ब्रह्माजी बोले-विष्णो ! प्राचीन कालमें राजा ययातिके कुलमें सत्राजित् नामक एक प्रतापी चक्रवर्ती राजा हुए थे। वे अत्यन्त प्रभावशाली, तेजस्वी, कान्तिमान, क्षमावान्, गुणवान् तथा बलशाली राजा थे और धीरता, गम्भीरता एवं यशसे सम्पन्न थे। उनके विषयों पुराणवेत्ता लोग एक गाथा गाते है-महाबाहु सत्राजित्के इस पृथ्वीपर राज्य करते हुए जहाँसे सूर्य उदित होते और जहाँ अस्त होते हैं, जितनेमें भ्रमण करते हैं, वह सम्पूर्ण क्षेत्र सत्राजित्-क्षेत्र कहलाता है। राजा सत्राजित् सम्पूर्ण रत्नोंसे परिपूर्ण समद्वीपवती पृथ्वीपर धर्मपूर्वक राज्य करते थे। वे सूर्यदेवके परम भक्त थे। उनके ऐश्वर्यको देखकर सभी लोगोंको बड़ा आश्चर्य होता था। उनके राज्यमें सभी व्यक्ति धर्मानुयायी थे। राजा सत्राजित्के चार मन्त्री थे, वे सब अप्रतिहत सामर्थ्यवाले और राजाके स्वाभाविक भक्त थे। भगवान् सूर्यके प्रति उनको अत्यन्त बदा थी और उनकी सामर्थ्यको देखकर न केवल
उनकी प्रजाको आश्चर्य होता था, बल्कि स्वयं राजा भी अपने ऐश्वर्यपर आश्चर्यचकित थे। एक बार उनके मनमें आया कि अगले जन्मोंमें भी मेरा ऐसा ही ऐश्वर्य कैसे बना रहे। यह सोचकर उन्होंने शास्त्र और धर्मके तत्वको जाननेवाले ब्राह्मणोंको बुलाकर उनकी यथोचित भक्तिपूर्वक पूजा कर उन्हें आसनपर बिठलाया और उनसे कहा-'भगवन्! यदि आपलोगोंकी मुझपर कृपा है तो मेरी जिज्ञासाको शान्त करें।'
ब्राह्मणोंने कहा-'महाराज! आप अपना संदेह हमलोगोंके सम्मुख प्रस्तुत करें। आपने हमारा पालन-पोषण किया है और सभी प्रकारसे भोजन आदिद्वारा संतुष्ट रखा है। विद्वान् ब्राहाणका तो कर्तव्य ही है कि वह धर्मके संदेहको दूर करे, अधर्मसे निवृत्त करे और कल्याणकारी उपदेशको भलीभांति समझाये। आप अपनी इच्छाके अनुसार जो पूछना चाहें पूछे।' तभी उनकी महारानी विमलवतीने भी राजासे निवेदन किया कि महाराज !
