भविष्य महा पुराण

कलिके द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ चरणोंका वृत्तान्त तथा कल्कि भगवान् का अवतार

सूतजीने कहा- शौनक ! म्लेच्छोंकी विजय होनेपर कलिने उन्हें सम्मानित किया। तदनन्तर सभी दैत्यगण अनेकों जलयानोंका निर्माणकर हरिखण्डमें आये। उस समय हरिखण्ड में भी मनुष्य देवताओंके समान महाबलशाली थे। उन लोगोंने दैत्योंके साथ भयंकर अस्त्र-शस्त्रोंसे युद्ध किया, किंतु दस वर्षके बाद वे सभी दैत्योंके मायायुद्धसे पराजित हो गये। तब वे हरिखण्डनिवासी महेन्द्रकी शरणमें गये। भगवान् शक्रने विश्वकर्मासे कहा-'तात! सप्तसिन्धुओंमें तुम्हारे द्वारा विरचित भ्रमि नामक यन्त्र अवस्थित है। उस यन्त्रके प्रभावसे मानव एक खण्डसे दूसरे खण्डमें नहीं जा पाते; किंतु मायावी मयने उसे भ्रष्ट कर दिया है। फलतः सातों द्वीपोंमें मेरे शत्रु म्लेच्छगण सब जगह जाने लगे हैं। इसलिये आपके द्वारा सम्पादित जो मर्यादा है, उससे हमलोगोंको आप रक्षा करें।'

यह सुनकर विश्वकर्माने एक दिव्य भमि यन्त्रका निर्माण किया। उस यन्त्रके प्रभावसे वे सब भ्रमित हो गये। भ्रमि-यन्त्रसे म्लेच्छविनाशक एक महावायु उत्पन्न हुआ। उस महावायुसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ जो वात्य कहलाया। ज्ञानमय उस वात्यने दैत्यों, यक्षों और पिशाचोको जोतकर त्रैवर्णिक द्विजोंका सत्कार किया। महाबलो वात्यने ग्लेच्छोंको उनके वर्णमें प्रतिक्षित किया और पचास बालक वीपर मण्डलोक' पदको सुशोभित किया। उसके वंशमें कलियुगमें हजारों राजा हुए। जिन्होंने सोलह हजार वर्षतक राज्य किया और बे सभी वायुके उपासक हुए।

दुःखित हो कलिने पुनः दैत्यराज बलिके पास जाकर वात्यवंशका सम्पूर्ण वृत्तान्त बतलाया, तब बलिने अपने मित्र कलिके साथ वामनभगवान् के पास आकर नमस्कार कर कहा-'हे सुरोत्तम ! मुझपर प्रसन्न होकर आपने मेरे लिये कलिको बनाया है, परंतु वह कलि वात्य-द्विजोंके द्वारा तिरस्कृत कर दिया गया है। प्रभो! कलियुगके एक चरण व्यतीत होनेमें थोड़ा ही समय शेष है। इतने समयमें मेरी अपेक्षा देवोंका अधिक राज्य रहा। मैंने तो देवेन्द्रकी मायाके कारण पृथ्वीका अधिकार छोड़ दिया है। अत: आप मेरे मित्र इस कलिकी रक्षा करें।' तब भगवान् वामन हरि अपने पूर्वार्ध अंशसे यमुनातटनिवासी कामशमा नामक ब्राह्मणके घर उसकी पत्नी देवहूतिसे दो दिव्य पुत्रोंके रूपमें उत्पन्न हुए। एकका नाम था भोगसिंह और दूसरेका नाम था केलिसिंह। वे वात्यसे उत्पन्न राजाओंको जीतकर कल्पक्षेत्रमें आये। मयनिर्मित रह:क्रीडावती नामकी नगरीमें रहकर बलवान् उन दोनीने कलिकी धुरीको धारण किया। कालान्तरमें कलियुग में विपुल वर्णसंकरों की सृष्टि हो गयी। वृक्षपरके पक्षीके समान इनकी प्रभृत वृद्धि हो गयी। दो हजार वर्षके बाद इन्होंने पूर्ववर्ती मानवोंको समाप्त कर दिया। उस समय पृथ्वीपर कलिका द्वितीय चरण आ गया। इस समय किन्नरोंकी वार्ता भूतलपर वर्तमान है। वे दैत्यमय मनुष्य ढाई हाथमात्र ऊँचे हो गये और उनकी अवस्था चालीस वर्ष हुई तथा वे पक्षियों के समान कर्महीन हो गये। कलिके द्वितीय चरणके अन्तमें न विवाह होगा, न राजा रहेंगे, न कोई उद्यमशील रहेंगे और न कर्मकर्ता रहेंगे। भोगसिंह और केलिसिंहके वंशज सवा लाख वर्षतक पृथ्वीमें रहेंगे। इसलिये हे मुनिगणो! आप सबको मेरे साथ कृष्णचैतन्यके पास चलना चाहिये।

