भविष्य महा पुराण

पितृशर्मा और उनके वंशज-व्याडि, पाणिनि और वररुचि आदिकी कथा

ऋषियोंने कहा- भगवन्! तीनों दुःखोंके विनाश करनेवाले व्रतोंमें सर्वश्रेष्ठ सत्यनारायणव्रतको हमलोगोंने सुना; अब आपसे हमलोग ब्रह्मचर्यका महत्त्व सुनना चाहते हैं।

सूतजी बोले-ऋषियो ! कलियुगमें पितृशर्मा नामका एक श्रेष्ठ ब्राहाण था। वह वेदवेदाङ्गोंके तत्त्वोंको जाननेवाला था और पापकर्मोसे डरता रहता था। कलियुगके भयंकर समयको देखकर वह बहुत चिन्तित हुआ। उसने सोचा कि किस आश्रमके द्वारा मेरा कल्याण होगा, क्योंकि कलिकालमें संन्यास मार्ग दम्भ और पाखण्डके द्वारा खण्डित हो गया है, वानप्रस्थ तो समाप्त- सा ही है, बस कहीं-कहीं ब्रह्मचर्य रह गया है, किंतु गार्हस्थ जीवनका कर्म सभी कोंमें श्रेष्ठ माना गया है। अत: इस घोर कलियुगमें मुझे गृहस्थ धर्मका पालन करनेके लिये विवाह करना चाहिये। यदि भाग्यसे अपनी मनोवृत्ति के अनुसार आचरण करनेवाली स्त्री मिल जाती है, तब मेरा जन्म सफल एवं कल्याणकारी हो जायगा। इस प्रफार विचार करते हुए पितशमाने उत्तम पन्नी प्राप्त करनेके लिये विधेसरी जगन्माता भगवतीको चन्दन आदिसे पूजा कर स्तुति प्रारम्भ की*।

पितृशर्माकी स्तुति सुनकर देवी प्रसन्न हो गयीं और उन्होंने कहा-'हे द्विज श्रेष्ठ! मैंने तुम्हारी स्त्रीके रूपमें विष्णुयशा नामक ब्राह्मणको कन्याको निर्दिष्ट किया है।' तदनन्तर पितृशर्मा उस देवी ब्रह्मचारिणीसे विवाह करके मथुरा में निवास करते हुए गृहस्थ धर्मानुसार जीवन यापन करने लगा। चारों वेदोंको जाननेवाले उसे चार पुत्र उत्पन्न हुए। जिनके नाम थे-ऋक्, यजुष, साम तथा अथर्चा । के पुत्र व्याडि थे, जो न्याय-शास्त्र-विशारद थे। यजुष्के पुत्र लोकविश्रुत मीमांस हुए। सामके जो व्याकरण-शास्त्रमें पारंगत थे और अथर्वाक पुत्र वररुचि हुए।

एक समय वे चारों पितृशर्माके साथ मगध देशके अधिपति राजा चन्द्रगुप्तकी सभागे गये। अतिशय सम्मानपूर्वक राजाने उन लोगोंका पूजन कर पूछा-'द्विजगण। कौन-सा ब्रह्मचर्यव्रत श्रेष्ठ है?' इसपर व्याडिने कहा-'महाराज ! जो व्यक्ति उस परम पुरुषदेवको न्यायपूर्वक आराधनामें तत्पर रहता , वह श्रेय ब्रह्मचारी है।' भौमासने कहा-'राजन् । जो श्रेष्ठ व्यक्ति यज्ञमें ब्रह्मा आदि देवताओका बजन करता है और रोचना आदिसे उनका अर्चन एवं तर्पण आदि करता है तथा

*नमः प्रकृत्यै सर्वाय कैल्पायै नमो नमः ।

त्रिगुणश्यस्वरूपायै तुरीयायै नमो नमः ॥

महाराजनन्यै च द्वन्द्वकयै नमो नमः ।

ब्रह्मपालनमस्तुभ्यं साह कारपितामहि ॥

पृश्याणार्थ रामाय नमो भातर्नमो नमः ।

विद्यायै शुद्धसत्त्वार्य लक्ष्य सत्वरजोमयि॥

नमो माणिधारी , गुख्य नमो नमः ।

काल्यै सत्वतमो भूत्यै नमो साटनमो नमः ॥

स्विर सुखरजामृत्य नाम मिला न्यायासिनि ।

नमो रजश्नमामृतं गाय च नमो नमः ॥

(प्रनिसर्गपर्व २३०१०-१४)

भगवान् के प्रसादको ग्रहण करता है, वह ब्रह्मचारी है।' यह सुनकर पाणिनिने कहा-'राजन्! उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरोंसे या परा, पश्यन्ती, मध्यमा वाणीसे शब्दब्रह्मका आराधक तथा लिङ्ग धातु एवं गणोंसे समन्वित सूत्रपाठोंसे शब्दब्रह्मकी आराधना करनेवाला सच्चा ब्रह्मचारी है और वही ब्रह्मको प्राप्त करता है।' यह सुनकर वररुचिने कहा-'हे मगधाधिपते ! जो व्यक्ति उपनीत होकर गुरुकुलमें निवास करता हुआ दण्ड, केश और नखधारी भिक्षार्थी वेदाध्ययनमें तत्पर रहते हुए गुरुकी आज्ञाके अनुसार गुरुके गृहमें निवास करता है, वह ब्रह्मचारी कहा गया है।'

इनके वचनोंको सुनकर पितृशर्माने कहा कि जो गृहस्थ-धर्ममें रहता हुआ पितरों, देवताओं और अतिषियोंका सम्मान करता है और इन्द्रिय- संयमपूर्वक ऋतुकालमें ही भार्याका उपगमन करता है, वही मुख्य ब्रह्मचारी है।' यह सुनकर राजाने कहा-'स्वामिन्। कलिकालके लिये आपका ही कथन उचित, सुगम और उत्तम धर्म है, यही मेरा भी मत है।

यह कहकर वह राजा पितृशर्माका शिष्य हो गया और उसने अन्तमें स्वर्गलोकको प्राप्त किया। पितृशर्मा भो भगवान् श्रीहरिका ध्यान करते हुए हिमालय पर्वतपर जाकर योगध्यानपरायण हो गया। (अध्याय ३०)