भविष्य महा पुराण

सूर्यदेवके रथ एवं उसके साथ भ्रमण करनेवाले देवता-नाग आदिका वर्णन

राजा शतानीकने पूछा-मुने! सूर्यनारायणकी। रथयात्रा किस विधानसे करनी चाहिये। रथ कैसा बनाना चाहिये? इस रधयात्राका प्रचलन मृत्युलोकमें किसके द्वारा हुआ? इन सब बातोंको आप कृपाकर मुझे बतलायें।

सुमन्तु मुनि बोले-राजन् ! किसी समय सुमेरु हु पर्वतपर समासीन भगवान् रुद्रने ब्रह्माजीसे पूछा-स 'ब्रह्मन् ! इस लोकको प्रकाशित करनेवाले भगवान् सूर्य किस प्रकारके रथमें बैठकर भ्रमण करते हैं, त इसे आप बतायें।'

ब्रह्माजीने कहा-त्रिलोचन ! सूर्यनारायण जिस  दो प्रकारके रथमें बैठकर भ्रमण करते हैं, उसका मैं क वर्णन करता हूँ, आप सानन्द सुनें।

एक चक्र, तीन नाभि, पाँच अरे तथा स्वर्णमय अति कान्तिमान् आठ बन्धोंसे युक्त एवं एक

नेमिसे सुसज्जित-इस प्रकारके दस हजार योजन लम्बे-चौड़े अतिशय प्रकाशमान स्वर्ण-रथमें विराजमान भगवान् सूर्य विचरण करते रहते हैं। रथके उपस्थसे ईषा दण्ड तीन गुना अधिक है। यहीं उनके सारथि अरुण बैठते हैं। इनके रथका जुआ सोनेका बना हुआ है। रथों वायुके समान वेगवान् छन्दरूपी सात घोड़े जुते रहते हैं। संवत्सरमें जितने अवयव होते हैं, वे ही रथके अङ्ग हैं। तीनों काल चक्रकी तीन नाभियाँ हैं। पाँच ऋतुएँ अरे हैं, छठी स्तु नेमि है। दक्षिण और उत्तर-'ये दो अयन रथके दोनों भाग हैं। मुहूर्त रथके इशु कला, शम्य, काष्ठाएँ रथके कोण, क्षण अक्षदण्ड, निमेष रथके कर्ण, ईषा दाह लव, रात्रि वरूध, धर्म रथका ध्वज, अर्थ और काम धुरीका अग्रभाग, गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप, पंक्ति, बृहती तथा उष्णिक्-

*रथससमीके विषयमें उतरनाकर, व्रतकल्पद्रुम, वाराज आदिके अतिरिक्त पदापुराण एवं वायुपुराणके माघ-माहात्म्यमें बहुत विस्तारसे व्रत-विधानका निरूपण हुआ है और कुछ पञ्चामॉमें भी इसी दिन भगवान् सूर्यके रमपर चढ़कर आकाशकी प्रथम यात्रा करनेका उल्लेख किया गया है। जैसे रामनवमीके दिन भगवान् रामका, जन्माष्टमीके दिन भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य मानकर उत्सव किया जाता है, जैसे हो रथसप्तमौके दिन भगवान् सूर्यका प्राकट्य मानकर उनके लिये व्रत-उपवासके साथ विशेष अर्चा सम्पन्न की जाती है।

ये सात छन्द सात अश्व हैं। घुरीपर चक्र घूमता है। इस प्रकारके रथमें बैठकर भगवान् सूर्य निरन्तर आकाशमें भ्रमण करते रहते हैं।

देव, ऋषि, गन्धर्व, अप्सय, नाग, ग्रामणी और राक्षस सूर्यके रथके साथ घूमते रहते हैं और दो- दो मासोंके बाद इनमें परिवर्तन हो जाता है।

धाता और अर्थमा-ये दो आदित्य, पुलस्त्य तथा पुलह नामक दो ऋषि, खण्डक, वासुकि नामक दो नाग, तुम्युरु और नारद ये दो गन्धर्व, क्रतुस्थला तथा पुजिकस्थला ये अप्सराएँ, रथकृत्स्न तथा रथीजा ये दो यक्ष, हेति तथा प्रति नामके दो राक्षस ये क्रमशः चैत्र और वैशाख मासमें रथके साथ चला करते हैं।

