भविष्य महा पुराण

गर्भाधान से यज्ञोपवीतपर्यन्त संस्कारोंकी संक्षिप्त विधि, अन्नप्रशंसा तथा भोजन-विधिके प्रसंग में धनवर्धनकी कथा, हाथोंके तीर्थ एवं आचमन-विधि

राजा शतानीकने कहा-हे मुने! आपने मुझे जातकर्मादि संस्कारोंके विषयमें बताया, अब आप इन संस्कारोंके लक्षण तथा चारों वर्ण एवं  आश्रमके धर्म बतलानेकी कृपा करें।

सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, अन्नप्राशन, चूडाकर्म तथा यज्ञोपवीत आदि संस्कारोंके करनेसे द्विजातियोंके बीज-सम्बन्धी तथा गर्भ-सम्बन्धी सभी दोष निवृत्त हो जाते हैं। वेदाध्ययन, व्रत, होम, त्रैविद्य व्रत, देवर्षि-पितृ-तर्पण, पुत्रोत्पादन, पञ्च महायज्ञ और ज्योतिष्टोमादि यज्ञोंके द्वारा यह शरीर ब्रह्म-प्राप्तिके योग्य हो जाता है। अब इन संस्कारोंकी विधिको आप संक्षेपमें सुनें-

पुरुषका जातकर्म-संस्कार नालच्छेदनसे पहिले किया जाता है। इसमें वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक बालकको सुवर्ण, मधु और घृतका प्राशन कराया जाता है। दसवें दिन, बारहवें दिन, अठारहवें दिन अथवा एक मास पूरा होनेपर शुभ तिथि- मुहूर्त और शुभ नक्षत्रमें नामकरण संस्कार किया जाता है। ब्राह्मणका नाम- मङ्गलवाचक रखना चाहिये, जैसे शिवशर्मा। क्षत्रियका बलवाचक जैसे इन्द्रवर्मा। वैश्यका धनयुक्त जैसे धनवर्धन और शूद्रका भी यथाविधि देवदासादि नाम रखना चाहिये। स्त्रियोंका नाम ऐसा रखना चाहिये, जिसके बोलनेमें कष्ट न हो, क्रूर न हो, अर्थ स्पा और अच्छा हो, जिसके सुननेसे मन प्रसन्न हो तथा मङ्गलसूचक एवं आशीर्वादयुक्त हो और जिसके अन्तमें आकार, ईकार आदि दीर्घ स्वर हों। जैसे यशोदादेवी आदि।

जन्मसे बारहवें दिन अथवा चतुर्थ मासमें बालकको घरसे बाहर निकालना चाहिये, इसे निष्क्रमण कहते हैं। छठे मासमें बालकका अन्नप्राशन-संस्कार करना चाहिये। पहले या तीसरे वर्षमें मुण्डन-संस्कार करना चाहिये। गजे आठवें वर्षमें ब्राह्मणका, ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रियका और बारहवें वर्षमें वैश्यका यज्ञोपवीत-संस्कार करना चाहिये। परंतु ब्रह्मतेजकी इच्छावाला ब्राह्मण पाँचवें वर्षमें, बलकी इच्छावाला क्षत्रिय छठे चर्षमें और धनकी कामनावाला वैश्य आठवें वर्षमें अपने-अपने बालकोंका उपनयन-संस्कार सम्पन्न करे। सोलह वर्षतक ब्राह्मण, बाईस वर्षतक क्षत्रिय और चौबीस वर्षतक वैश्य गायत्री (सावित्री)-के अधिकारी रहते हैं, इसके अनन्तर यथासमय संस्कार न होनेसे गायत्रीके अधिकारी नहीं रहते और वे 'व्रात्य कहलाते हैं। फिर जबतक व्रात्यस्तोम नामक यज्ञसे उनको शुद्धि नहीं की जाती, तबतक उनका शरीर गायत्री-दीक्षाके योग्य नहीं बनता। इन ब्रात्योंके साथ आपत्ति में भी बेदादि शास्त्रोंका पठन-पाठन अथवा विवाह आदिका सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये।

त्रैवर्णिक ब्रह्मचारियोंको उत्तरीयके रूपमें क्रमश: कृष्ण (कस्तूरी )-मृगचर्म, रुरु नामक मृगका चर्म और चकोरका चर्म धारण करना चाहिये। इसी प्रकार क्रमश: सन (टाट), अलसी और भेड़के ऊलका वस्त्र धारण करना चाहिये। ब्राहाण ब्रह्मचारीके लिये तीन लड़ीवाली सुन्दर चिकनी मूँजकी, क्षत्रियके लिये पूर्वा (मुरा)-को और वैश्य के लिये सनकी मेखला कही गयी है। मूंज आदिके प्राश न होनेपर क्रमशः कुशा, अशमन्तक और बल्चज नामक

