भविष्य महा पुराण

अपराधशतशमन-व्रत

महर्षि वसिहजीने राजा प्रवाकुसे कहा- राजन्! अब आपको एक व्रत बतला रहा हूँ, जिससे महाफलकी प्राप्ति होती है और सैकड़ों दोष-पापोंका शमन हो जाता है।

राजा इक्ष्वाकुने पूछा-ब्रह्मन्! मुख्यरूपसे सौ अपराध या दोष-पाप कौन-कौन हैं और वह व्रत कौन-सा है, जिसके अनुष्ठानमात्रसे उनकी शान्ति हो जाती है। इस व्रतमें किस देवताकी पूजा होती है और किस समय यह व्रत किया जाता है, आप बतलानेकी कृपा करें।

महर्षि वसिष्ठ बोले–महाबाहो! अपराधशतशमन-व्रतको सुनो, जिसका अनुष्ठान करनेमात्रसे मनुष्यको सभी प्रकारकी कामनाएँ और मुक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। कृत-अकृत सभी गुरुतर पाप रुईकी राशिके समान जलकर भस्म हो जाते हैं। राजम् ! अब आप इन अपराधोंके नाम और लक्षणको सुनें-अनामित्व-चारों आश्रमोंसे बाहर रहकर स्वच्छन्द नास्तिकवृत्ति अपनाना, अनग्रिता-अग्निहोत्र, हवन आदि सभी कार्योंका परित्याग, व्रतहीनता-कोई भी सत्य, ब्रह्मचर्य और एकादशी आदि व्रतोंका पालन न करना, अदातृत्व-कभी भी कुछ भी अन्न, धन या आशीर्वाद आदि न देना, अशौच, निर्दयता, लोभ, क्षमाशून्यता, जनपीड़ा, प्रपञ्च में पड़ना, अमङ्गल, व्रतभङ्ग, नास्तिकता, वेदनिन्दा, कठोरता, असत्यता, हिंसा, चोरी, इन्द्रिय-परायणता, मनको वशमें न रखना, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, दम्भ, शठता, धूर्तता, कटुभाषण, प्रमाद, स्त्री, पुत्र, माता आदिका पालन न करना, अपूज्यकी पूजा करना, श्राद्धका त्याग, जप न करना, बलिवैश्वदेव तथा पायज्ञका त्याग, संध्या, तर्पण, हवन आदि नित्यक्रमोंका परित्याग, अग्निका बुझाना, ऋतुकालके बिना ही स्त्री-सम्पर्क, पर्व आदिमें स्त्री-सहवास, चुगली, दूसरेकी स्त्रीके साथ गमन, वेश्यागामिता, अपात्रको दान देना, अल्पदान, अन्त्यजसक, माता-पिताकी सेवा न करना, सबसे झगड़ा करना, पुराण और स्मृतियोंका अनादर करना, अभक्ष्य-भक्षण, स्वामि- द्रोह, बिना विचारे कार्य करना, कृषि-कार्य करना, भार्यासंग्रह, मनपर विजय न प्राप्त करना, विद्याकी विस्मृति, शास्त्रका त्याग करना, ऋण लेकर वापस न करना, चित्रकर्म करना, सदा कामनाओंका दास होना, भार्या, पुत्र एवं कन्या आदिका विक्रय करना, पशु-मैथुन, इन्धनार्थ वृक्ष काटना, बिलोंमें पानी आदि डालना, तडागादिके जलको दूषित करना, विद्याका विक्रय, स्ववृत्तिका परित्याग, याचना, कुमित्रता, स्त्री-वध, गो-वध, मित्र-वध, भ्रूण हत्या, पौरोहित्य, दूसरेका अन्न और शूद्रके अन्नको ग्रहण करना, शूद्रका अग्निकर्म सम्पन्न करना, विधिविहीन कर्मका निष्पादन, कुपुत्रता, विद्वान् होनेपर याचना करना, वाचालता, प्रतिग्रह लेना, श्रौत-संस्कारहीनता, आर्त व्यक्तिका दुःख दूर न करना, ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्णचोरी, गुरुपत्नीगमन तथा पातकियोंके साथ सम्बन्ध स्थापित करना-ये अपराध हैं। अन्य तत्ववेत्ताओंने भी विविध प्रकारके अपराधोंको कहा है।