मित्र तथा वरुण नामक दो आदित्य, अत्रि तथा वसिष्ठ ये दो ऋषि, तक्षक और अनन्त दो नाग, मेनका तथा सहजन्या ये दो अपारा, हाहा- हूहू दो गन्धर्व, रणस्वान् और रथचित्र ये दो यक्ष, पौरुषेय और बध नामक दो राक्षस क्रमशः ज्येष्ठ तथा आषाढ़ मासमें सूर्यरशके साथ चला करते हैं

श्रावण तथा भाद्रपदमें इन्द्र तथा विवस्वान् नामक दो आदित्य, अगिरा तथा भृगु नामक दो ऋषि, एलापर्ण तथा शङ्खपाल ये दो नाग, प्रस्तीचा और दुंदुका नामक दो अपारा, भानु और दुर्दुर नामक गन्धर्ष, सर्प तथा ब्राह्म नामक दो राक्षस, स्रोत तथा आपूरण नामके दो यक्ष सूर्यरथके साथ चलते रहते हैं।

आश्विन और कार्तिक मासमें पर्जन्य और पूषा नामके दो आदित्य, भारद्वाज और गौतम नामक दो ऋषि, चित्रसेन तथा वसुरुचि नामक दो गन्धर्व, विश्वाचौ तथा घृताची नामको दो अप्सराएं, ऐरावत और धनञ्जय नामक दो नाग एवं सेनजित् तथा सुषेण नामक दो यक्ष, आप एवं वात नामक दो

राक्षस सूर्यरथके साथ चला करते हैं।

मार्गशीर्ष तथा पौष मासमें अंशु तथा भग नामक दो आदित्य, कश्यप और ऋषि, महापद्म और कर्कोटक नामक दो नाग चित्राङ्गद और अरणायु नामक दो गन्धर्व, सह तथा सहस्या नामक दो अप्सराएँ, ताय तथा अरिष्टनेमि नामक यक्ष, आप तथा वात नामक दो राक्षस सूर्यरथके साथ चला करते हैं।

माघ-फाल्गुनमें क्रमशः पूषा तथा जिष्णु नामद दो आदित्य, जमदग्नि और विश्वामित्र नामक दो ऋषि, काद्रवेय और कम्बलाश्वतर ये दो नाग, धृतराष्ट्र तथा सूर्यवर्चा नामक दो गन्धर्व, तिलोत्तमा रम्भा ये दो अप्सराएँ तथा सेनजित् और सत्यजित् नामक दो यक्ष, ब्रह्मोपेत तथा यज्ञोपेत नामक दो राक्षस सूर्यरथके साथ चला करते हैं*।

ब्रह्माजीने कहा- रुद्रदेव! सभी देवताओंने अपने अंशरूपसे विविध अस्त्र-शस्त्रोंको भगवान् सूर्यको रक्षाके लिये उन्हें दिया है। इस प्रकार सभी देवत उनके रथके साथ-साथ भ्रमण करते रहते हैं। ऐसा कोई भी देवता नहीं है जो रथके पीछे न चले। इस सर्वदेवमय सूर्यनारायणके मण्डलको ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मस्वरूप, याज्ञिक यज्ञस्वरूप, भगवदद विष्णुस्वरूप तथा शैव शिवस्वरूप मानते हैं। ये स्थानाभिमानी देवगण अपने तेजसे भगवान् सूर्यको आप्यायित करते रहते हैं। देवता और ऋषि निरन्तर भगवान् सूर्यकी स्तुति करते रहते हैं, गन्धर्वगण गान करते रहते हैं तथा अप्सराएँ रथके आगे नृत्य करती हुई चलती रहती हैं। राक्षस रथके पीछे-पीछे चलते  हैं । साठ हजार बालखिल्य ऋषिगण रथको चारों  ओरसे घेरकर चलते हैं। दिवस्पति और स्वयम्भ रथके आगे, भर्ग दाहिनी ओर, पद्मज बायीं ओर, कुबेर दक्षिण दिशामें, वरुण उत्तर दिशामें, वीतिहोत्र