व्यासजी बोले-हे मनो! विशालापुरनिवासी वे सभी मुनिगण प्रसन्नचित्त होकर यज्ञाशके पास जायेंगे और उन्हें प्रणाम कर इन्द्रलोक जानेकी अनुमति मांगेंगे। तब यज्ञांश चैतन्य, आहाद, योगी गोरख, शंकर आदि रुद्रांशों और राजा भर्तृहरि आदि अपने सभी शिष्यों तथा अन्य योगिजनों और विशालापुरनिवासी मुनियोंके साथ विमानपर आरूढ़ होकर देवलोक चले जायेंगे। तब कलिके द्वितीय चरणमें वामनांशसे उद्भूत भोगसिंह और केलिसिंह योगमार्गका अवलम्बन कर कल्पक्षेत्रमें स्थित होंगे और दैत्यवर्गकी अभिवृद्धि करेंगे।

कलिके तृतीय चरणके आनेपर किन्नरगण धीरे-धीरे पृथ्वीपर विनष्ट हो जायेंगे। कलियुगके तृतीय चरणके छच्चीस हजार वर्ष व्यतीत होनेपर रुद्रकी आज्ञासे धृत-ऋधि सौरभी नागको पत्रीसे महाबलवान् कौलकल्प नामक मनुष्योंको उत्पन्न करेंगे जो सभी किनरोंका पक्षण करनेवाले होंगे। उस समय कलिमें उनको, उम्र छब्बीस वर्षकी होगी। भयभीत किन्नर वामनांशकी शरण में जायँगे और तब भोगसिंह तथा केलिसिंहके साथ कौलकल्पोंका घोर युद्ध होगा। इस वर्ष युद्ध करनेके पश्चात् भोगसिंह आदि सब पराजित हो जायगे। दैत्योंकि साथ वामनांश (भोगसिंह, केलिसिंह) भी पातालमें चले जायेंगे।

घोर कलियुगमें भृङ्ग-ऋषिकी भयंकर सृष्टि होगी। माता-बहिन, पुत्री आदिसे वे मनुष्य पशुवत् व्यवहार करेंगे। कामान्ध होकर वे सब बहुत पुत्रोंको उत्पन्न करेंगे। कलिके तृतीय चरणमें वे सृष्टियाँ भी भयंकर तिर्यक्-योनिको प्राप्त कर नष्ट हो जायेंगी।

कलिके चतुर्थ चरणमें मनुष्यको आयु बीस वर्षकी होगी और वे मरकर नरक जायेंगे। उस समय जलीय और वन्य जीवों के समान वे कन्द-मूल-फल खानेवाले हो जायेंगे। जो तामिल आदि भयंकर नरक प्रसिद्ध हैं, वे सब कर्मभूमिमें उत्पन्न मानवोंसे भरे जायेंगे। कलियुगके चतुर्थ चरणमें उत्पन्न मनुष्यों के द्वारा इक्कीसौं नरकोंमें अजीर्णता आ जायगी-नरक मनुष्योंसे भर जायेंगे। तब नरक धर्मराजके पास जाकर कहेंगे कि पापियोंसे हमारे स्थान भर गये हैं। हे सुरोत्तम ! जिस तरह हम लोग प्राकृतरूपमें हो जायें आप वैसा उपाय करें। यह सुनकर धर्मराज चित्रगुसके साथ कलियुमके संध्याकालमें ब्रह्माके पास जायेंगे और परमेष्ठी पितामह उनके साथ क्षीरसागर जायाँगे तथा वहाँ जगन्नाथ देवाधिदेव वृषाकपिकी पूजा कर सांख्यशास्त्रमय स्तोत्रोंसे स्तुति करेंगे एवं रक्षाकी प्रार्थना करेंगे। इसपर वे कहेंगे-देवगणो! लोककल्याणके लिये यह कश्यप सम्भल ग्राममें जन्म लेगा और वहाँ इसका नाम होगा विष्णुयशा। इसकी पत्नीका नाम होगा विष्णुकीर्ति । विष्यायशा कृष्णलीलाके ग्रन्थ मनुष्योंको सुनायेगा किंतु वे महाधृत नारकीय प्राणी उसे भयंकर दृढ़ बन्धनमें बाँधकर कारागारों डाल देंगे, तब विष्णुकीर्तिसे संसारका कल्याण करनेवाले पूर्ण भगवान् नारायण मार्गशीर्ष मास कृामा पक्ष की अष्टमी के दिन अन्धकारपूर्ण रात्रिमें कल्किरूपमें उत्पन्न होंगे तथा ब्रह्माण्डके कल्याणके लिये सभी देवताओंका भी प्रादुर्भाव होगा और वे सभी देवता तथा ग्रह परमेश्वरकी स्तुति करेंगे। तब भगवान् कल्कि उन्हें कल्पों, मन्वन्तरों, अवतार-कथाओं, सनातन राधा-कृष्णकी  महिमा तथा कर्मभूमि और सभी लोकों एवं ग्रहोंकी स्थितिको बतलायेंगे। इसी प्रसंगमें शेतवाराहकल्पकी कथा भी कहेंगे। तदनन्तर प्रसन्न होकर पुनः प्रणाम कर वे सभी देवगण अपने-अपने स्थानोंको चले जायेंगे। (अध्याय २४-२५)