दिण्डीने ब्रह्माजीसे पूछा-ब्रह्मन्! आपने आदित्य-क्रियायोगको मुझे बतलाया, अब आप यह बतलानेकी कृपा करें कि भगवान् सूर्य उपवाससे कैसे प्रसन्न होते हैं ? उपवास करनेवालोंके लिये क्या-क्या त्याज्य है? आराधनामें क्या-क्या करना चाहिये, इसका आप विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
ब्रह्माजी बोले-दिण्डिन्! भगवान् सूर्य पुष्प आदिद्वारा पूजन करनेसे ही प्रसन्न हो जाते हैं और उत्तम फल देते हैं। पापोंसे रहित होकर सद्गुणोंका आश्रय ग्रहण कर, सभी भोगोंका परित्याग करना ही उपवास कहलाता है। अतः ऐसे उपवाससे क्यों नहीं मनोवाञ्छित फल प्राप्त होगा? एक रात, दो रात, हीन रात या नक्त-व्रत करनेवाला
तुम्हें जो प्रिय हो, उन्हें भक्तिपूर्वक सूर्यनारायणको निवेदित करो। तीर्थके जल, दही, दूध, घृत, शर्करा और शहदसे उन्हें स्रान कराओ। गीत-वाद्य, नृत्य, स्तुति, ब्राह्मण-भोजन, हवन आदिसे भगवान्को प्रसन्न करो, किंतु सभी पूजाएँ भक्तिपूर्वक होनी चाहिये। मैंने भगवान् सूर्यकी आराधना करके ही सृष्टि की है। विष्णु उनके अनुग्रहसे ही जगत् का पालन करते हैं और रुद्रने उनकी प्रसन्नता ही संहारशक्ति प्राप्त की है। ऋषिगण भी उनके ही कृपाप्रसादको प्राप्तकर मन्त्रोंका साक्षात्कार करनेमें समर्थ होते हैं। इसलिये तुम भी पूजन, व्रत, उपवास आदिसे वर्षपर्यन्त भगवान् सूर्यको आराधना करो, जिससे सभी क्लेश दूर हो जायेंगे और तुम शान्ति प्राप्त करोगे?
(अध्याय ६१-६३)
निष्काम होकर उपवासकर मन, वचन और कर्मसे सूर्यनारायणकी आराधना में तत्पर रहे तो ब्रह्मलोकको प्राप्त कर सकता है। यदि साधक किसी कामनासे दत्तचित्त होकर भगवान् सूर्यकी उपासना करता है तो प्रसन्न होकर भगवान् उसकी कामना पूर्ण कर देते हैं। अन्धकारका नाश करनेवाले जगदात्मा सूर्यनारायणकी तन्मयतापूर्वक आराधनाके बिना किसी प्रकार भी सद्गति नहीं मिलती। अत: पुष्प, धूप, चन्दन, नैवेद्य आदिसे भक्तिपूर्वक सूर्यकी पूजा और उनकी प्रसन्नताके लिये उपवास करना चाहिये। उत्तम पुष्पके न मिलनेपर वृक्षों के कोमल पत्ते अथवा दूर्वाङ्करसे पूजन करना चाहिये पुण्य, पत्र, फल, जल जो भी यथाशक्ति मिले, उसे
क्रियायोगका वर्णन सभी पुराणोंमें मिलता है, विशेषरुपसे पद्यपुराणया क्रियायोगसार सहाय है।
उपावृतस्य पापेभ्यो यस्तु वासो गुणैः सह।
उपवासः स विज्ञेयः सर्वभोगविर्जितः (ब्राह्मपर्व ६४।४)
ही भक्तिके साथ भगवान् सूर्यको अर्पण करना चाहिये। इससे भगवान् सूर्यको अतुल तुष्टि प्राप्त होती है। सूर्यनारायणके मन्दिरमें सदा झाड़ देनेपर धूलिमें जितनी कणिकाएँ होती हैं, उतने समयतक सूर्यके समान होकर वह स्वर्गमें रहता है। मन्दिरके छोटे भागका भी मार्जन करनेपर उस दिनके पापसे व्यक्ति मुक्त हो जाता है। जो गोमयसे, मृत्तिका अथवा अन्य धातुओंके चूर्णोसे मन्दिरमें उपलेपन करता है, वह विमानपर चढ़कर सूर्यलोकमें जाता है। मन्दिरमें जलसे छिड़काव करनेवाला वरुणलोकमें निवास करता है। जो लेपन किये हुए मन्दिरमें पुष्प बिखेरता है, वह कश्री दुर्गति नहीं प्राप्त करता । मन्दिरमें दीपक प्रचलित करनेवाला व्यक्ति सभी ऋतुओंमें सुखप्रद सवारी प्राप्त करता है। ध्वजा चढ़ानेवालेके ज्ञात और अज्ञात सभी पाप पताकाके वायुसे हिलनेपर नष्ट हो जाते हैं। गौत, वाद्य और नृत्यके द्वारा मन्दिरमें उत्सव करनेवाला उत्तम विमानमें बैठता है, गन्धर्व और अप्सराएँ उसके आगे गान और नृत्य करती हैं। जो मन्दिरमें पुराणका पाठ करता है, उसे श्रेष्ठ बुद्धिकी प्राप्ति होती है और वह जातिस्मर (सभी जन्मोंकी बात जाननेवाला) हो जाता है। दिण्डिन्! सूर्यको आराधनासे जो चाहो वह प्राप्त कर सकते हो। इनकी आराधनासे कई लोग गन्धर्व, कतिपय विद्याधर, कतिपय देवता बन गये हैं। इन्द्रने इनकी आराधनासे हो इन्द्रपद प्राप्त किया है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थ एवं स्त्रियोंके ये ही उपास्य हैं। जितेन्द्रिय संन्यासी भी इनके अनुग्रहसे हो मुक्तिको प्राप्त करते हैं, क्योंकि ये ही मोक्षके द्वार है। इस तरह सभी वर्ण और आश्रमोंके आश्रय एवं परमगति भगवान् पूर्व ही है।
