल देशमें उत्पन्न म्लेच्छोंने सुसंस्कृत हो ब्राह्मणवर्णको प्राप्त किया है। उन्होंने शिखा-सूत्र धारणकर उत्तम श्रेष्ठ वेदका अध्ययन कर देवाधिदेव शचीपतिकी यज्ञोंद्वारा पूजा की है। इससे दुःखी हो भगवान् इन्द्र श्वेतद्वीपमें मेरी शरण में आये और देवताओंके मङ्गलके लिये उन्होंने स्तुतिद्वारा मुझे उबुद्ध किया। तब मैंने संसारके कल्याणके लिये कलियुगमें अवतीर्ण होनेका वर प्रदान किया और इन्द्रादिको भी द्वादश आदित्यके रूपमें पृथ्वीपर अवतरित होनेके लिये कहा। मैं सिन्धुतटमें संसारकी हितकामनासे दारुपाषाणरूपमें अवतीर्ण हुआ हूँ। स्वर्गलोकसे आये हुए इन्द्रद्युम्न नामक राजाद्वारा रचित मन्दिरमें मैं प्रतिष्ठित होऊँगा। महाप्रभु चैतन्य यहाँके प्रसादको महिमा बतलायेंगे। यह स्थान सभी वाञ्छित फलोंको देनेवाला एवं मोक्षप्रद है। यहाँ भक्तिकी महिमा अधिक है वर्गोंका भेदभाव भक्तिके प्रवाहसे दिखायी नहीं देता। एक योजनपर्यन्त यहाँ किसी व्रत आदिकी व्यवस्था नहीं है। मैं सम्पूर्ण पापोंका विनाशक हूँ और कलिकालमें मेरा दर्शन करके मनुष्य शुद्ध हो जायगा।' (अध्याय २०)