महाराज युधिष्ठिरने कहा-यदुश्रेष्ठ! सभी पापोंके नाश करनेवाले, मङ्गलप्रद पवित्र अन्य दानोंको आप मुझसे कहें, क्योंकि ज्ञान-विज्ञानके एकमात्र आश्रय और संसार-सागरसे उद्धार करनेवाला आपके अतिरिक्त कोई नहीं है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन् ! मैंने अनेक प्रकारके दानोंकी आपसे चर्चा की, फिर भी यदि आपको उत्कण्ठा है तो मैं पुनः कह रहा हूँ। आप सबसे पहले दस महादानोंके विषयमें सुनें। उनमेंसे पहला दान है-कालपुरुषदान, दूसरा सप्तसागरदान, इसी प्रकार महाभूतष्टदान, शय्यादाने, आत्मप्रतिकृतिदान, सुवर्णा श्वदान, सुवर्णाश्वरथदान, कृष्णाजिनदान, विश्वचक्रदान तथा हेमगजरथदान- ये दस महादान हैं। नृपश्रेष्ठ! आप दान करने में अपनी सद्बुद्धि लगायें और अन्य लोगोंको भो दान-कर्ममें प्रेरित करें। धनीके लिये दानसे अतिरिक्त और कोई भी उपकार नहीं है। देनेवाले व्यक्तिका धन घटता नहीं है, अपितु देनेसे बढ़ता ही रहता है।
राजन्! अब आप कालपुरुषदानके विषयमें सुनें। कालपुरुषको एक प्रतिमा बनानी चाहिये। चतुर्थी, चतुर्दशी अथवा विधिमें यह प्रतिमा काले तिलोंसे एक समतल भूगिपर पुरुषके आकारकी बनवाये। उसके दाँत चाँदीके, आँखें सोनेकी बनाये उसके हाथमें भयंकर तलवार हो, जपाकुसुमके समान उसके कानोंमें कुण्डल हों, लाल माला तथा लाल वस्त्र पहिने हो, शङ्खकी भी माला पहने हो। धनुष-बाण लिये हो। जूते पहने हो तथा बगलमें काला कम्बल लिये हो। इस प्रकार कालपुरुषकी प्रतिमा बनाकर गन्ध, पुष्प और नैवेद्य आदिसे उसकी अर्चना करे। 'त्र्यम्बकं' (यजु० ३।६०) इस मन्त्रसे स्वगृह्योक्त विधानसे तिल और घृतद्वारा १०८ आहुतियाँ दे। अनन्तर प्रसन्नहृदयसे यजमान इस मन्त्रका उच्चारण करे
सर्व कलयसे यस्मात् कालस्त्वं तेन भण्यसे ।
ब्रह्मविष्णुशिवादीनां त्वमसाध्योऽसि सुव्रत ॥
पूजितस्त्वं मया भक्त्या प्रार्थितश्च तथा सुखम्।
यदुच्यते तव विभो तत् कुरुष्व नमो नमः॥
(उत्तरपर्व १८१ । २१-२२)
'कालपुरुष! सब कुछ आपसे ही घटित होता है। इसलिये आप काल कहे जाते हैं। सुव्रत! ब्रह्मा, विष्णु, शिवसे भी आप असाध्य हैं। आपकी मैंने भक्तिपूर्वक आनन्दके साथ पूजा की है। विभो । मुझे आपसे सुखकी कामना है। आप उसे कृपापूर्वक पूर्ण करें, आपको बार-बार नमस्कार है।
'इस प्रकार पूजाकर वह प्रतिमा ब्राह्मणको समर्पित करे। वस्त्र और अलंकारोंसे ब्राह्मणकी पूजाकर उसे यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करे। इस विधिसे कालपुरुषका दान करनेवालेको मृत्यु एवं व्याधिका भय नहीं रहता। वह सभी बाधाओंसे। रहित होकर अपार सम्पचि और अन्तमें सूर्यलोकका भेदनकर परमपदको प्राय करता है। पुण्य-वीण होनेपर वह पुनः यहाँ आकर पुत्र-पौत्र तथा लक्ष्मीसे सम्पन्न धार्मिक राजा होता है।' (अध्याय १८१)