दिण्डिन्! अब में काम्य उपवास और फल-ससमीका वर्णन करता। फल सहमोका व्रत करनेसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। भाद्रपद मासकी शुक्ला चतुर्थीको अयाचित-व्रत कर पञ्चमीको एक बार भोजन करे, षष्ठीको जितक्रोध, जितेन्द्रिय होकर पूर्ण उपवास करे और भक्तिके साथ सभी सामग्रियोंसे सूर्यनारायणकी पूजा करे। रातमें भगवान् सूर्यक सम्मुख पृथ्वीपर शयन करे। सप्तमीको सूर्यभगवान् का ध्यान करते हुए प्रातः उठकर स्नान-पूजन करे और खजूर, नारियल, आम, मातुलुंग आदि नैवेद्योंका भोग लगाये और ब्राह्मणको दे तथा स्वयं भी प्रसादके रूपमें उन्हें ग्रहण करे। यदि ये फल न मिलें तो शालि (चावल)-का या गेहूँका आटा लेकर उसमें गुड़ मिलाये और घौमें पकाकर उनका ही भगवान् सूर्यको भोग लगाये, अनन्तर हवन कर ब्राह्मण-भोजन कराये। इस प्रकार एक वर्षतक सप्तमीका व्रत कर अन्तमें उद्यापन करे। गोमूत्र, गोमय, गोदुग्ध, दही, घी, कुशका जल, श्वेत मृत्तिका, तिल और सरसोंका उबटन, दूर्वा, मौके सौंगका जल, चमेलीके फूलके रस- इनसे स्नान करे और इनका ही प्राशन करे। ये सभी पापोंका हरण करनेवाले हैं। सभी प्रकारके फल, सस्यसम्पन्न भूमि, धान्ययुक्त भवन, बछड़ेके साथ गौ, विद्रुमके साथ ताम्रपात्र और श्वेत वस्त्र ब्राह्मणोंको दे। जो शक्ति सम्पन्न हो वह चाँदी अथवा आटेके पिष्टक, फल तथा दो वस्त्र दे। सोना, रत्न और वस्त्र आचार्यको दे। ब्राहाणको भोजन कराये। इस प्रकार व्रतको सम्पन्न करे। यह फल-सप्तमीका विधान कहा गया है।
यह अतिशय पुण्यमयी ससमी सभी पापोंका नाश करनेवाली है। इस दिन उपवासकर मनुष्य सूर्यलोकको प्राप्त करता है। वहाँ देव, गन्धर्व और अप्सराओंके साथ पूजित होता है। इस व्रतको जो करता है, वह पाप, दरिद्रता और
सभी प्रकारके दुःखोंसे मुक्त हो जाता है। इस व्रतके करनेसे ब्राह्मण मुक्ति, क्षत्रिय इन्द्रलोक, वैश्य कुबेरलोकमें निवास करता है। शूद्र इस व्रतके करनेसे द्विजत्य प्राप्त कर लेता है। पुत्रहीन पुत्र प्राप्त करता है, दुर्भगा सौभाग्यशालिनी होती है और विधवा नारी अगले जन्ममें वैधव्य प्राप्त नहीं करती। इस फल-ससमीको समस्त वाण्डि पदार्थोंको प्रदान करनेवाली चिन्तामणिके समा समझना चाहिये। इस फल-सप्तमीकी कथा श्रवण अथवा व्रत करनेवालोंकी सभी इच्छा पूर्ण हो जाती हैं। (अध्याय ६४)
Summary of chapter 41 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
The theological heart of the Pratisarga Parva. Bṛhaspati teaches Indra at Prayāga how Sūrya Bhagavān, pleased by lineages of devoted Sūrya worshippers, promised to be born in the Kali Yuga as their great-souled descendants. Dhanvantari was born in Kāśī as the supreme physician of the age; Jayadeva was born in Vaṅgadeśa as the kavi-śiromaṇi whose Gītagovinda brought Rādhā-Kṛṣṇa līlā to the world; Śaṅkarācārya was born from Indra's amśa after Sūrya entered Indra as a flame; Rāmānujācārya was born as a Rudra-amśa on the Godāvarī bank; and Madhvācārya was born from a Sūrya-devotee lineage of the Tuḷu country. Vālmīki and Pāṇini are also placed within this framework of divine appointments. Each birth is narrated not as a natural event but as a targeted divine intervention.