तृणकी मेखलाको तीन लड़ीवाली करके एक, तीन अथवा पाँच प्रन्थियाँ उसमें लगानी चाहिये। ब्राह्मण कपासके सूतका, क्षत्रिय सनके सूतका और वैश्य भेड़के ऊनका यज्ञोपवीत धारण करे। ब्राह्मण बिल्व, पलाश या प्लक्षका दण्ड, जो सिरपर्यन्त हो उसे धारण करे। क्षत्रिय बड़, खदिर या बेंतके काष्ठका मस्तकपर्यन्त ऊँचा और वैश्य पैलव (पीलू वृक्षकी लकड़ी), गूलर अथवा पीपलके काष्ठका दण्ड नासिकापर्यन्त ऊँचा धारण करे। ये दण्ड सीधे, छिद्ररहित और सुन्दर होने चाहिये। यज्ञोपवीत- संस्कारमें अपना-अपना दण्ड धारणकर भगवान् सूर्यनारायणका उपस्थान करे और गुलन पूजा करे तथा नियमके अनुसार सर्वप्रथम माता, बहिन यो मौसीसे भिक्षा माँगे। भिक्षा माँगते समय उपनीत ब्राह्मण बटु भिक्षा देनेवालीसे भवति! भिक्षा में देहि', क्षत्रिय 'भिक्षा भवति! मे देहि था वैश्य 'भिक्षां देहि मे भवति!'- इस प्रकारसे 'भवति' शब्दका प्रयोग करे। भिक्षामें वे सुवर्ण, चाँदी अथवा अन्न ब्रह्मचारीको दें। इस प्रकार भिक्षा ग्रहणकर ब्रह्मचारी उसे गुरुको निवेदित कर दे और गुरुकी आज्ञा पाकर पूर्वाभिमुख हो आचमन कर भोजन करे। पूर्वकी ओर मुख करके भोजन करनेसे आयु, दक्षिण-मुख करनेसे यश, पश्चिम-मुख करनेसे  लक्ष्मी और उत्तर-मुख करके भोजन करनेसे सत्यको अभिवृद्धि होती है। एकाग्रचित्त हो उत्तम अन्नका भोजन करनेके अनन्तर आचमन कर अङ्गों (आँख, कान, नाक) का जलसे स्पर्श करे। अन्नकी नित्य स्तुति करनी चाहिये और अन्नको निन्दा किये बिना भोजन करना चाहिये। उसका दर्शन कर संतुष्ट एवं प्रसन्न होना चाहिये। हर्षसे भोजन करना

चाहिये। पूजित अन्नके भोजनसे बल और तेजकी वृद्धि होती है और निन्दित अन्नके भोजनसे बल और तेज दोनोंकी हानि होती है*। इसीलिये सर्वदा उत्तम अन्नका भोजन करना चाहिये। उच्छिष्ट (जूठा) किसीको नहीं देना चाहिये तथा स्वयं भी किसीका उच्छिष्ट नहीं खाना चाहिये। भोजन करके जिस अन्नको छोड़ दे उसे फिर ग्रहण न करे अर्थात् बार-बार छोड़-छोड़कर भोजन न करे, एक बार बैठकर तृप्तिपूर्वक भोजन कर लेना चाहिये। जो पुरुष बीच-बीचमें विच्छेद करके लोभवश भोजन करता है, उसके दोनों लोक नष्ट हो जाते हैं, जैसे धनवर्धन वैश्यके हुए थे।

राजा शतानीकने पूछा- महाराज! आप धनवर्धन वैश्यको कथा सुनाइये। उसने कैसा भोजन किया और उसका क्या परिणाम हुआ ?

