भविष्य महा पुराण

प्रपा (पौसला) और अग्नीष्टिय(अँगीठी)-दानकी महिमा

महाराज युधिष्ठिरने पूछा-देवकीनन्दन! अब आप प्रपा (पौसला)-दानके माहात्म्यको बतलायें। किस समय और किस विधिसे यह दान होता है? उसके दानका क्या फल है, आप इन सबका वर्णन कीजिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! चैत्र मासके आरम्भमें ब्राह्मणद्वारा उत्तम मुहूर्तकी जानकारी कर नगरके मध्यमें, रास्तेके किनारे, देवालयमें, चैत्य (पीपल या गाँवके किसी प्रसिद्ध)-वृक्षके नीचे अथवा निर्जल स्थानमें या वनमें घनी और शीतल छायायुक्त एक सुन्दर मण्डप बनाना चाहिये। मण्डपके बीच में गीले वस्त्रसे ढककर शीतल जलसे भरे हुए बड़े-बड़े मटके रखने चाहिये। जलपात्र भी रखे। सुशील और गृहस्थ ब्राह्मणको नियुक्त करे, जो निरन्तर थके-प्यासे लोगोंको जल पिलाता रहे। उस ब्राह्मणके निर्वाहयोग्य जीविकाकी व्यवस्थाकर द्रव्य, अन्न आदि जो भी वह चाहे उसे देना चाहिये। इस प्रकार उत्तम मुहूर्तमें प्रपा बनाकर यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। तदनन्तर इस मन्त्रको पढ़कर प्रपाका दान करना चाहिये-

प्रपेयं सर्वसामान्या भूतेभ्यः प्रतिपादिता ।।

अस्याः प्रदानात् पितरस्तृप्यन्तु च पितामहाः ।

(उत्तरपर्व १७२।९-१०)

'इस प्रपाको मैंने सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये बनवाया है, इसके दान करनेसे मेरे पितर तृप्त हो जायें।' उस दिनसे लेकर चार मासतक निरन्तर जल पिलाना चाहिये और यथाशक्ति अन्न भी देना चाहिये। सुगन्ध, शीतल, उत्तम सुस्वादु जल उत्तम पात्र में रखकर सबको पिलाना चाहिये और यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन भी नित्य कराना चाहिये।

इस विधिसे जो व्यक्ति ग्रीष्म ऋतु में जलदान करता है, वह सभी तीर्थों और सभी दानोंका फल प्राप्त कर लेता है तथा देवताओंद्वारा पूजित होता है। वह पूर्णचन्द्रके समान दिव्य कुम्भाकार विमानमें बैठकर स्वर्गमें जाता है, बीस करोड़ वर्षपर्यन्त वहाँ सुख भोगता है और यक्ष, गन्धर्व, किन्नर आदि सब उसकी सेवामें तत्पर रहते हैं। पुनः भूमिपर जन्म लेकर चारों वेदोंका मर्मज्ञ ब्राह्मण होता है और उत्तम कर्मोंके अनुष्ठानसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है। प्रपादान करनेका सामर्थ्य न हो तो ग्रीष्मकालमें शीतल जलसे पूर्ण धर्मघट प्रतिदिन ब्राह्मणोंके घर देना चाहिये और प्रतिमास उसका उद्यापन करना चाहिये। अनेक प्रकारके पक्वान्न और वस्त्र, दक्षिणादिसे युक्त उस धर्मघटका दान करना चाहिये। वह घट ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकरस्वरूप कहा गया है। इस रूपमें उस घटकी इस प्रकार प्रार्थना करे-

एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः।

अस्य प्रदानात् सफरला मम सन्तु मनोरथाः ।।

(उत्तरपर्व १७२।२१)

इस मन्त्रको पढ़कर ब्राह्मणको जलपूर्ण घट देना चाहिये। इस विधिसे जो धर्मघटका दान करता है, वह प्रपादानका फल प्राप्त कर लेता है। यदि धर्मघट भी न दे सके तो उसे चाहिये कि ग्रीष्ममें चार मास नित्य पीपल वृक्षका सेवन करे और 'अपत्थरूपी भगवान् प्रीया मे जनार्दनः ' ऐसा कहकर प्रदक्षिणापूर्वक अश्वत्थको नमस्कार करना चाहिये। अश्वत्थ-सेचनसे सभी पाप दूर हो जाते हैं और उसे प्रपादानका फल प्राप्त हो जाता है।

भगवन्! इसी प्रकार शीतकालमें दयालु व्यक्तिको अग्नीष्टिका अर्थात् अँगीठीका दान करना चाहिये। मार्गशीर्ष मासके आरम्भमें उत्तम मुहूर्त देखकर देवालय, मठ, घर अथवा बड़े चौराहे पर सायं- प्रातः बहुत-सा सूखा काष्ठ एकत्रकर अग्नि प्रचलित कर व्याहुतियोंसे हवन करना चाहिये। इस प्रकार शीतकालमें दोनों समय अग्नि जलानी चाहिये। जिससे दीन, अनाथ, वस्त्रहीत वहाँ अग्निका सेवनकर लाभ प्राप्त कर सकें। यदि कोई भूखा हो तो उसको भोजन भी देना चाहिये। आग तापते समय परस्पर भगवचर्चा आदि करते रहना चाहिये। इससे महान् पुण्य होता है। यदि स्वेच्छासे कोई राजचर्चा तथा जनचर्चा आदि परोपकारकी बातें करे तो रोकना नहीं चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति अग्नीष्टिकाका दान करता है, वह सूर्यके समान दिव्य विमानमें बैठकर ब्रह्मलोक जाता है। वहाँ वह छाछठ हजार वर्षतक सुख भोगकर पुनः यहाँ जन्म लेता है और चतुर्वेदवेत्ता, याज्ञिक, नीरोग, धनवान् और तेजस्वी ब्राह्मण होता है। (अध्याय १७२-१७३)