अनघ ! भगवान् सत्येशकी पूजा करनेसे तत्क्षण सभी प्रकारके अपराध नष्ट हो जाते हैं। मनुष्योंद्वारा व्रत और पूजन करनेसे भगवान् स्वयं उसके वशमें हो जाते हैं। ये जगत्पति भगवान् विष्णु लक्ष्मीके साथ सत्यरूपी ध्वजके ऊपर स्थित रहते हैं। इनके पूर्व, वामदेव, दक्षिणमें नृसिंहभगवान पश्चिममें भगवान् कपिल, उत्तरमें वराह तथा ऊर्ध्वमें अच्युत स्थित रहते हैं। इन्हें ही ब्रह्मपञ्चक जानना चाहिये। ये ही सत्येश हैं, इन्होंकी सदैव पूजा करनी चाहिये। ये सत्येशभगवान् पद्य, कौमोदकी गदा, पाचजन्य शह तथा सुदर्शन चक्र धारण किये रहते हैं। इनके चरणकमलके अप्रभागसे पवित्र गङ्गाका प्रादुर्भाव हुआ है। इनकी आठ शक्तियाँ हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं-जया, विजया, जयन्ती, पापनाशिनी, उन्मीलनी, वजुली, त्रिस्पृशा और विवर्धना। वे भगवान् हरि शुक्लाम्बरधारी, सौम्य, प्रसत्रमुख, सभी आभरणेसे युक्त, शोभायमान और भूक्ति-मुक्तिप्रदाता हैं।

राजन्!उनकी जिस विधिसे प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिये, उसे आप सुनें। मार्गशीर्ष आदि बारह मासोंमें द्वादशी, अमावास्या अथवा अष्टमीके दिन शुक्ल या कृष्ण पक्षका विचार किये बिना शुद्ध होकर उपवासपूर्वक व्रत करना चाहिये। शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षोंमें जनार्दनको पूजा करनेका संकल्प लेना चाहिये। इस प्रकार नियम ग्रहण करके दन्तधावनपूर्वक तडाग, पुष्कर अथवा घरपर ही स्नानकर नित्य-नैमित्तिक कर्म करने चाहिये। एक पल सुवर्णके मानसे लक्ष्मौसहित सत्येशकी प्रतिमा बनवाये जो अष्टशक्तियों से समन्वित पद्मासनपर स्थित हो। दुग्धसे पूरित कुम्भपर स्थित सुवर्ण-पाके ऊपर उस प्रतिमाको स्थापित करे। उस पाकी कर्णिकाओंपर देवाधिदेवकी आठ शक्तियोंकी पूजा करे। अनन्तर भगवान् सत्येश (विष्णु) और सत्या (लक्ष्मी)-को विधिवत्  विविध पाद्यादि उपचारोंसे पूजा करे। अनन्तर इस प्रकार प्रार्थना करे-

कृष्ण कृष्ण प्रभो राम राम कृष्ण विभो हरे।

त्राहि मां सर्वदुःखेभ्यो रमया सह माधव ।।

पूजा चेयं मया दत्ता पितामह जगदूरो।

गृहाण जगदीशान नारायण नमोऽस्तु ते॥

(उत्तरपर्व १४६४८-४९)

अनन्तर अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणको दान देकर व्रतका समापन करना चाहिये। इस व्रतको दोनों पक्षोंमें करे और वर्ष पूरा होनेपर उद्यापन करे। ब्राह्मणसे प्रार्थना करे कि हे ब्राह्मण देवता! मेरे सभी पाप दूर हो जायें। ब्राह्मण कहें-'आपके सभी पाप एवं दु:ख दूर हो जायें।' तदनन्तर ब्राह्मणको वह मूर्ति समर्पित कर समापन करना चाहिये।

राजन्! ब्रह्माजीने कहा है कि इस व्रतको करनेसे अनन्त फलकी प्राप्ति होती है। जो फल सभी वेदोंके अध्ययनसे और सभी तीर्थों में भ्रमण करनेसे प्राप्त होता है, उससे कोटिगुना फल इस व्रतके आचरणसे होता है और व्रतीको इस लोकमें धन, धान्य, पुत्र, पौत्र, मित्र तथा सुखकी प्राप्ति होती है। व्रतको करनेवाले व्यक्तिको विद्या और आरोग्यकी भी प्राप्ति होती है तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्ति होती है। इसमें कोई संदेह नहीं है। जो इसको पढ़ता अथवा सुनता है, उसके भी सभी पाप दूर हो जाते हैं। (अध्याय १४६)