सुमन्तु मुनिने कहा- राजन् ! सत्ययुगकी बात है, पुष्कर क्षेत्रमें धन धान्यसे सम्पन्न धनवर्धन नामक एक वैश्य रहता था। एक दिन वह ग्रीष्म ऋतु में मध्याहके समय वैश्वदेव कर्म सम्पन्न कर अपने पुत्र, मित्र तथा ब-धु-बान्धवोंके साथ भोजन कर रहा था। इतने में ही अकस्मात् उसे बाहरसे एक करुण शब्द सुनायी पड़ा। उस शब्दको सुनते ही वह दयावश भोजनको छोड़कर बाहरकी ओर दौड़ा। किंतु जबतक वह बाहर पहुँचा वह आवाज बंद हो गयी। फिर लौटकर उस वैश्यने पात्र में जो छोड़ा हुआ भोजन था उसे खा लिया। भोजन करते ही उस वैश्यको मृत्यु हो गयी और इसी अपराधवश परलोकमें भी उसकी दुर्गति हुई। इसलिये छोड़े हुए भोजनको फिर कभी नहीं खाना चाहिये। अधिक भोजन भी नहीं करना चाहिये। इससे शरीरमें

*तथात्रं पूरयेन्नित्यमद्याचैतदकुत्यन्।

दर्शनात् तस्य ह्रष्येद्  वै प्रमोदेचापि भारत ॥

पूजितं त्वशनं नित्यं क्लमोज बच्छति।

अपूधित तद्भुक्तमुभर्थ नाशयदिदम्।

(ब्रह्मपर्व ३३ ३४-३९)

अत्यधिक रसकी उत्पत्ति होती है, जिससे प्रतिश्याय (जुकाम, मन्दाग्नि, ज्वर) आदि अनेक रोग उत्पत्र हो जाते हैं। अजीर्ण हो जानेसे स्नान, दान, तप, होम, तर्पण, पूजा आदि कोई भी पुण्य कर्म ठीकसे सम्पन्न नहीं हो पाते। अति भोजन करनेसे अनेक रोग उत्पन्न होते हैं-आयु घटती है, लोकमें निन्दा होती है तथा अन्तमें सति भी नहीं होती। उच्छिष्ट मुखसे कहीं नहीं जाना चाहिये। सदा पवित्रतासे रहना चाहिये। पवित्र मनुष्य यहाँ सुखसे रहता है और अन्त में स्वर्गमें जाता है।

राजाने पूछा-मुनीश्वर! ब्राह्मण किस कर्मके करनेसे पवित्र होता है ? इसका आप वर्णन करें।

सुमन्तु मुनि बोले- राजन्! जो ब्राह्मण विधिपूर्वक आचमन करता है, वह पवित्र हो जाता है और सत्कर्माका अधिकारी हो जाता है। आचमनकी विधि यह है कि हाथ-पाँव धोकर पवित्र स्थानमें आसनके ऊपर पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके बैठे। दाहिने हाथको जानुके भीतर रखकर दोनों चरण बराबर रखे तथा शिखामें ग्रन्थि लगाये और फिर उष्णता एवं फेनसे रहित शीतल एवं निर्मल जलसे आचमन करे। खड़े-खड़े, बात करते, इधर-उधर देखते हुए, शीघ्रतासे और क्रोधयुक्त होकर आचमनन करे।

हे राजन्! ब्राह्मणके दाहिने हाथमें पाँच तीर्थ कहे गये हैं-(१) देवतीर्थ, (२) पितृतीर्थ, (३) ब्राहातीर्थ, (४) प्राजापत्यतीर्थ और (५) सौम्यतीर्थ । अब आप इनके लक्षणों को सुनें-अँगूठेके मूलमें ब्राह्मतीर्थ, कनिष्ठाके मूल में प्राजापत्यतीर्थ, अङ्गलियोंके आधागमें देवतीर्थ, तर्जनी और आपके बीचमें पितृतीर्थ और हाथके मध्य भागमें सौम्यतीर्थ

कहा जाता है, जो देवकर्ममें प्रशस्त माना गया है। देवार्चा, ब्राह्मणको दक्षिणा आदि कर्म देवतीर्थसे; तर्पण, पिण्डदानादि कर्म पितृतीर्थसे; आचमन ब्राह्मतीर्थसे; विवाह के समय लाजाहोमादि और सोमपान प्राजापत्यतीर्थसे; कमण्डलुग्रहण, दधिप्राशनादि कर्म सौम्यतीर्थसे करे । ब्राह्मतीर्थसे उपस्पशन सदा श्रेष्ठ माना गया है।

