भविष्य महा पुराण

अघोरपंथी भैरव तथा बालशर्माकी उत्पत्तिकी कथामें रावण तथा हनुमानजीका चरित्र

सूतजी बोले-शौनक ! भगवान् कपाली शिव | अपने अंशसे काशीमें अयोनिजरूपसे उत्पन्न हुए। वे कपालमोचनकुण्डसे पृथ्वीपर आकर यतिरूप वेदनिधि भैरव नामसे प्रख्यात हुए और उन्होंने दुष्कर अघोरमार्गका अपने शिष्यों में प्रवर्तन किया। फिर वे शंकराचार्यके पास आकर उनके शिष्य हो गये। उन्होंने मन्त्रमय डामरतन्त्रका प्रवर्तन किया और कोलित मन्त्रोंके उत्कीलनका मार्ग बतलाया।

बृहस्पतिजीने कहा-देवेन्द्र! मय दानवकी पुत्री मन्दोदरी त्रिपुरके अधिपति मावीको बहन थी। त्रिपुरके नष्ट होनेपर वह देवी मन्दोदरी सनातन महाविष्णुको गुप्तभावसे निरन्तर संतुष्ट करती रहती थी। भगवान् विष्णुमें भक्तिभावना करनेसे मन्दोदरीको उत्तम योग प्राप्त हुआ और वह भयंकर विन्ध्याद्रिकी गुफामें विलीन हो गयी। उसकी समाधिमें चारों युग दो सौ बार बीत गये। वैवस्वत मन्वन्तरके बारहवें सत्ययुगमें ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्य हुए, जिनसे विश्रवा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। सौ वर्षतक विश्रवामुनिने तपस्यांकर सुमाली दैत्यको पुत्री कैकसीके साथ विवाह किया और उससे रावण और कुम्भकर्ण दो राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए। रावण मातृभक्त था और भाई कुम्भकर्ण पितृभक्त । वरकी कामनासे उन दोनोंने हजार वर्षातक धोर तपस्या की। भगवान् परमेष्ठी पितामह ने प्रसन्न होकर उन दोनों को देव और दानवोसे अजेय होनेका घर दिया। उन दोनोने पर प्राशकर कुद्ध हो श्रेष्ठ पुष्पकयानको ग्रहणकर देवताओंसे युद्ध किया। उन दोनोंसे पराजित देवताओंने सुखप्रद स्वर्गको छोड़कर पार्थिवार्चनके द्वारा कैलासमें स्थित भगवान् शिवकी ग्यारह वर्षोतक आराधना की और उनसे वर प्राप्तकर वे सभी निर्भय हो गये। इधर गौतम ऋषिके शरीरसे उत्पन्न केशरीको पत्नी अञ्जनाके गर्भसे हनुमान्जीके रूपमें भगवान् शंकरने भी अपने अंशसे अवतार लिया और आकाशमें उगते हुए लान सूर्यको देख फल समझकर निगल लिया। अन्धकार देखकर इन्द्रने उनकी गुड्डी (हनु)- पर अपने वजसे प्रहार किया। इसी बीच रावण भी उनकी पूँछ पकड़कर लटक गया, फिर भी उन्होंने सूर्यको नहीं छोड़ा। रावणसे एक वर्षतक मुष्टियुद्ध होता रहा। अन्तमें धका हुआ रावण रुद्ररूपों हनुमानसे भयभीत हो इधर-उधर भागा। इसी समय ऋषि विश्रवा वहाँ आये और वेदमय स्तोत्रोंसे परावाणीद्वारा हनुमानको प्रसन्न किया। प्रसन्न हो रुद्ररूपी हनुमान्ने संसारको रुलानेवाले रावणको छोड़ दिया। फिर बलवान् केशरीपुत्र पम्पापुरके तटपर निवास करने लगे और अचलरूपसे स्थित होने के कारण स्थाणु नागसे प्रसिद्ध हुए। संसारको रुलानेवाले तथा देवताओंको मारनेवाले रावणको मुष्टिकासे हनन करनेके कारण इनका नाम हनुमान् पड़ गया*। हनुमान्जीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् ब्रह्माने कहा-'तपोनिधे रुद्र। आप मेरी बात सुनें। वैवस्वत मन्वन्तर अहाईस प्रेतायुगके प्रथम चरण

*निघ्रन्तं च सुरान् रावणं लोकरावनम्।।

निहन्ति मुष्टिभियः स हनुमानिति विश्रुतः।।

साक्षात् भगवान् राम अवतीर्ण होंगे। उनकी भक्ति प्राप्तकर आप कृतकृत्य हो जायेंगे। देवेन्द्र! ऐसा कहकर ब्रह्माजीने भाद्रपद मासके चन्द्रमाके प्रकाशरूपमें उन्हें प्रतिष्ठित किया और इधर मयपुत्री मन्दोदरीका विवाह रावणके साथ करा दिया। वह रावण नैर्ऋत दिशाका दिक्पाल हुआ। भगवान् हरिने रामरूपमें अवतरित होकर रावणको मारा।' सूतजी बोले-मुने! अनन्तर वे ही हनुमान् पुनः मनुष्य-शरीर धारणकर पृथ्वीपर कदलीवनमें आकर बालशर्मा नामसे प्रसिद्ध हुए और काशी नगरीमें मणिकर्णिकापर रहने लगे। वे शंकराचार्य यतिके शिष्य होकर गुरुसेवामें तत्पर हो गये और उन्होंने तन्त्र-मन्त्रशास्त्रका निर्माण किया। (अध्याय १३)