भगवान् श्रीकृष्ण कहते है-राजन् ! अब में महापातकोंको नष्ट करनेवाले अत्युत्तम महाभूतपटदानकी विधि बता रहा हूँ। पुण्य दिनमें आँगनको लीपकर रनोंसे समन्वित सुवर्ण- कुम्भका निर्माण करे। कलशको प्रादेशमात्रसे सौ अङ्गुलपर्यन्त अपनी शक्तिके अनुसार पाँच पलसे सौ पलतक बनाना चाहिये। उस घटको दुग्ध और घृतसे पूर्ण करके उसके समीप कल्पवृक्षको स्थापित करे। वहीं पद्मासनपर आसीन ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरको स्थापित करे। लोकपाल और इन्द्रादिको अपने-अपने वाहनोंसे युक्त करके स्थापित करना चाहिये। अक्षसूत्रके साथ ऋग्वेद, कमलके साथ यजुर्वेद, वीणा लिये हुए सामवेद, सुक् लिये तथा सुन्दर माला पहने अथर्ववेद और पञ्चम वेद पुराणको अक्षसूत्र, कमण्डलु तथा वरदमुद्रायुक्त प्रतिमारूपमें स्थापित करना चाहिये। घटके चारों ओर सप्तधान्य, चरणपादुका, जूता, छाता, चामर, शय्या आदिको भी स्थापित करना चाहिये। पुष्पमाला और अन्य उपचारोंद्वारा स्थापित घटकी पूजा करे । शुभ मुहूर्तमें स्नानकर तीन बार उस घटको तथा वेदादि प्रतिमाओंकी प्रदक्षिणा कर इस मन्त्रका उच्चारण कर-
यस्मात्र किंचिदप्यास्ति महाभूतैर्विना कृतम्।
महाभूतमपहार्य तस्माच्छानितं ददातु मे॥
अत्र संनिहिता देवा: स्थापिता विश्वकर्मणा।
ते मे शान्तिं प्रयच्छन्तु भक्तिभावेन पूजिताः॥
(उत्तरपर्व १८३।१०-११)
'चूंकि महाभूतोंके बिना इस संसारमें अन्य कुछ भी नहीं है, सब महाभूतमय ही है। इसलिये महाभूतमय यह घट मुझे शान्ति प्रदान करे। सभी देवगण विश्वकर्माके द्वारा इसमें स्थापित हैं, भक्तिभावसे पूजित वे सब मुझे शान्ति प्रदान करें।'
इस प्रकार महाभूतघटकी पूजाकर वस्त्र तथा अलंकारादिसे ब्राह्मणकी भी पूजा करे और पुण्यकालमें महाभूतघट ब्राह्मणको प्रदान कर दे। अनन्तर प्रदक्षिणाकर ब्राह्मणसे क्षमा-याचना करे। इस विधिसे जो व्यक्ति महाभूतमयघटका दान करता है, वह अपने इक्कीस कुलके साथ शिवलोकमें जाता है। पुण्यक्षीण होने पर वह इस लोकमें आकर धार्मिक राजा होता है और शत्रुसे अजेय, पराक्रमी, क्षत्रियधर्ममें निरत, विद्वान् एवं देवताओं और ब्राह्मणोंका भक्त होता है। (अध्याय १८२)