१-आत्मानं भास्कर मत्वा यज्ञं तस्मै निवेदयेत् ।
तत्तदव्यकरूपाय भास्कराय निवेदयेत्॥
(ब्राह्मपर्य ११५ ।३७)
२-सत्राजिते महाबाहो कृष्ण धात्रीं समाश्रिते।।
यावत्सूर्य उदेति स यावच्च प्रतितिष्ठति ।
सत्राजित तु तत्सर्व क्षेत्रमित्यभिधीयते ॥
(ब्राह्मपर्व ११६४९-१०)
३-संतुष्टो ब्राह्मणोऽश्नौयाच्छिन्यादा धर्मसंशयम् ।
हितं चोपदिशेशमै अहिताद्वा भिवायेत् ॥
(ग्राह्मपर्व ११६।२५)
मेरा भी एक संदेह है, आप महात्माओंसे पूछकर निवृत्त करा लें। मैं तो अन्त:पुरमें ही रहती हूँ। अतः मेरी प्रार्थना है कि आप प्रथम मेरा ही संदेह निवृत्त करा दें, क्योंकि आपके संदेहकी निवृत्तिके अनेक साधन हैं।'
राजा सत्राजित्ने कहा-'प्रिये! क्या पूछना चाहती हो, पहले मैं तुम्हारा ही संदेह पूरूँगा।'
विमलवतीने कहा-'महाराज! मैंने अनेक राजाओंके चरित्र और ऐश्वर्यको सुना है, किंतु आपके समान ऐश्वर्य अन्य लोगोंको सुलभ नहीं है, यह किस कर्मका फल है? मैंने कौन-सा उत्तम कर्म किया था, जिसके फलस्वरूप मुझे आपकी रानी होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ? पूर्वजन्ममें हम दोनोंने कौन-सा पुण्यकर्म किया है? इस विषयमें आप मुनियोंसे पूछे।'
सत्राजित् बोले-'देवि! तुमने तो मेरे मनकी बात जान ली है। मुनियों की बातें सत्य हैं, पत्नी पुरुषकी अर्धाङ्गिनी होती है। ऐसी कोई बात नहीं है जो इन महामुनियोंसे छिपी हो। इन महात्माओंसे मैं भी यही पूछना चाहता था। अनन्तर महाराजने महात्माओंसे पूछा-भगवन्! मैं पूर्वजन्ममें कौन था, मैंने कौन-से पुण्य कर्म किये थे? इस सर्वाङ्गसुन्दरी मेरी पत्नीने कौन-से उत्तम कर्म सम्पन्न किये थे, जिससे हमें ऐसी दुर्लभ लक्ष्मी प्राप्त हुई है। हमलोगोंमें परस्पर अतिशय प्रीति है। सभी राजा मेरे अधीन हैं, मेरे पास असीम द्रव्य है और मैं अत्यन्त बलशाली हूँ। मेरा शरीर भी नीरोग है। मेरी पत्त्रीके समान संसारमें कोई स्त्री नहीं है। सभी मेरे असीम तेजको सहन करनेमें असमर्थ हैं। महामुने! आपलोग त्रिकालज्ञ हैं। आप मेरी जिज्ञासाको शान्त करें।' राजाके इस प्रकार पूछनेपर उन ब्राह्मणोंने सूर्यदेवके परम भक्त परावसुसे प्रार्थना की कि आप ही इनके संदेहको निवृत्त करें। धर्मज्ञ ब्राहाणोंकी सम्मतिसे महामति परावसुने योग-समाधिके द्वारा राजा तथा रानीके पूर्वजन्मके सभी कर्मोंकी जानकारी प्राप्त कर राजासे कहना आरम्भ किया-
परावसु बोले-महाराज! आप पूर्वजन्ममें बड़े निर्दयी, हिंसक तथा कठोर हृदयके शूद्र थे, कुष्ठ- रोगसे पीड़ित थे। सुन्दर नेत्रोंवाली ये महारानी उस समय भी आपकी ही भार्या थीं। ये ऐसी पतिव्रता थीं कि आपके द्वारा पीड़ित होनेपर भी आपकी सेवामें निरन्तर संलग्न रहती थीं, परंतु आपकी अतिशय क्रूरताके कारण आपके बन्धु-बान्धव आपसे अलग हो गये और आपने भी अपने पूर्वजोंद्वारा संचित धनको नष्ट कर डाला। अनन्तर आपने कृषि-कार्य प्रारम्भ किया, किंतु दैवेच्छासे वह भी व्यर्थ हो गया। आप अत्यन्त दीन-हीन होकर दूसरोंकी सेवाद्वारा जीवन-यापन करने लगे। आपने अपनी स्त्रीको छोड़नेका बहुत प्रयास किया, किंतु