अङ्गुलियोंको मिलाकर एकाग्रचित्त हो, पवित्र जलसे बिना शब्द किये तीन बार आचमन करनेसे महान् फल होता है और देवता प्रसन्न होते हैं। प्रथम आचमनये ऋग्वेद, द्वितीयसे यजुर्वेद और तृतीयसे सामवेदकी तृप्ति होती है तथा आचमन करके जलयुक्त दाहिने अँगूठेसे मुखका स्पर्श करनेसे अथर्ववेदकी तृप्ति होती है। ओष्टके मार्जनसे इतिहास और पुराणों को तृप्ति होती है। मस्तकगे अभिषेक करनेसे भगवान्

*अङ्गुष्ठापूरलोचारतो ये रेखा महीपते।।

बाह्मं तीर्थ बदन्त्येतस्मिाद्या द्विजोत्तमाः।

कायं कनिष्ठिकामूले अङ्गुत्यग्ने तु दैवतन् ।

तर्जन्यङ्गुष्ठयारन्तः पित्र्यं तीर्थमुदाङ्गतम् ।

करमध्ये स्थित सौम्मं प्रशस्तं देवकर्मणि॥

(ब्राह्मपर्व ३।६३-६५)

रुद्र प्रसन्न होते हैं। शिखाके स्पर्शसे ऋषिगण, दोनों आँखोंके स्पर्शसे सूर्य, नासिकाके स्पर्शसे वायु कानोंके स्पर्शसे दिशाएँ, भुजाके स्पर्शसे यम, कुबेर, वरुण, इन्द्र तथा अग्निदेव तृप्त होते हैं। नाभि और प्राणों की ग्रन्थियोंके स्पर्श करनेसे सभी तृप्त हो जाते हैं। पैर धोनेसे विष्णुभगवान्, भूमिमें जल छोड़नेसे वासुकि आदि नाग तथा बीचमें जो जलबिन्दु गिरते हैं, उनसे चार प्रकारके भूतग्रामको तृप्ति होती है।

अङ्गुष्ठ और तर्जनीसे नेत्र, अङ्गुष्ठ तथा अनामिकासे नासिका, अङ्गुष्ठ एवं मध्यमासे मुख, अङ्गुष्ठ और कनिष्ठकासे कान, सब अङ्गुलियोंसे भुजाओंका, अङ्गुष्ठसे नाभिमण्डल तथा सभी अङ्गुलियोंसे सिरका स्पर्श करना चाहिये। अगु अग्निरूप है, तर्जनी वायुरूप, मध्यमा प्रजापतिरूप, अनामिका सूर्यरूप और कनिधिका इन्द्ररूप है।

इस विधिसे ब्राह्मणके आचमन करनेपर सम्पूर्ण जगत्, देवता और लोक तृप्त हो जाते हैं। ब्राहाण सदा पूजनीय है, क्योंकि वह सर्वदेवमय है। ब्राहातीर्थ, प्राजापत्यतीर्थ अथवा देवतीर्थसे आचमन करे, परंतु पितृतीर्थसे कभी भी आचमन नहीं करना चाहिये। आचननका जल हृदयतक जानेसे ब्राह्मणकी, कण्ठतक जानेसे क्षत्रियको और वैश्यको जलके प्राशनसे तथा शूद्रकी जलके स्पर्शमात्रसे शुद्धि हो जाती है। दाहिने हाथके नीचे और बायें कंधेपर यज्ञोपवीत रहनेसे द्विज उपवीती (सव्य) कहलाता है, इसके विलोम रहनेसे अर्थात् यज्ञोपवीतके दाहिने कंधेसे बायीं ओर रहनेसे प्राचीनावीती (अपसव्य) तथा गलेमें मालाकी तरह यज्ञोपवीत रहनेसे निवीती कहा जाता है।

मेखला, मृगछाला, दण्ड, यज्ञोपवीत और कमण्डलु-इनमें कोई भी चीज भग्न हो जाय तो उसे जलमें विसर्जित कर मन्त्रोच्चारणपूर्वक दूसरा धारण करना चाहिये। उपवीती (सव्य) होकर और दाहिने हाथको जानु अर्थात् घुटनेके भीतर रखकर जो ब्राह्मण आचमन करता है वह पवित्र हो जाता है। ब्राहाणके हाथको रेखाओंको गङ्गा आदि नदियोंके समान पवित्र समझना चाहिये और अङ्गलियोंके जो पर्व हैं, वे हिमालय आदि देवपर्वत माने जाते हैं। इसलिये ब्राह्मणका दाहिना हाथ सर्वदेवमय है और इस विधिसे आचमन करनेवाला अन्त में स्वर्गलोकको प्राप्त करता है २१ (अध्याय ३)