*ये नाम विष्णु आदि अन्य पुराणोंमे कुछ भेदसे मिलते हैं।

और हरि रथके पीछे रहते हैं। रपके पीठमें पृथ्वी, मध्यमें आकाश, रथकी कान्तिमें स्वर्ग, ध्वजामें | सं दण्ड, ध्वजाग्रमें धर्म, पताका ऋसि-वृद्धि और श्री निवास करती हैं। ध्वजदण्डके ऊपरी भागमें  गरुड तथा उसके ऊपर वरुण स्थित हैं। मैनाक है पर्वत छत्रका दण्ड, हिमाचल छत्र होकर सूर्यके  साथ रहते हैं। इन देवताओंका बल, तप, तेज, योग होऔर तत्त्व जैसा है वैसे ही सूर्यदेव तपते हैं। ये ही  देवगण तपते हैं, बरसते हैं, सृष्टिका पालन-पोषण  करते हैं, जीवोंके अशुभ-कर्मको निवृत्त करते हैं, प्रजाओंको आनन्द देते हैं और सभी प्राणियोंकी व रक्षाके लिये भगवान् सूर्यके साथ भ्रमण करते रहते  हैं। अपनी किरणोंसे चन्द्रमाकी वृद्धि कर सूर्यभगवान्  देवताओंका पोषण करते हैं। शुक्ल पक्षमें सूर्यकिरणोंसे  चन्द्रमाकी क्रमश: वृद्धि होती है और कृष्ण पक्षमें देवगण उसका पान करते हैं। अपनी किरणोंसे अं पृथ्वीका रस-पान कर सूर्यनारायण वृष्टि करते हैं।  इस वृष्टिसे सभी ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं तथा हैं अनेक प्रकारके अन्न भी उत्पन्न होते हैं, जिससे पितरों और मनुष्योंकी तृप्ति होती है।

एक चक्रवाले रथमें भगवान् सूर्यनारायण बैठकर एक अहोरात्रमें सातों द्वीप और समुद्रोंसे युक्त पृथ्वीके चारों ओर भ्रमण करते हैं। एक वर्षमें  ३६० यार भ्रमण करते हैं। इन्द्रकी पुरी अमरावतीमें जब मध्याह्न होता है, तब उस समय यमकी संयमनी पुरीमें सूर्योदय, वरुणकी सुखा नामकी नगरीमें अर्धरात्रि और सोमकी विभा नामको नगरीमें सूर्यास्त होता है। संयमनीमें जब मध्याह होता है, तब सुखामें उदय, अमरावतीमें अर्धरात्रि तथा विभामें सूर्यास्त होता है। सुखामें जब मध्याह्न होता है, उस समय विभामें उदय, अमरावतीमें आधी रात और संयमनीमें सूर्यास्त होता है। विभा नगरीमें जब मध्याह्न होता है, तब अमरावतीमें सूर्योदय, संयमनीमें आधी रात और सुखा नामकी वरुणकी नगरीमें सूर्यास्त होता है। इस प्रकार मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा करते हुए भगवान् सूर्यका उदय और अस्त होता है। प्रभातसे मध्याहृतक सूर्य- किरणोंकी वृद्धि और मध्याह्नसे अस्ततक हास होता है। जहाँ सूर्योदय होता है वह पूर्व दिशा और जहाँ अस्त होता है वह पश्चिम दिशा है। एक मुहूर्तमें भूमिका तीसवाँ भाग सूर्य लाँघ जाते हैं। सूर्यभगवान्के उदय होते ही प्रतिदिन इन्द्र पूजा करते हैं, मध्याह्नमें यमराज, अस्तके समय वरुण और अर्धरात्रिमें सोम पूजन करते हैं।

विष्णु, शिव, रुद्र, ब्रह्मा, अग्नि, वायु, निर्ऋति, ईशान आदि सभी देवगण रात्रिकी समातिपर ब्राह्मवेलामें कल्याणके लिये सदा भगवान् सूर्यकी आराधना करते रहते हैं। (अध्याय ५२-५३)