उसने आपका साथ नहीं छोड़ा। इसके बाद आप दोनों कान्यकुब्ज देशमें चले गये और भगवान् सूर्यके मन्दिरमें सेवा करने लगे। वहाँ प्रतिदिन मन्दिरका मार्जन, लेपन, प्रोक्षण (जल छिड़कना) आदि कार्य बड़े भक्तिभावसे करते रहे। मन्दिरमें पुराणको कथा होती थी। आप दोनोंने उसका भक्तिपूर्वक श्रवण किया। कथा-प्रवण करनेके बाद आपकी पत्नीने पितासे प्राप्त अंगूठीको कथामें चढ़ा दिया। आपके मनमें रात-दिन यही चिन्ता रहती थी कि यह मन्दिर कैसे स्वच्छ रहे। आप दोनों बहुत दिनोंतक वहाँ रहे। भगवान्के सेवारूपी योगकामें आपका मन अहर्निश लगा रहता था।
इस प्रकार आप दोनों निष्कामभावसे भगवान् सूर्यकी सेवा करते और जो कुछ मिलता, उसीसें : निर्वाह करते थे। गोपति भगवान् सूर्यका आप नित्य चिन्तन करते थे, अत: आपके सभी पाप समाप्त हो गये।
किसी समय अपनी विशाल सेनाके साथ कुवलाश्व नामका एक राजा वहाँ आया। उसकी अपार सम्पत्ति और हजारों श्रेष्ठ रानियोंको देखकर आप दोनोंकी भी राजा-रानी बननेकी इच्छा हुई। कुछ ही समयमें आपका देहान्त हो गया। सूर्यदेवकी श्रद्धा-भक्तिपूर्वक की गयी सेवा तथा पुराण- प्रवणके प्रभावसे आप राजा हुए और आपकी स्त्री रानी हुई एवं आप दोनोंको जो. असीम तेज प्राप्त हुआ है, उसका भी कारण सुनिये-
जब मन्दिरमें दीपक तेल तथा बत्तीके अभावमें बुझने लगता था, तब आप अपने भोजनके लिये रखे तेलसे उसे पूरित करते थे और आपकी रानी अपनी साड़ी फाड़कर उससे बत्ती बनाकर जलाती थी। राजन्! यदि अन्य जन्ममें भी आपको ऐश्वर्यकी इच्छा है तो भगवान् सूर्यको श्रद्धापूर्वक आराधना करें। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि जो आपको प्रिय हों, वही भगवान् सूर्यको अर्पण करें। उनके मन्दिरमें मार्जन, उपलेपन आदि कार्य करें, जिससे मन्दिर स्वच्छ और निर्मल रहे। उत्तम दिनों में उपवास कर रात्रि-जागरण और नृत्य-गीत-वाद्यादिद्वारा महोत्सव करायें। पुराण- इतिहास आदिकी कथा श्रद्धापूर्वक सुनें तथा भगवान् सूर्यको प्रसन्नताके लिये वेद-पाठ करायें। सदा निष्काम भावसे तन्मय होकर उनकी सेवामें लगे रहें। संतुष्ट होकर भगवान् सूर्य अभीष्ट फल देते हैं। वे पुष्प, नैवेद्य, रत्न, सुवर्ण आदिसे उतना प्रसन्न नहीं होते, जितना वे भक्तिभावसे प्रसन्न दूर होते हैं। यदि भक्तिभावपूर्वक सूर्यकी आराधना उप और विविध उपचारोंसे पूजन करेंगे तो इन्द्रसे भी अधिक वैभवकी प्राप्ति कर लेंगे।
राजा सत्राजित्ने कहा-भगवन् ! इन्द्रत्वकी मार प्राप्ति या अमरत्वकी प्रासिसे जो आनन्द होता है, वह आनन्द आपकी इस वाणीको सुनकर मुझे प्राप्त हुआ। अज्ञानरूपी अन्धकारके लिये आपको यह वाणी प्रदौस दीपकके समान है। सम्पत्तिके विनाशकी सम्भावनासे हम बहुत व्याकुल थे। आपने सम्पत्ति-प्राप्तिके लिये मूल तत्त्वका आज उपदेश दिया है। इससे यह सिद्ध हो गया कि मुझे यह सारी सम्पत्ति पूर्वजन्मके सुकृतकर्मके ही फलस्वरूप प्राप्त हुई है। भक्तिमान् दरिद्र भी भगवान् सूर्यको प्रसन्न कर सकता है, किंतु एक ऐश्वर्यशाली धनवान् भक्किहीन होने पर उनका अनुग्रह नहीं प्राप्त कर सकता। भगवन्! आप मुझे सूर्यभगवान्की आराधनाके उस मार्गको सूचित करें, जिससे शीघ्र ही उनका अनुग्रह प्राप्त हो सके।
परावसु बोले-राजन् कार्तिक मासमें प्रतिदिन भगवान् सूर्यका पूजन कर ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये और स्वयं भी, एक ही बार भोजन करना चाहिये। इस आराधनासे बाल्यावस्थामें किये गये ज्ञात-अज्ञात सभी पापोंसे छुटकारा मिल जाता है। मार्गशीर्ष में पूर्वोक्त रौतिसे व्रत करनेवाले स्त्री-पुरुषकी, ब्राह्मणको मरकत मणिका दान करनेसे प्रौढावस्थामें किये गये पापोंसे मुक्ति हो जाती है। पौष मासमें पूर्वोक्त विधिके अनुसार एकभुक्त हो श्रद्धापूर्वक सूर्यकी आराधना करनेसे वृद्धावस्थामें किये गये सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
इस त्रैमासिक व्रतको श्रद्धापूर्वक विधि-विधानसे करनेवाले स्त्री या पुरुष सूर्यभगवान्के कृपापात्र हो जाते हैं और लघु पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। दूसरे वर्ष इसी प्रकार त्रैमासिक व्रत करनेपर सभी उपपातक निवृत्त हो जाते हैं। तीसरे वर्ष भी इस व्रतको करनेपर महापातक नष्ट हो जाते हैं और मनोवाञ्छित फलकी प्राप्ति होती है। यह व्रत तीन मासमें सम्पन्न होता है और इसे तीन वर्षतक करना चाहिये। सभी अवस्थाओंमें आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक-त्रिविध पातक
इसके द्वारा नष्ट हो जाते हैं। इस सर्वपापहर्ता व्रतको त्रिविक्रम-व्रत कहा जाता है।
राजा सत्राजित्ने कहा-भगवन्! व्रतका विधान तो मैंने सुना, परंतु भोजन कैसे ब्राह्मणको कराना चाहिये, यह भी आप कृपाकर बतायें। परावसु बोले-पौराणिक ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। इस प्रसंगमें अरुणको सूर्यदेवने जो निर्देश दिया था, वह मैं आपको बताता हूँ-
किसी समय उदयाचलपर अरुणने भगवान् सूर्यसे पूछा-'महाराज! कौन-कौन पुष्प, नैवेद्य, वस्त्र आदि आपको.प्रिय हैं और कैसे ब्राह्मणको भोजन करानेसे आप संतुष्ट होते हैं?' इसे आप कृपाकर बतायें।
भगवान् सूर्यने कहा-अरुण! करवीरके पुष्प, रक्त चन्दन, गुग्गुलका धूप, घीका दीपक और मोदक आदि नैवेद्य मुझे प्रिय हैं। मेरे भक्त और पौराणिक ब्राह्मणको दान देकर उसके प्रति श्रद्धा समर्पित करनेसे मुझे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी प्रसन्नता गीत, वाद्य और पूजन आदिसे नहीं होती। मैं पुराण आदिके वाचन-श्रवणसे अतिशय प्रसन्न होता हूँ। इतिहास-पुराणके वाचक तथा मेरी पूजा करनेवाला भोजक-ये दोनों मुझे विशेष प्रिय हैं। इसलिये पौराणिकका पूजन करे और इतिहास आदिको सुने। (अध्याय ११६)
Summary of chapter 73 of the Bhavishya Mahā Purana is as follows:
- [[Bhavishya-Purana]] - [[Uttara-Parva-Overview]] - [[Pratisarga-Itihas]] - [[Sauradharma]] - [[Surya]] - [[Samba-Sura]] - [[Chyavana]] - [[Maha-Dana-Vidhi]] - [[Sadachara]] - [[Vikramaditya]] - [[Chaitanya-Mahaprabhu]] - [[Shankaracharya]] - [[Ramanujacharya]] - [[Madhvacharya]] - [[Kalki]] - [[Savitri]] - [[Pippalada]]